सोशल मीडिया पर उपलब्ध ढेरों ढेर विचारों को साझा करने में हम पल भर की भी देर नहीं लगाते। उन विचारों का नयनाभिराम सृजन वो लोग कर रहे हैं जिनको हमारी भाषा का पर्याप्त ज्ञान भी नहीं। साझा करने में हम शब्दों की सार्थक या निरर्थक प्रस्तुति को भूल उनको निरंतर साझा करके जो कुछ कर रहे हैं। वह सब निरर्थक बहस और परंपरा का वाहक बनता जा रहा है। साझा करें लेकिन वाक्य और शब्दों को समझकर।
ध्यान रहे कि वो हमें बहस की ओर भेज रहे हैं और हम अपनी अज्ञानता दर्शा रहे हैं। एक बानगी देखें।
यदि सभी लोग किसी स्थिति, वाक्य या भाव का समझें तो उसमें गलत क्या है? और! कई ना समझें तो निश्चय ही मतभेद की स्थिति बनेगी।
हमारे पूर्वजों का तो शास्त्रार्थ के पीछे अपने सिद्धान्तों ही को पूर्णतः समझाना सदैव उद्देश्य रहा है। यह भारत के परिप्रेक्ष्य में सर्वकालिक तथ्य और सत्य है।
अब देखिए स्थितियों के विरोधाभासी तरीके कि समझ की तराजू से तुलना की गई है, जबकि तराजू का काम ही तौलना है गुणवता परीक्षण कदापि नहीं।
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