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ए ट्रिप टु अयोध्या-एक यात्रा वृत्तांत (अपडेटेड)

भूमिका किसी भी धार्मिक यात्रा का वृत्तांत लिखना एक गहरा, भावनात्मक और आत्मीय अनुभव होता है। इस प्रकार की यात्रा अक्सर व्यक्ति को अपने भीतर की शांति और आत्मिक मार्गदर्शन की ओर ले जाती है। लिखते समय व्यक्ति अपनी आस्था, भावनाओं, और उस पवित्र स्थल के अनुभवों को शब्दों में ढालता है। इसके माध्यम से व्यक्ति धार्मिक स्थल की महत्ता, वहां की पवित्रता और वहां प्राप्त शांति का वर्णन करते समय व्यक्ति अपने आध्यात्मिक अनुभवों को साझा करता है।यात्रा के बाद होने वाले जीवन में परिवर्तन और उसे देखने का नया दृष्टिकोण लिखते समय व्यक्ति खुद के अनुभवों को फिर से जीता है। हमारे सर्वप्रिय साथी श्री हंसराज जी हंस द्वारा हमारे आग्रह पर अपनी धार्मिक यात्रा का वृत्तांत लिखना न केवल उस स्थल की महत्ता को दर्शाता है, बल्कि यह एक आत्मिक सफर का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत कर रहा है। विवरण आराध्य देव श्री रामचंद्र भगवान का नया मंदिर जब से अयोध्या में बना तब से ही बाल रूप भगवान के दर्शन की इच्छा प्रबल हो रही थी। पर यह शाश्वत सत्य है कि बिना ईश्वर के आशीर्वाद आप कुछ भी नहीं कर सकते है।जब उसको बुलाना होता है,तभी जाना सम्भव होता ...

एक नवाचार है 'डिजिटल उपवास'

     डिजिटल उपवास ही को डिजिटल डिटॉक्स के रूप में भी जाना जा सकता है। डिजिटल उपवास अर्थात् एक निश्चित अवधि के लिए डिजिटल उपकरणों और प्रौद्योगिकी से विराम लेने  और स्वयं को विराम व आराम देने का अभ्यास। इसमें स्मार्टफोन, कंप्यूटर, टैबलेट, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य डिजिटल विकर्षणों से जानबूझकर डिस्कनेक्ट करना सम्मिलित है। यदि आप आकलन करेंं तो डिजिटल उपवास विभिन्न कोणों से फायदेमंद हो सकता है।       इनमें मानसिक और भावनात्मक तंदुरूस्ती मुख्य है। डिजिटल उपकरणों और ऑनलाइन गतिविधियों के लगातार संपर्क में रहने से सूचना अधिभार, तनाव और लगातार जुड़े रहने की भावना पैदा हो सकती है। प्रौद्योगिकी से ब्रेक लेने से व्यक्तियों को रिचार्ज करने, तनाव के स्तर को कम करने और उनके समग्र मानसिक और भावनात्मक कल्याण में सुधार करने की अनुमति मिलती है।     बेहतर फोकस और उत्पादकता अप्रत्याशित परिणाम दे सकती है। डिजिटल डिवाइस अत्यधिक विचलित करने वाले भी हो सकते हैं, जिससे अक्सर उत्पादकता में कमी आती है और कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने में कठि...

क्या लिखूँ? - कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' (एक अभियंता के अपनी अर्धांगिनी के प्रति भाव व्यक्त करते हैं कि उसके प्रति प्रेम और विश्वास कितना गहरा था।)

क्या लिखूँ, कब तक लिखूँ, कितना लिखूँ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। मेरी द्युलोकवासी सहधर्मिणी का स्मृति कोश अर्थात 'कृष्णा स्मृति कोश' मेरे सामने रखा है। इस स्मृति कोश में न जाने कितनी स्मृतियाँ समाई हुई हैं जिनकी गणना करना असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है। हृदय जब भी उद्वेलित होता है तो अतीत की ओर भागने लगता है। 'कृष्णा जी' का नाम अधरों पर आते ही मन भावुकता में बह जाता है। पावन यादों की गठरी की गाँठ खुल जाती है और उस गठरी में सहेजे हुए यादों से भरे पन्ने इधर-उधर बिखर जाते हैं। मैं पुनः उन्हीं बिखरे पन्नों को समेटकर 'कृष्णा स्मृति कोश' में संभाल कर रखता रहता हूँ। इन पन्नों को समेटने में कोई भी मेरी सहायता नहीं कर सकता है। जो भी करना है मुझे ही करना है। 'कृष्णाजी' को इस नश्वर संसार को त्यागे हुए चार वर्ष से भी अधिक हो गये हैं, परन्तु मेरे हृदय पट पर समय की गति आज भी रुकी हुई है। मेरे मानस पटल पर जीवन भर के शब्द वाक्य दृष्टिगोचर होने लगते है। मैं उन्हें द्रवित होकर पढ़ने लगता हूँ और मैं अतीत की कहानी को चलचित्र की भांति देखकर और और अधिक भावुक हो उठता हूँ। सच...