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सोच

कभी कभी सोचता हूं कि बालिकाएं कैसे घर भर को चहका देती हैं? हमारे परिवार में आज कनिष्ठतम सदस्य एक बालिका ही है और वह बच्ची प्रतिदिन कोई पल घर में ऐसा नहीं जाने देती जब सारा घर उल्लास से ना भर जाता हो। स्पष्टवक्ता और स्नेह की ऐसी मूर्ति जो साफ तौर पर हमारे ही परिवार के किसी पूर्वज की आत्मा होने को इंगित करती है। सारे संकेत स्पष्ट अभिव्यक्ति देते हैं। और! यह कि कितनी बड़ी ज़िम्मेदारियां बालिकाएं वहन करती हैं। कम-से-कम भारतीय परिवेश में तो ये ही सत्य है। बचपन कहां और भविष्य कहां? सर्वत्र अपने कर्तव्य का निर्वहन करना। और! इस प्रकार से कि अनुत्तीर्ण होना ही नहीं है। भारतीय युवतियों में से अधिकांश इस परीक्षा की घड़ी को सफलतापूर्वक और खुशी-खुशी तथा अपेक्षाओं के अनुसार पास करती हैं। मैंने महसूस किया है अपनी स्नेहमई मां को खोकर उन पलों को जब परिवार में कोई महिला सदस्य ना हो। मेरे परिवार में तीन सदस्य थे। मैं, मेरे पिता और मेरी माता जी। मेरी माता जी निरक्षर थीं पर ग्रामीण पृष्ठभूमि से होने के बाद भी हस्तशिल्प में पारंगत। और! उन्होंने मुझसे मेरे बचपन में ही अक्षर ज्ञान सहज भाव से ले लिया। यह सब इ...