सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

तुलना लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सामाजिक गतिविधियां और व्यावसायिकता

     सामाजिक गतिविधियां समाज में अमूल-चूल परिवर्तन के ध्येय से की जाती थीं, लेकिन विगत कुछ वर्षों में आम जनजीवन में व्यवसायीकरण ने जो कदम रखा है तो मानो परिदृश्य पूरी तरह ही बदलता ही चला जा रहा है। आज समाज मानो एक कृत्रिम प्लेटफार्म बनकर रह गया है। प्रिंट मीडिया ने अपना स्वरूप बदला है और वह एक समाजसेवी की भूमिका निभाने को तत्पर नजर आ रहा है (गत दिवस पंद्रह जून, 2023 को परीक्षाओं में सफल विद्यार्थियों का अमर उजाला की पहल पर उत्तर प्रदेश शासन द्वारा प्रोत्साहित कराने का कार्यक्रम इसी श्रेणी में रखा जा सकता है।)। सच्चाई यह है कि व्यावसायिक दृष्टिकोण से समाजसेवा हो ही नहीं सकती। अलबत्ता समाज में भ्रम अवश्य उत्पन्न हो सकता है और हो भी रहा है।       पाठक भाइयो! तीन स्थितियां जान लीजिये कि  - नकारात्मकता को उभारकर सकारात्मकता की उम्मीद नहीं की जा सकती।  - संकीर्ण सोच के साथ व्यापक दायरा नहीं बनाया जा सकता! और -विरोधाभासी चीजों को कभी भी साथ नहीं लाया जा सकता।       इस जैसे प्रयासों का नतीजा अंततः हानिकर ही होगा। कुछ स्थितियों मे...

वैचारिकी का द्वंद्व

सोशल मीडिया पर उपलब्ध ढेरों ढेर विचारों को साझा करने में हम पल भर की भी देर नहीं लगाते। उन विचारों का नयनाभिराम सृजन वो लोग कर रहे हैं जिनको हमारी भाषा का पर्याप्त ज्ञान भी नहीं। साझा करने में हम शब्दों की सार्थक या निरर्थक प्रस्तुति को भूल उनको निरंतर साझा करके जो कुछ कर रहे हैं। वह सब निरर्थक बहस और परंपरा का वाहक बनता जा रहा है। साझा करें लेकिन वाक्य और शब्दों को समझकर।  ध्यान रहे कि वो हमें बहस की ओर भेज रहे हैं और हम अपनी अज्ञानता दर्शा रहे हैं। एक बानगी देखें। "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा" को यह विचार चरितार्थ कर रहा।  यदि सभी लोग किसी स्थिति, वाक्य या भाव का समझें तो उसमें गलत क्या है? और! कई ना समझें तो निश्चय ही मतभेद की स्थिति बनेगी।  हमारे पूर्वजों का तो शास्त्रार्थ के पीछे अपने सिद्धान्तों ही को पूर्णतः समझाना सदैव उद्देश्य रहा है। यह भारत के परिप्रेक्ष्य में सर्वकालिक तथ्य और सत्य है।  अब देखिए स्थितियों के विरोधाभासी तरीके कि समझ की तराजू से तुलना की गई है, जबकि तराजू का काम ही तौलना  है गुणवता परीक्षण कद...