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स्नेह

कुदरती व्यवस्था में स्त्री और पुरुष दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक दूसरे के पूरक हैं , सहयोगी हैं, विरोधी नहीं। फलतः एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते। प्रकृति ने दोनों ही को एक खास मकसद से सृष्टि और जीवन की निरंतरता हेतु बनाया है, दोनों एक दूसरे के लिए अति आवश्यक हैं, क्योंकि भावों और संवेग की उत्पत्ति के ये दोनों वाहक हैं, एक दूसरे के लिए और अन्य के लिए अनुपयोगी तो कतई भी नहीं। दोनों एक दूसरे के मित्र हैं, शत्रु नहीं। इन दोनों को जोड़ता है स्नेह, प्रेम और प्यार और इसके पर्याय। स्नेह एक ऐसा खूबसूरत एहसास है, जो हर आयु वर्ग के इंसान के दिल के किसी न किसी कोने में बसा होता है। इस एहसास के जागते ही कायनात में जैसे चारों ओर हजारों फूल खिल उठते हैं और जिंदगी को जीने का नया बहाना मिल जाता है। एक स्त्री के जीवन में प्यार बहुत महत्वपूर्ण एवं अर्थपूर्ण होता है और यह बहुत मायने रखता है। प्यार उसकी सासों में फूलों की खुशबू की तरह रचा-बसा होता है, जिसे वह ताउम्र भूल नहीं पाती। लगता है कि जब सृष्टि की रचना हुई होगी और धरती पर पहली बार आदम और हौवा ने धरती पर कदम रखा होगा, तभी से स्त्री ने पुरुष ...

चिंता रोग

चिंता रोग बीमारी नहीं है और न ही दिमागी फितूर। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें सकारात्मक सोचने और बेहतर परिणाम तक पहुंचने की इंसान की स्वाभाविक क्षमता कम हो जाती है। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि एग्जाम से ठीक पहले आपके हाथ-पैर कांपने लगे हों, या फिर सेवा साक्षात्कार से पहले हथेलियों में पसीना आने लगा हो? असल में ये किसी बीमारी का संकेत नहीं हैं बल्कि किसी बड़ी घटना से पहले ये खुद को तैयार करने का शरीर का अपना तरीका है। दिमाग से आने वाले ये संकेत घटना के शुरू होते ही जितनी तेजी से उठे थे उतनी ही तेजी से शांत भी हो जाते हैं। धीरे-धीरे सांसों की गति और हृदय गति सामान्य होने लगती है। ये चिंताएं हमें किसी भी इवेंट के लिए मानसिक रूप से तैयार होने में मदद करती हैं। अगर ये चिंता बिना किसी स्पष्ट कारण के होने लगे, तब जरूर ये परेशान करने वाली बात हो सकती है। कई लोगों में यह समस्या चरम पर पहुंचने के बाद उनके रोजमर्रा के कामों और उनकी जिंदगी को प्रभावित करने लगती है। ऐसी हालत में इसे चिंता रोग या एंग्जाइटी डिसऑर्डर कहा जा सकता है। वक्त पर इलाज और करीबियों का साथ इस बीमारी से निपटने में अह...

एकाग्रता

जीवन में सफलता को निर्धारित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक कारक आपकी एकाग्रता है। अतः जीवन में इसको अपना कर लाभान्वित हुआ जा सकता है। आइए जानते हैं कि किस प्रकार हम अपनी एकाग्रता क्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि कर के एकाग्रता से न सिर्फ लाभान्वित हो सकते हैं बल्कि उसकी उपयोगिता को सिद्ध भी कर सकते हैं। ध्यान रखिए कि जब आप अपने वर्कस्टेशन के सामने बैठें तो पांच मिनट का समय अवश्य लगाएं और व्याकुल करने वाले सभी संभावित स्रोतों के बारे में सोचें और साथ ही उनकी उपयोगिता और नुक़सान की बाबत भी। तत्पश्चात अपने मस्तिष्क को ऐसी व्याकुलताओं से विलग करने की दिशा में यथासंभव प्रयास करें। ऐसा करना मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं। जब कभी भी आपको लगे कि आपका ध्यान भटक रहा है, तो आप अपने मन में उसी शब्द को बार– बार तब तक दुहराते रहें जब तक कि आप जारी काम पर वापस न आ जाएं। लक्ष्य सिद्ध करने के दौरान या पढ़ाई करते समय छोटे छोटे विश्राम लें। ऐसा करने से ना केवल आपका मस्तिष्क तरोताजा होगा बल्कि आपकी एकाग्रता शक्ति में भी वृद्धि होगी। ये एकाग्रता के नियमन की दिशा में प्रयास हैं। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे खेल...

समझें विवेक की भूमिका

समाज में सभी अपने प्रभाव में वृद्धि करने के ध्येय से भ्रम फैलाने के कार्य में किसी ना किसी रूप में अवश्य संलिप्त रहते हैं और ऐसा सिर्फ धर्म को लेकर ही नहीं कहा जा सकता। भ्रम ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति वास्तविक और काल्पनिक में अंतर नहीं कर पाने के कारण मतिभ्रम का शिकार हो जाता है। इस रोग की दशा में व्यक्ति काल्पनिक चीज़ों पर अधिक विश्वास करता है। भ्रम कई मानसिक रोगों का भी एक लक्षण हो सकता है और वास्तविकता का भी। भ्रम रोग उसे कहते हैं, जब व्यक्ति को मुख्य रूप से भ्रम की ऐसी समस्या उत्पन्न हो रही हो जिसमें वास्तविकता के समतुल्य काल्पनिकता भी हो। भ्रम ऐसी स्थिति है जिसमें रोगी एक महीने या उससे अधिक समय के लिए एक या एक से अधिक विषय के बारे में भ्रमित रहता है। भ्रम से ग्रस्त व्यक्ति अपने सामान्य कार्य करता रहता है और कोई भी अजीब व्यवहार नहीं करता। हालांकि, वह भ्रम से इतना अधिक प्रभावित हो जाता है कि इससे उसके सामान्य जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। भ्रम हो धर्म हो या फिर कुछ और इन सब में विवेक की प्रमुख भूमिका होती है। अतः हमको अपने विवेक का उपयोग निश्चित ही करना चाहिए।

संतोष

बाइक सवार युगल लॉन्ग ड्राइव पर था और कब वह भावनाओं के ज्वार में उन्मत्त हो गया था, उसको इसका अहसास तक ना था।  अंतरंग वार्ता में आकंठ डूबा युवक बाइक चला रहा था और भावावेशित युवती का कमर तक हवा में उड़ चुका कुर्ता उसको अर्धनग्न कर चुका था। उसको भी इसका कतई भी अहसास ना था। राहगीरों की कामुक निगाहें युवती की नग्न हो चुकी कमर को तक रही थीं। कोई मनचला उसे देखने के लिए कभी आगे तो कभी पीछे निकल जाता।  अधेड़ मोटरसाइकिल सवार जब उनके निकट पहुंचा तो युवती को इस दशा में देखकर उससे रहा न गया और उसने तत्काल युवती को उसके अस्त व्यस्त हो चुके कपड़ों की बाबत बताया। शर्मसार हो चुकी युवती ने अपने कुरते को हड़बड़ी में ठीक किया और अधेड़ का आंखों ही आंखों में आभार व्यक्त किया। पर बराबर से गुजरती वागन R में बैठे दंपत्ति ने मोटरसाइकिल सवार अधेड़ की ओर मुस्कराते हुवे व्यंगपूर्ण और हेय दृष्टि से देखा। अधेड़ को अजीब तो लगा पर उसके मुखमंडल पर संतुष्टि का भाव था, क्यूं की उसने अपनी पुत्रीवत युवती को भावावेग के उस भंवर से झटके से बाहर खींच लिया था, जिसके वशीभूत हो वह युवती परोक्ष अपर...

सहारा

ग्रामीण क्षेत्र का मेहनतकश संतराम सवेरे जब उठा तो कल तक उसके कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करने वाली और अब अधरंग से पीड़ित उसकी पत्नी उसको निहार रही थी। वह धीरे से बोली, "सुनो, जी नहीं लग रहा।" सीधा सच्चा रोजाना दैनिक स्रोतों की व्यवस्था करने में जुट जाने वाला संतराम बोला, "चिंता ना कर चौधरन (वह अपनी पत्नी का नाम ना लेकर इसी संबोधन से पुकारता था।)! तेरा जी लगाऊंगा। आज काम पर नहीं जाता। जब साथ साथ जीने मरने की कसम खाई है तो उसको मैं अवश्य निभाऊंगा। चल आज मैं तेरे को नंबरदार अशोक कुमार के खेतों पर लेकर चलूंगा।" नंबरदार अशोक कुमार के खेत मुख्य मार्ग पर थे और बड़ा मनोरम दृश्य वहां से दिखता था। फटाफट चाय पी कर संतराम ने अपनी साइकिल निकाली और उसके कैरियर पर एक चादर की कई तह करके कैरियर को गुदगुदा कर दिया और बोला, "आ जा चौधरण। चलते हैं।" संतराम इकहरे बदन का था जबकि उसकी पत्नी भारी भरकम, लेकिन उसने उसको कैरियर पर आराम से बैठ दिया। फिर चला पैदल पैदल। नंबरदार अशोक के खेत लगभग आधा किमी. दूर थे। लबे सड़क खेत में सावधानीपूर्वक साइकिल खेत में उतारी और एक कट्टा दुहरा कर के न...

कड़वा सच

"कोई किसी का नहीं, इंसान अकेले दुनिया में आता है।" और! अपने जीवन को आनंदित करने व सुखद बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है, रिश्ते नाते बनते हैं तथा विविध किस्म की गतिविधियां होती हैं। फिर, अंततः वह अकेले ही दुनिया से चला जाता है। हमारे लिये यह जानना भी बहुत जरूरी है कि हमारे जीवन में रिश्तों की मुख्य भूमिका होती है और एक उल्लसित जीवन के पीछे हमारे रिश्ते नाते ही बड़े कारक होते है। वे रिश्ते ही हैं, जो दुःख में हमारे साथ होते हैं और मुश्किल समय को समझने और उसको सरल करने में हमारी मदद करते हैं और हमारी खुशियों को दोगुना कर देते हैं। समझिए कि  यदि आपके रिश्ते आपके करीबी के साथ बहुत अच्छे हैं, तो आप हमेशा जीवन में खुशहाल और सफल होते जाएंगे पर इसके विपरीत यदि आपका करीबी रिश्ता सही नहीं है तो आपको जीवन में हमेशा दुःख ही का सामना करना पड़ सकता है। उसके आने से लेकर जाने तक की समग्र गाथा ही हमारे जीवन का कड़वा सच है जिसको सब जानबूझकर भी तेरे मेरे में उलझे हैं, जबकि ऐसे अनंत उदाहरण हैं कि लोगों ने विपरीत विचारधारा का होने और रिश्ते नातों से कहीं दूर रहते हुए भी अपने अपने फ़र्ज़ को समझा...