कभी कभी सोचता हूं कि बालिकाएं कैसे घर भर को चहका देती हैं? हमारे परिवार में आज कनिष्ठतम सदस्य एक बालिका ही है और वह बच्ची प्रतिदिन कोई पल घर में ऐसा नहीं जाने देती जब सारा घर उल्लास से ना भर जाता हो।
स्पष्टवक्ता और स्नेह की ऐसी मूर्ति जो साफ तौर पर हमारे ही परिवार के किसी पूर्वज की आत्मा होने को इंगित करती है। सारे संकेत स्पष्ट अभिव्यक्ति देते हैं। और! यह कि कितनी बड़ी ज़िम्मेदारियां बालिकाएं वहन करती हैं। कम-से-कम भारतीय परिवेश में तो ये ही सत्य है। बचपन कहां और भविष्य कहां? सर्वत्र अपने कर्तव्य का निर्वहन करना। और! इस प्रकार से कि अनुत्तीर्ण होना ही नहीं है। भारतीय युवतियों में से अधिकांश इस परीक्षा की घड़ी को सफलतापूर्वक और खुशी-खुशी तथा अपेक्षाओं के अनुसार पास करती हैं।
मैंने महसूस किया है अपनी स्नेहमई मां को खोकर उन पलों को जब परिवार में कोई महिला सदस्य ना हो। मेरे परिवार में तीन सदस्य थे। मैं, मेरे पिता और मेरी माता जी। मेरी माता जी निरक्षर थीं पर ग्रामीण पृष्ठभूमि से होने के बाद भी हस्तशिल्प में पारंगत। और! उन्होंने मुझसे मेरे बचपन में ही अक्षर ज्ञान सहज भाव से ले लिया। यह सब इतने सामान्य तरीके से हुआ कि मैं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर रह गया। ये पल मुझको अहसास करा गए कि मां क्या होती है।
मेरे बचपन में ही उनसे बिछुड़ जाने के बाद वर्षों वर्ष हम पिता पुत्र ही परिवार में रहे। ऐसे में एक परिवार की पुत्री को उसका भविष्य बनाने के लिए बोर्डिंग में भेजे जाने का मामला मेरे संज्ञान में आया और फिर उस बच्ची के स्वावलंबी होकर आत्मनिर्भर होकर सफल होने तक का भी। उस बच्ची ने अपनी बाल्यावस्था में बोर्डिंग जाते वक़्त दो शब्द लिखकर छोड़े जिन्होंने अपनी छाप उसके अभिभावकों पर छोड़ी और शब्दों में समाविष्ट दर्द भी। सच तो यह है कि अनुभूतियों को बालिकाएं ही श्रेष्ठ रूप में प्रस्तुत कर सकती हैं।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...
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