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काव्य रूप में विचार (अनूठा अंदाज)

     विचार को काव्य रूप में प्रस्तुत कर उसके प्रभाव को द्विगुणित तक किया जा सकना संभव है। काव्य रूप में प्रस्तुत एक विचार में अपार शक्ति होती है, क्योंकि यह सीमाओं को पार कर सकता है, पुष्पों की तरह दिलों तक पहुंच सकता है। इसके छंदों से भावनाएँ परस्पर जुड़ती हैं, और इसकी कल्पना के माध्यम से, दुनिया संरेखित हो सकती हैं।      सावधानीपूर्वक छंद में बुना गया एक एकल विचार क्रांति तक को जन्म देकर समय की कसौटी पर खरा उतर सकता है। यह मानव आत्मा के सार को पकड़कर खुशी, दु:ख और अनकही कहानियाँ तक व्यक्त कर सकता है।     ध्यान दीजिए कि कविता की लय में विचार असीमित उड़ान भरते हैं और मन को जागृत कर आंतरिक प्रकाश को प्रज्वलित करते हैं। यह चिंतन को स्वतः प्रेरित करता है। आत्मनिरीक्षण को प्रेरित करता है और इसकी पंक्तियों में गहरा संबंध निहित होता है।      एक कविता में एक विचार जीवन के सबसे अंधेरे समय में आशा जगाता है, लचीलेपन को प्रेरित करता है, आंतरिक शक्ति का आह्वान करता है।      कुछ भली प्रकार चुने गए शब्दों के साथ, यह बदलाव को भी ...

स्कूली प्रार्थना सभा में शिक्षक सहभाग और कुछ नए व अभिनव प्रयोग

     विद्यालय में होने वाली प्रार्थना विद्यालय में संस्कार देने का सबसे प्रभावी कार्यक्रम है। विश्व के सभी देशों में, सभी संस्कृतियों में, सभी परंपराओं में प्रार्थना अनादि काल से चलती आई है। विश्व के सभी भागों के निवासी किसी न किसी रूप में कार्य की शुरुआत से पूर्व मन ही मन, मौन रहकर, सस्वर अथवा गाकर ईश्वर की प्रार्थना करते हैं। भारतीय संस्कृति में भी प्रार्थना का अहम स्थान है। सुख एवं दु:ख दोनों ही परिस्थितियों में प्रार्थना मनुष्य को शक्ति प्रदान करती है, आत्मबल को बढ़ाती है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। बच्चे भी जब विद्या अध्ययन के लिए विद्यालय आते हैं तो पठन-पाठन प्रारम्भ करने से पूर्व वे प्रार्थना सभा में ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। इससे शिक्षण के लिए आवश्यक वातावरण का निर्माण तो होता ही है एकाग्रता का संस्कार भी बनता है। पारिवारिक चर्चाओं और पारिवारिक वातावरण से बाहर निकलकर बालक शिक्षा प्राप्ति के लिए मानसिक रूप से अपने आपको तैयार करता है। प्रार्थना सभा वह स्थल है जहाँ संबंधित विद्यालय के शैक्षिक, सामाजिक एवं मानसिक व आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा, चिंतन, मनन होता...

क्या यों ही हमको दिशा मिलेगी?

भारतवर्ष कभी अपनी विशिष्ट विशेषताओं के लिए जाना जाता था। इनके मूल में हमारा संयमित आचरण निहित था। अंग्रेजों के द्वारा झटके के साथ दी गई आजादी एक निश्चित उद्देश्य से दी गई थी। 'फूट डालो राज करो' के बूते वे शासन तो चला ही गए साथ ही भारतवंशियों को उनके विनाश का मूल मंत्र भी सौंप गए। भारत को झटके के साथ आजादी को इस मूल मंत्र के साथ सौंपने के पीछे उनकी विनाशकारी सोच छिपी थी। भारतवर्ष को दो धाराओं में बांटकर विभाजन करने की सोच को वे भारत में भी प्रसारित कर गए। उसने प्रभावी रूप से कार्य किया। तटस्थ भाव से देखो तो आज देश से लेकर परिवार तक में यह विभाजक सोच कार्य कर रही है। अब सोचें कि यदि इस सोच ही के साथ आप जीवन-यापन करने की प्रक्रिया को अपनाएं तो क्या होगा? निश्चय ही अनन्त कष्टदायी स्थितियां बन जाएंगी। वर्तमान में समस्याओं को जीवित रखने की जो सोच समाज में उभरी है वह और भी घातक है। अंग्रेजों के द्वारा प्रदत्त सोच के साथ समाज को अपने-अपने उद्देश्य से विभाजित कर हम क्षणिक सफलता पर इतरा भले ही लें पर उस सबसे हमें कितनी हानि उठानी पड़ी है क्या इस पर भी कभी हम विचार करेंगे? सीमाओं के उल्लं...

नियति भी सोचने को विवश करती है!

     भारतवर्ष में ऋषि मनीषियों की समृद्ध परम्परा रही है और उनका सामाजिक शोधन में भी भरपूर योगदान रहा है। यही कारण है कि प्राचीनकाल में ही यह भाँप लिया गया था कि स्त्री-पुरूष सम्बन्ध अग्नि सदृश हैं और यही कारण था कि शहरी क्षेत्रों में प्रत्येक आवास में बैठक थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में घेर की व्यवस्था के अन्तर्गत पर-पुरुष का घरों में प्रवेश निषिद्ध होता था। पुरुष की पुरुष और स्त्री की स्त्री से मिलने की सामान्य व्यवस्था होती थी, जिससे किसी भी घरेलू महिला का पर-पुरुष से सम्पर्क ही असंभव था। ऐसे में शारीरिक संसर्ग का तो प्रश्न ही नहीं था। तब वह समय था जब हमारे द्वारा अपने भविष्य को नियोजित किया जाता था। ऐसी व्यवस्था बहुत लम्बे समय तक चली और वह बहुत सुकून का समय था। पहले धीरे-धीरे और फिर अत्यन्त तीव्र गति से समय बदला। सामाजिक बन्धनों में शिथिलता और लचीलापन आने लगा और लोकतन्त्र ने जिस प्रकार आमजन को बिना निगरानी के चहुँमुखी विकास की स्वतन्त्रता प्रदान की है उसने विभिन्न प्रकृति की जटिलताएँ पैदा कर दी हैं। शासकीय उदारता व अनदेखी के व्यवहार ने राजनीतिक दलों व सामाजिक संस्...

यक्ष प्रश्न

एक समीक्षात्मक प्रश्न है - अर्थात् "स्वयं को बेहतर करने के लिए आप आज कौन सी छोटी सी शुरुआत कर सकते हैं?" इसको सुनकर ऐसी स्थिति बनती है - तो इसका श्रेष्ठतम उत्तर है - "चिंतन।"  हाल में संपन्न बी.ए. (इतिहास) परीक्षा में यह प्रश्न पूछा गया - यह सब पढ़कर सुई आकर टिक जाती है बुद्धिमता पर। आज प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी नागरिक के लिए जरूरत यह जानने की है कि आखिर वह है कौन जो ऐतिहासिक तथ्यों/इतिहास को खुर्दबुर्द करने में संलग्न है। और! ऐतिहासिक तथ्यों और कालजयी महापुरुषों के प्रति सदियों से प्रचलित श्रद्धा भाव को समाप्त करने का इच्छुक है। स्थिति विकट है और भारतीय जनमानस आज नितांत असहाय और निरीह महसूस कर यह निरंतर सोच रहा है कि आखिर इस सब से हासिल क्या होने जा रहा?

समझने की जरूरत

प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के कभी अज्ञात रहे पर अब ज्ञात शहीदों में सम्मिलित बाबा शाहमल की स्मृति में हुए कार्यक्रम निःसन्देह प्रशंसनीय हैं और जनमानस को इस दिशा में पर्याप्त जागरूक कर सकते हैं, पर उस संग्राम का नेतृत्व करने वाले स्वतन्त्रता सेनानी समेत विभिन्न समुदायों के अन्य कभी के अज्ञात और अब ज्ञात स्वतन्त्रता सेनानियों की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान उस समय की सबसे बड़ी निजी सेना वाले परीक्षितगढ़ के कदम सिंह समेत वाल्मीकि समुदाय के शान्ति-प्रेरक मातादीन का स्मरण भी प्राय: नहीं किया जाता है। स्थानीय इतिहासकार बागपत जिले के बासौद में तो वृक्षारोपण कर सकते हैं पर मेरठ जनपद के निकट स्थित प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व करने वाले क्रांतिनायक धन सिंह कोतवाल, भीषण जन-हानि करने वाले गाजियाबाद जिले के निकटवर्ती ग्राम सीकरी कलां और तत्कालीन सबसे बड़ी सेना वाले परीक्षितगढ़ के कदम सिंह के क्षेत्र में या फिर मातादीन समेत अन्य समुदायों के स्वतन्त्रता सेनानियों की स्मृति में जनमानस को जागरूक करने को कार्यक्रम नहीं करते। आखिर इस सब के मूल में क्या है? यह खेद का विष...

विचारें जरूर!

"मध्य प्रदेश में (कोडिंग) प्रोग्रामिंग भाषा सिखाने वाले सबसे अच्छे कॉलेज किस शहर में हैं?" यह और इसके जैसे अन्य सभी प्रश्न ज्ञान की धार को कितना कुंद कर देते हैं क्षेत्र को उल्लिखित कर के और क्षेत्र विशेष में रहकर अध्ययन करने को बाध्य कर के इस संदर्भ में सोचे जाने की जरूरत है। जरा सोचें कि कोई इंसान एडवांस अध्ययन करने का आकांक्षी है तो उसको प्रदेश के नहीं देश के तीन श्रेष्ठ कॉलेजों का विवरण मिलना चाहिए और प्रश्न की रचना भी इसी उद्देश्य से किया जाना श्रेयस्कर है, जिस से वह सटीक ज्ञान अर्जित कर सीखकर देश और विदेश में उस ज्ञान का सदुपयोग कर सके। कुछ पूछे जाने में कोई ना कोई मंतव्य निहित होता है, लेकिन हमारा प्रयास हो कि मंतव्य स्पष्ट और पवित्र तथा इतना लाभकारी हो कि उसका लाभ सिर्फ प्रश्नकर्ता तक ही सीमित न रह जाए।