ग्रामीण क्षेत्र का मेहनतकश संतराम सवेरे जब उठा तो कल तक उसके कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करने वाली और अब अधरंग से पीड़ित उसकी पत्नी उसको निहार रही थी।
वह धीरे से बोली, "सुनो, जी नहीं लग रहा।"
सीधा सच्चा रोजाना दैनिक स्रोतों की व्यवस्था करने में जुट जाने वाला संतराम बोला, "चिंता ना कर चौधरन (वह अपनी पत्नी का नाम ना लेकर इसी संबोधन से पुकारता था।)! तेरा जी लगाऊंगा। आज काम पर नहीं जाता। जब साथ साथ जीने मरने की कसम खाई है तो उसको मैं अवश्य निभाऊंगा। चल आज मैं तेरे को नंबरदार अशोक कुमार के खेतों पर लेकर चलूंगा।"
नंबरदार अशोक कुमार के खेत मुख्य मार्ग पर थे और बड़ा मनोरम दृश्य वहां से दिखता था।
फटाफट चाय पी कर संतराम ने अपनी साइकिल निकाली और उसके कैरियर पर एक चादर की कई तह करके कैरियर को गुदगुदा कर दिया और बोला, "आ जा चौधरण। चलते हैं।"
संतराम इकहरे बदन का था जबकि उसकी पत्नी भारी भरकम, लेकिन उसने उसको कैरियर पर आराम से बैठ दिया। फिर चला पैदल पैदल। नंबरदार अशोक के खेत लगभग आधा किमी. दूर थे। लबे सड़क खेत में सावधानीपूर्वक साइकिल खेत में उतारी और एक कट्टा दुहरा कर के नीचे बिछाया। संतराम से क्रोध में कभी कभी कठोर वचन कह देने वाली उसकी पत्नी के आंसू रुक नहीं रहे थे। संतराम बोला, "अरी! काहे मन भारी कर रहीं।"
सुबह सुबह का समय था। चाैधरण का मन खुश हो गया। उसको अफसोस था अपने कठोर वचनों का और बहुत बहुत बहुत गर्व हो रहा था अपने मजदूर पर विचारों से इंटेलेक्चुअल पति पर। उसका जीवन तर गया था।
राजीव वर्मा
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