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नियति भी सोचने को विवश करती है!

     भारतवर्ष में ऋषि मनीषियों की समृद्ध परम्परा रही है और उनका सामाजिक शोधन में भी भरपूर योगदान रहा है। यही कारण है कि प्राचीनकाल में ही यह भाँप लिया गया था कि स्त्री-पुरूष सम्बन्ध अग्नि सदृश हैं और यही कारण था कि शहरी क्षेत्रों में प्रत्येक आवास में बैठक थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में घेर की व्यवस्था के अन्तर्गत पर-पुरुष का घरों में प्रवेश निषिद्ध होता था। पुरुष की पुरुष और स्त्री की स्त्री से मिलने की सामान्य व्यवस्था होती थी, जिससे किसी भी घरेलू महिला का पर-पुरुष से सम्पर्क ही असंभव था। ऐसे में शारीरिक संसर्ग का तो प्रश्न ही नहीं था। तब वह समय था जब हमारे द्वारा अपने भविष्य को नियोजित किया जाता था। ऐसी व्यवस्था बहुत लम्बे समय तक चली और वह बहुत सुकून का समय था। पहले धीरे-धीरे और फिर अत्यन्त तीव्र गति से समय बदला। सामाजिक बन्धनों में शिथिलता और लचीलापन आने लगा और लोकतन्त्र ने जिस प्रकार आमजन को बिना निगरानी के चहुँमुखी विकास की स्वतन्त्रता प्रदान की है उसने विभिन्न प्रकृति की जटिलताएँ पैदा कर दी हैं। शासकीय उदारता व अनदेखी के व्यवहार ने राजनीतिक दलों व सामाजिक संस्थाओं को सुधार की आवश्यकता वाले क्षेत्रों में कार्यवाही न करने के लिए बाध्य भी किया है। इस परिस्थिति के निर्माण के लिए जनसंख्या वृद्धि को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। जनसंख्या वृद्धि ही के कारण आज कुछेक परिवारों की तो यह स्थिति है कि उसके समस्त सदस्य एक साथ एक समय सो पाने में भी असमर्थ हैं, लेकिन यह ऐसी स्थिति है कि हर किसी के साथ साझा भी नहीं की जा सकती। ऐसी स्थितियों में भावनाओं के अतिरेक को नियंत्रित किया जा सकना संभव ही नहीं और यदि यह प्रसारित हो तो कहीं तक भी जा सकना संभव है। साथ ही यदि सरलता सहजता से यौनेच्छा की कामना पूर्ण हो जाती है तो स्थिति उस इच्छा को और भड़काती है। ठीक ऐसे ही स्थैतिक कारक हैं जो दुस्साहस-वृद्धि के साथ अन्यत्र भी ऐसी क्रिया करने को प्रोत्साहित करने लगते हैं।
     एक अन्य कारक के रूप में हमारे देश के महिला वर्ग की
शर्म-हया को भी जाना समझा जा सकता है। पर्दा और शर्म- हया तथा मान-मर्यादा को भारतवर्ष में सदैव ही प्रश्रय मिला है। यहाँ कभी अपने साथ-साथ अन्यान्य के लिए भी इन्हीं मानकों के आधार पर सोचा जाता था परन्तु समय बदला, तो ये मानक भी बदल गए। आज स्थिति यह है कि उक्त सन्दर्भ में केवल अपने लिए सोचा जाने लगा है और दूसरे के लिए भिन्न परिस्थितियों के निर्माण की बात सोची जाने लगी है। यही कारण है कि दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोपों की वास्तविकता या उसके कपोल-कल्पित होने में दोष सिद्धि के लिए अनेक दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है।
     इसी क्रम में इसको भी एक यक्ष प्रश्न के रूप में देखा जा सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी द्वारा देखा गया महिलाओं के उन्नयन का सपना क्या उनकी अवधारणा ही के आलोक में पूरा हुआ है? यदि हम इस प्रश्न पर विचार करें तो शायद उत्तर 'नहीं' में ही आएगा, क्योंकि निःसन्देह इस वर्ग का उन्नयन हुआ है, लेकिन कुछ कुरीतियाँ भी साथ-साथ पनप रही हैं। उन्नयन के साथ ऐसी कुरीतियों का पनपना स्वाभाविक है जो शारीरिक सम्पर्क तक भी ले जाती है परन्तु यदि इस उन्नयन काल में थोड़ी-सी भी सावधानी, सतर्कता और सख्ती बरती जाती तो वर्तमान में बन रही जटिल स्थितियों का सामना करना न पड़ता। इस उन्नयन का सुखद पहलू यह है कि आज भी ऐसी अनेक क्या असंख्य महिलाएँ हैं, जिन्होंने ऐसी स्थितियों से अपने को बचाकर  रखा है जो शारीरिक सम्पर्क की ओर ले जाती हैं। आत्मबल या आत्मविश्वास और एक की होकर रहना जैसे तो शब्द ही शायद के उनके लिए गढ़े गए हैं।
     एक और कारक आज उत्पन्न हो गया है वह है उन्मुक्त  व्यवहार। यह एक मनोवैज्ञानिक कारक है। इसकी आड़ में दूसरे के मन की थाह लेकर आचरण में क्रमिक परिवर्तन कर परिस्थितियों का उपयोग-दुरुपयोग अपने उद्देश्य के अनुसार कर लिया जाता है। महिलाओं का मन अतिकोमल होता है और तनिक-सा मनभावन माहौल उन्हें प्रिय लग सकता है तथा उन्हें बहका सकता है। महिलाओं के यौन शोषण और उनको बेइज्जत करने जैसे मामलों का संज्ञान लें तो उनमें उन्मुक्त व्यवहार भी एक कारक के रूप में कहीं न कहीं दृष्टव्य होगा।
     टेलीविजन और सिनेमा में आज यौन क्रीडाओं की  भड़काऊ अन्दाज में प्रस्तुति भी हमें किसी-न-किसी रूप में उस असहज माहौल की ओर धकेल रही है जो शारीरिक संबंधों की विकृत अनुभूति की ओर ले जाता है। नए अनुभव के रूप में और मनोरंजन प्रतीत होने वाली यह अनुभूति अंततः दर्द का कारण बन सकती है। इससे यौनेच्छा एक स्वनियंत्रित न होकर भड़काऊ कारक बन रही है।
     वैवाहिक संस्कार जैसे पवित्र गठबंधन को दीर्घकालीन बनाने से सुयोग्य जोड़े की आकांक्षा सभी की रहती है। वर्तमान में परिवर्तित परिवेश में इस गठबंधन के लिए की जाने वाली तलाश में सुयोग्य वर की तलाश ही के साथ शहरी व ग्रामीण अंचल दोनों के अभिभावकों का ध्यान केन्द्र शहरी क्षेत्र हो जाने के कारण ग्रामीण अंचल में अविवाहितों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। साथ ही ग्रामीण अंचल में इंटरनेट का प्रसार होने तथा अश्लील वीडियो सामग्री का प्रसार बढ़ने से अवैध संबंधों व बलात्कार के मामलों में भी निरन्तर वृद्धि हो रही है। यही नहीं शहरी क्षेत्रों में दो समानान्तर वर्ग 'कामकाजी' व 'काहिल' के रूप में उभर रहे हैं। शारीरिक आवश्यकताएँ सब ही की हैं और विवाह हेतु चयन-प्रक्रिया का आधार शारीरिक स्वास्थ्य या पौरुष न होकर 'अर्थ' और 'कार्य' वरीय आधार पर शीर्ष पर है। ऐसे में स्थिति ग्रामीण व शहरी दोनों अंचलों में शोचनीय बनती जा रही है। ऐसी स्थितियों में मनोवृत्ति में बदलाव क्षण भर में आ सकता है। इस कारक को नियंत्रित कर पाना अपने आप में दुष्कर कार्य है।
     आरुषि-हेमराज हत्याकांड की सुनवाई के अन्तिम चरण के दौर में एक फिल्मकार ने इस विषय पर फिल्म बनाने की घोषणा कर दी है। इस घोषणा के साथ ही समझा जा सकता है कि इस प्रकरण के मुख्य विषय के रूप में सर्वाधिक समय आरुषि-हेमराज के यौनेच्छाओं को उद्वेलित कर देने वाले दृश्यों के लिए ही रखा जाएगा। ऐसे में सकारात्मक सन्देश व्यावसायिक ध्येय के समक्ष गौण होकर रह जाता है। परमसत्ता जीवनदाता इस सृष्टि भर के लिए उपाय प्रदत्त नहीं करते केवल संकेत-मात्र देते हैं। बाकी सब उपयोग करने वालों पर छोड़ देते हैं। निवारक उपाय उपयोग करने वालों को ही करने होते हैं। अतः हमें इस संकेत को भी समझना चाहिए कि स्वनिर्मित परिस्थितियों को हम नियति न मानें। यह निश्चित है कि जिन परिस्थितियों से तलवार दम्पत्ति गुजरे उसी के समान और भी अनेक गुजर रहे होंगे। कुछ ने स्थितियों से समझौता कर लिया होगा, कुछ ने प्रतिवाद किया होगा तो कुछ ने समान व्यवहार भी किया होगा लेकिन वे सुर्खी नहीं बन सके होंगे। ऐसा इसलिए कि समान स्थितियाँ-परिस्थितियाँ आज सामान्य में परिवर्तित हो चुकी हैं। तब हम सब कुछ उनके भरोसे भी नहीं छोड़ सकते हैं। हमें संकेत को समझकर निवारक उपायों की तलाश में जुट जाना चाहिए। हमें समझना होगा कि उपचार भी समस्या के साथ ही जन्म लेते हैं-आवश्यकता है तो उन्हें तलाशने की और यह ही शोध भी है। आइए दृढ़ संकल्पित होकर समकक्ष स्थितियों-परिस्थितियों से समाज को समग्र रूप से बचाने के प्रयास करें। कहीं ऐसा न हो कि ये ही कारक विकराल अग्नि का रूप  धारण कर लें।
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