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क्या लिखूँ? - कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' (एक अभियंता के अपनी अर्धांगिनी के प्रति भाव व्यक्त करते हैं कि उसके प्रति प्रेम और विश्वास कितना गहरा था।)

क्या लिखूँ, कब तक लिखूँ, कितना लिखूँ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। मेरी द्युलोकवासी सहधर्मिणी का स्मृति कोश अर्थात 'कृष्णा स्मृति कोश' मेरे सामने रखा है। इस स्मृति कोश में न जाने कितनी स्मृतियाँ समाई हुई हैं जिनकी गणना करना असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है। हृदय जब भी उद्वेलित होता है तो अतीत की ओर भागने लगता है। 'कृष्णा जी' का नाम अधरों पर आते ही मन भावुकता में बह जाता है। पावन यादों की गठरी की गाँठ खुल जाती है और उस गठरी में सहेजे हुए यादों से भरे पन्ने इधर-उधर बिखर जाते हैं। मैं पुनः उन्हीं बिखरे पन्नों को समेटकर 'कृष्णा स्मृति कोश' में संभाल कर रखता रहता हूँ। इन पन्नों को समेटने में कोई भी मेरी सहायता नहीं कर सकता है। जो भी करना है मुझे ही करना है। 'कृष्णाजी' को इस नश्वर संसार को त्यागे हुए चार वर्ष से भी अधिक हो गये हैं, परन्तु मेरे हृदय पट पर समय की गति आज भी रुकी हुई है। मेरे मानस पटल पर जीवन भर के शब्द वाक्य दृष्टिगोचर होने लगते है। मैं उन्हें द्रवित होकर पढ़ने लगता हूँ और मैं अतीत की कहानी को चलचित्र की भांति देखकर और और अधिक भावुक हो उठता हूँ। सच तो यह है कि माँ सरस्वती की अनुकम्पा से नित ही नूतन रचनाओं का सृजन होता रहता है। इन्हीं रचनाओं को करते-करते स्मृति कोश से कोई-न-कोई दृश्य मेरे समक्ष उपस्थित हो जाता है। हर दृश्य में मुख्य पात्र निभाती मुझे'कृष्णाजी' ही दिखाई पड़ती हैं। उस दृश्य से जो भाव उत्पन्न होते रहे हैं वहीं भाव काव्य का रूप धारणकर कागज पर उतरकर अमर हो गये हैं। ये ही काव्य रूपी भाव ‘कृष्णा स्मृति कोश' के अंग बन गये हैं। इससे पूर्व भी 'कृष्णाजी' की स्मृति में जो काव्य सृजन हुआ वह 'विरह पत्रिका' व 'गीत मनमीत' के रूप में प्रकाशित हो चुका है। इन पुस्तकों में भी सभी अतीत व वर्षगांठ की कहानियाँ अंकित हैं। विरह स्थिति से रूबरू होकर इसकी पीर का अहसास हो पा रहा है। एक शब्द है सीमा। जीवन में हर कर्म की सीमा निर्धारित होती है। हर कर्म सीमा अथवा मर्यादा में ही शोभा देता है, लेकिन मैंने अपने विषय में यह ही पाया है कि मैंने 'कृष्णाजी' की याद में सीमाओं का उल्लघंन किया है। किसी की याद में जब भी आँसू बहते हैं वो किसी सीमा तक ही न्यायसंगत हैं। किसी भी चीज की अति अच्छी नहीं होती है। अति स्वयं में ही अमर्यादित हो जाती है। लेकिन मेरा मन याद के सम्बन्ध में सीमा में बंधना नहीं चाहता। मैं ऐसी सीमाओं के उल्लंघन में किसी भी दोष की अनुभूति नहीं करता। मैं जब भी अतीत में दौड़ता हूँ, तो मुझे सुख मिलता है। ऐसा लगने लगता है कि वह अतीत मेरा वर्तमान बन गया है। यह भी उचित नहीं है कि कोई याद की तपन को अपने हृदय में दबाकर अन्दर ही अन्दर सुलगता रहे। अतः ये ही उचित लगता है कि बाद की तपन को नयनों के नीर से बुझाता रहूं। हृदय में भावों का भंडार होता है, लेकिन ये भाव भावों के भंडारे से तब ही बाहर आते हैं जब मां वाणी की कृपा होती है। मेरे हृदय से भाव बाहर आकर कागज पर उतरते चले जाते हैं। ये भाव ही काव्य रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। यह सब माँ सरस्वती की कृपा के साथ-साथ द्यूलोकवासी 'कृष्णाजी की भी मेरे प्रति सद्भावनाओं का फल है। 'कृष्णाजी' सूक्ष्म रूप में मौन साधना में लीन रहते हुए भी मुझे लिखने को प्रेरित करती हैं। मन में एक मीठा-मीठा दर्द मैं हमेशा अनुभव करता हूँ। ऐसा लगता है वो मेरी आज संबल हुई हैं। कभी-कभी उनकी आवाज मुझे विचलित कर देती है। मानो वो मुझसे कह रही है कि- भूल ना जाना कभी भूल से हर पल साथ तुम्हारे हूं मैं। जब भी हृदय पट खोलोगे देखोगे पट द्वारे हूं मैं।। जो भी लिखते पढ़ लेती हूं शब्द ना कोई कभी छूटता। नहीं किसी से मैं कह सकती जब पढ़ हृदय मेरा टूटता।। इसी तरह से निरन्तर हम दोनों की यह कहानी चलती आ रही है।वो है देवलोक की वासी मैं इस धरती का बंजारा। हर जीवन में अमर रहेगा ये पावनतम प्यार हमारा।। मैंने एक संस्कारी प्रतिष्ठित और एक स्वतन्त्रता सेनानी के ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया है। मूल रूप से एक अभियन्ता का ही मेरा कार्य क्षेत्र रहा है, लेकिन बचपन से ही आध्यात्मिक और भक्ति भावना ही हृदय में बलवती रही है। काव्य सृजन का पुनीत कर्म बचपन से आरम्भ होकर आज तक निरन्तर चलता आ रहा है। मेरे बालसखा डा. देशराज सिंह एक उच्च कोटि के कवि तथा नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के परम अनुयायी व उनके व्यक्तित्व ज्ञान से ओत प्रोत हैं। उनका मुझे बचपन से ही भ्रातृत्व सहयोग व प्रेरणा मिलती रही है। कृष्णाजी मेरी प्रथम श्रोता तथा प्रेरणा स्रोत थीं। उनके न रहने पर डा. देशराज सिंह ही इस उत्तरदायित्व को निभा रहे हैं। उन्होंने ही इस 'कृष्णा स्मृति कोश' की भूमिका लिख मेरे प्रति स्नेह की बौछार की है। मैं उनका हृदय से आभारी हूँ। 'कृष्णा स्मृति कोश' में कृष्णाजी के जीवनकाल से लेकर अब तक की उनके जन्म दिवस, शादी की वर्षगांठ, पुण्य तिथि, श्राद्ध दिवस, आदि पर उनकी याद में जो भी काव्य सृजन हुआ है वह कृष्णाजी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि है। मैं जीवन भर माँ सरस्वती की कृपा का याचक रहा हूँ। वे इसी प्रकार मुझ पर अपनी कृपा बरसाती रहेंगी और अपना प्यार और आशीर्वाद मुझे प्रदान करती रहेंगी। वैसे मुझे उनके प्यार व सहयोग की अनुभूति हर पल होती रहती है। इससे पूर्व बारह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 'कृष्णा स्मृति कोश' के साथ दो अन्य पुस्तकों - मनभावन भजनावली और 'कृष्ण काव्य विविध विधावली'- का भी लोकार्पण हो रहा है। प्रिय श्रीकान्त 'श्री' ओज कवि तथा प्रिय पवन शर्मा सुकवि ने भी अपने भाव लिखकर मेरा और द्यूलोकीवासी 'कृष्णाजी' का आशीर्वाद प्राप्त किया है। मैं अपने सभी कवि मित्रों का भी आभारी हूँ, जिन्होंने हमेशा मेरा उत्साहवर्धन किया है। मैं अपने दामाद प्रिय चि. संजय व पुत्री सौ. संजीता; दोनों नाती मुदित व पुलकित; नाती वधु गुड़िया सी अंशि; पुत्र मनीष और मोहित; दोनों बहुओं सौ. रेनू - रश्मि; पौत्री शैव्या - सोनाक्षी; पौत्र द्वियांक, विनायक को हृदय से आशीर्वाद देता हूँ जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मुझको सहयोग प्रदान करते रहे हैं। मैं आयुष्मती सपना जो मेरी पौत्री समान है और जिसने इस पुस्तक को टाइप करके अपना सहयोग दिया है को भी उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आशीर्वाद देता हूँ। मैं इस पुस्तक के प्रकाशक श्री संजय शर्मा (के.बी.एस. प्रकाशन दिल्ली) को भी हृदय से शुभाशीष देकर उनकी उन्नति की कामना करता हूं। त्रुटियों को नियंत्रित करने का भरसक प्रयास किया गया है। यदि फिर भी दृष्टव्य होती हैं, तो पाठकगण क्षमा करेंगे। जो भी मैंने जैसा लिखा है उसे अंगीकार कर अपना प्यार देते रहेंगे। मैं अपनी देवभूमि को भी हृदय से नमन करता हूँ जहाँ मैं साहित्यरत हूँ।

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