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शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏
आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें—
वह जो हारे का सहारा है,
जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी।
जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है,
और उजाले में भी दिन को बहार देता है।
वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है,
जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है।
जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है,
और धनी के लिए पौ-बराहा।
जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है।
जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा,
जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है।
🌹 वह सबका भला करें🌹
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आज का विचार
मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता —
सर्व धर्म समभाव
छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा,
मन में तूफानी कोलाहल है।
सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर,
धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है?
भूमि वही, आकाश वही,
तुझमें वही, मुझमें वही।
एक-सा ही सबका आंचल है,
धरती माँ का पावन आँचल है।
रक्त-कोष में बहता एक ही बल है,
कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है।
आब पियो या पानी पियो,
जल तो आखिर एक ही जल है।
यह कैसा आया भेद-रूपी पल है?
भिन्न-भिन्न नामों में जो बाँट रहे,
वह हृदयघाती एक छल है।
हरी कहो या अल्लाह कहो,
वही तो सबका सकल है।
तेरा सब कुछ है हे प्रभु,
फिर क्यों भेदरूपी यह दलदल है?
भूमिका
ये कविताएँ किसी प्रदर्शन की आकांक्षा से नहीं, बल्कि एक साधारण मनुष्य की भीतर की सच्चाइयों से उपजी हैं।
रचनाकार स्वयं को कवि सिद्ध करने नहीं आया है, वह तो केवल अपने अनुभव, संवेदनाएँ और समय के साथ अर्जित भाव पाठकों के सम्मुख रख रहा है—पूरी विनम्रता और संकोच के साथ।
इन रचनाओं में शब्दों का आडंबर नहीं, बल्कि भावों की सादगी है।
यह आग्रह नहीं है कि इन्हें सराहा ही जाए—
केवल इतना अनुरोध है कि इन्हें पढ़ा जाए और यदि ये किसी के मन को छू सकें, तो इन्हें आगे बढ़ने का अवसर मिल सके।
प्रत्येक कविता एक मनुष्य की सोच, उसकी जिम्मेदारी, उसकी संवेदना और समाज के प्रति उसकी दृष्टि का प्रतिबिंब है।
यदि इन पंक्तियों में कहीं आपको अपना अनुभव, अपनी पीड़ा, अपनी आशा या अपनी चुप्पी दिखाई दे—
तो समझिए कि रचना अपने उद्देश्य में सफल हुई।
साथियो, ये कविताएँ पाठक से कोई अपेक्षा नहीं रखतीं,
बस एक संभावना रखती हैं—
कि शायद कोई दिल, कुछ पलों के लिए ही सही,
ठहर कर पढ़ ले… और महसूस कर ले।
कविताएं
धर्म
धुरी धरा की निश्चित प्यारे,
अगन जरावे सम उजारे,
मृदा ऊसर उर्वर भूख मिटा रे ,
जल पिपासा को शांत सँवारे ,
चल रहे घूर्णन परिकर्मण सारे,
कोटिक तारे टिम टिमा रे,
चकोर चाँद को व्याकुल निहा रे,
चातक बरखा का ही पानी चाह रे,
कूकर टांग उठा मुतत जा रे,
हरियल धरा पे ना पांव पसारे,
हर जड़ चेतन निश्चित धर्म धयारे,
शेर हिरण को भग भग खा रे,
हिरण घास में जीवन ढूंढत जा रे,
बिच्छू जन्म पे मात उदर फाड़ निकारे,
जुगनू निशा में करे उजारे,
कौन किसको यंहा पढ़ा रे,
हरी का बोझा ,हरी लदा रे,
कुणबा घाणी कर कर सया रे,
मुर्ख मानव लड़ लड़ जा रे,
लिख दिए लेख न्यारे न्यारे,
किसी के हो बहु पौ बारहे,
किसी के हो गए बंटा धारे,
लकीर फ़क़ीर की पीटत जारे,
गोल धरती के किये किनारे,
एक हरी को बांटत जा रे,
कोई तो प्यारे टल्ली बजा रे,
कोई अजान खुभ लगा रे,
सब के सब बने करारे,
डारी पत्ती हरी सँवारे,
झूठे लग रहे झंझट झारे,
सबके सब मतलब का गा रे,
अपनी अपनी ढपली बजा रे,
सबके सब अपना धर्म सिहा रे,
फिर भी सुकूँ को ना पावत पा रे,
पंडत मन्त्र निश दिन गा रे,
दाढ़ी मुल्ला खूब बढ़ा रे,
क्षण की दुरी कोस बना रे,
मतलब को ही होश बना रे,
फिर रहे सब मारे मारे,
दीखते फिर भी हारे हारे,
पोथी पढ़ पढ़ धर्म बघा रे,
निर्बल को बलशाली खा रे,
लगे सब लारा लप्पा रे,
डर की खेती पे तख़्त सज़ा रे,
वक्त की सुई ना थामत पा रे,
भ्रम को धर्म रोज बना रे,
लुटे हुए को लूटत जा रे,
हृदय दबे को खोज बना रे,
प्रथम को ही दोज बना रे,
संचय को ही मौज बना रे!
कह खटाना धम्मू छंद सजा के,
हृदय भीतर हरी अल्लाह धयाके,
मिलता सुकूँ बस प्रेम को पाके,
देखो इक बार प्रेम को धर्म बना के,
घृणा को जुट जाओ जड़ से मिटा के!
मिट जायेंगे सब साके फाके!!
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मेरी पुस्तक "मेरे हृदय उद्गार" काव्य संकलन से कविता
धैर्य
भावनाओं के बवंडर मे!
हो रही गहन उथल पुथल!!
डर, क्रोध, असुरक्षा बैरी दल के दल!
साहस अकेला कहाँ खुद मे सबल!!
आएंगे सुख - दुःख बदल बदल!
सताएँगे पराजय के दंश पल - पल!!
अन्तः के कूप से कुछ ऐसा निकाल बल!
खिल सके कीचड़ मे भी कमल!!
मथने पे पाया पारावार सा एक बल!
अब होगा ना भय क्या होगा कल!!
पाके इसको लगता मन निश्छल जल!
अब लगता जैसे लक्ष पहुंचे अटल!!
तैयार हो चुका ईमारत का गहरी नींव सा तल!
हूं हर्षित दिया हरी ने धैर्य रूपी सम्बल!!
हर रुकावट के रोड़ा को करता निर्बल!
हर समस्या का समाधान है ये हल!!
निर्धन, कमजोर के पास कुछ हो ना हो!
पर धीरज के अस्त्र से हर हार जाती टल!!
अबला कि आबरू का धैर्य से बढ़ता चीर प्रबल!
विश्वास के पिटारे मे झाँक चला चल!!
सब शोर मौन होंगे अरी, बैरी, दावानल!
हट जायेंगे मैल मन के, मन होगा निर्मल !!
बह जा बहावों मे जैसे बहे सरित तरल!
हटा मिटा क्रोध, कपट, जैसे चिपटे गरल!!
असुरक्षा सिखाती बस करना छल!
धैर्य सिखाता करुणा, दया, मलमल!!
उर्वरा सी बूटी विचारों कि है ये हर्बल!
रुक जाती इससे जल्दबाजी, चपलता, चंचल!!
रख पास इसे ह्रदय मे बसा वीर प्रबल!
हो जाता रास्ता इससे कठिन भी सरल!!
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मन
मन के हारे हार है ,
मन के जीते जीत ,
जो तेरा मन चाहेगा ,
उस तै लागे प्रीत !
मन है बैरी बावला ,
रखता नहीं निश्चित हित,
कभी गाये राग मल्हार ,
कभी गाता है गीत !
जिस तन जीता मन को ,
हो गयी पक्की जीत,
डांट डपट के रोक ले ,
मन है बालू की भीत !
कर्म कुकर्म की लेखनी ,
मन की पुराणी रीत,
कभी भविष्य की बात करे ,
रहता फिर फिर अतीत !
उमस में नमी ढूंढ़ ले ,
उष्म कर दे शीत,
डाटे ना डाट पावै प्यारे ,
ये है ढिटन में ढीठ!
कभी पुरवाई चैन चुराए ,
कभी लगे है हिठ,
कभी व्हेल ,हाथी बन जावै,
कभी बन जावै सूक्ष्म कीट!
कभी किसी से मन उकतावे,
कभी किसी से लग जावै मीत
बुरा भला कुछ ना होवें,
चाह है मन की रीत!
हारे का मन ही सहारा ,
मन के माने जीतन में जीत
गरीबी रहीसी कुछ भी नहीं ,
बस मन की सोची टीस!
खारा भी मीठा लागै,
जब मन में हो प्रीत !
बरखा की रिमझिम कीचड़ खाना ,
जब तक ना लागै मन का मीत!
कहत"खटाना धम्मू "दिल से !
मस्तिष्क पे मत हावी होने दे ,
मन के ये अप्रतिम गीत !🌹!
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मेरी पुस्तक कविता संग्रह 'मेरे हृदय उद्गार' से कविता
कहाँ गए संस्कार
फैसलों ने फासले कम किये!
सुर भी हमारे शोर हो लिए!!
दुआएं दारुण सी धिक्कार रही!
मानव कि मानवता कहाँ गयी!!
खूँ के रिश्ते भी अब फीके हुए!
धन लोलुप हथियार तीखे हुए!!
बुड्ढे माँ बाप बे आसरे लाचार से!
रिश्ते क्यों नहीं रहे प्यार के!!
"डर"गौतम "बुद्ध " हो लिए!
हँसते थे जो आज रो लिए!!
जीये तो कैसे जीये!
क्यों, कैसे और किसके लिए!!
बांध पट्टी पेट पर!
दिया था मुख का निवाला निकाल के!!
माँ सोई थी गीले मे!
रखा था नाजों से संभाल के!!
नखरे नाज इतने थे औलादो के!
किये डटकर हर संकट फौलादो के!!
घर कहाँ अब मकाँ बने!
खड़े है सिहाते अब तने!!
छोरा ने ले गयी भूतली!
छोरी ने ले गए भूत!!
माँ बाप देखे फाड़े आँखे!
रह गए खाली ऊत के ऊत!!
सकरात को रूठना मनाना कहाँ रहा!
खासना, मठारना ना जाने कहाँ गया!!
हर नये अनुभव से!
सीखना सिखाना कहाँ रहा!!
पहुंच गए हम सभ्यता के चरम पर!
अब सब का ठेका है धर्म पर!!
धन के ढेर है सबसे बड़े बेशर्म पर!
ओछे लोग सिहाते नीच कर्म पर!!
पर है विश्वास कि एक पिड्ढी बदलाव लाएगी!
इस जहनुम को जन्नत बनाएंगी!!
ना कोई औलाद माँ बाप को रोटी के लिए तरसाएगी!
खायी जो खुदी उसको भराएगी!!
हर चेहरे, हर घर, हर आंगन मे मुस्काँ लौटाएगी!
औपचारिकताये नहीं दिल हृदय के रिश्ते बनाएंगी!🌹!
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मेरी पुस्तक 'मन के जीते जीत और मन के हारे हार है!' से मेरी कविता
चाहोगे वही मिलेगा
चाहत के बीज को,
इतना गहरा,
बोता चल!
डाट डपट कर,
मन पर लगा विराम,
मन चंचल!!
मौत बावरी आती,
निश्चित है,
परम अटल!
काम आएगा,
विश्वास जगा,
निश्छल मन!!
धरे धरा पर,
रह जायेंगे सब,
चल अचल!
विरोध अवरोध अस्थायी,
कर विश्वास,
तुझमें बल!!
सोच - सोच के,
कुछ नहीं,
जायेंगे ये पल!
जो चाहेगा, वो मिलेगा,
सब विद्या,
ज्ञान व तरल!🌹!
धर्मेंद्र खटाना "धम्मू "
दमदमा
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