विद्यालय में होने वाली प्रार्थना विद्यालय में संस्कार देने का सबसे प्रभावी कार्यक्रम है। विश्व के सभी देशों में, सभी संस्कृतियों में, सभी परंपराओं में प्रार्थना अनादि काल से चलती आई है। विश्व के सभी भागों के निवासी किसी न किसी रूप में कार्य की शुरुआत से पूर्व मन ही मन, मौन रहकर, सस्वर अथवा गाकर ईश्वर की प्रार्थना करते हैं। भारतीय संस्कृति में भी प्रार्थना का अहम स्थान है। सुख एवं दु:ख दोनों ही परिस्थितियों में प्रार्थना मनुष्य को शक्ति प्रदान करती है, आत्मबल को बढ़ाती है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। बच्चे भी जब विद्या अध्ययन के लिए विद्यालय आते हैं तो पठन-पाठन प्रारम्भ करने से पूर्व वे प्रार्थना सभा में ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। इससे शिक्षण के लिए आवश्यक वातावरण का निर्माण तो होता ही है एकाग्रता का संस्कार भी बनता है। पारिवारिक चर्चाओं और पारिवारिक वातावरण से बाहर निकलकर बालक शिक्षा प्राप्ति के लिए मानसिक रूप से अपने आपको तैयार करता है। प्रार्थना सभा वह स्थल है जहाँ संबंधित विद्यालय के शैक्षिक, सामाजिक एवं मानसिक व आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा, चिंतन, मनन होता है। प्रार्थना स्थल एक प्रकार से विद्यालय का दर्पण है। 1947 से लेकर अब तक की सभी शिक्षा नीतियाँ, सभी शिक्षा आयोग जिस चरित्र निर्माण और मूल्य आधारित शिक्षा की लगातार बात कहते हैं उसे प्रदान करने का सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रार्थना सभा ही है। इसे आधुनिकता का प्रभाव मानें अथवा विद्यालय के आंतरिक तनाव और कामकाज की अधिकता कि वर्तमान में कभी-कभी प्रार्थना सभा का आयोजन गौण होता नजर आता है। ऐसा लगता है जैसे शिक्षक, छात्र व विद्यालय प्रशासन केवल औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए सवेरे एक स्थल पर एकत्र होकर राष्ट्र गान, राष्ट्रगीत, प्रतिज्ञा तथा प्रार्थना का गायन करते हैं। प्रार्थना कार्यक्रम जितना महत्त्वपूर्ण है उसका आयोजन भी उसी उत्साह से होना चाहिए। अनेक विद्वानों एवं शिक्षा मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि एक तरफ प्रार्थना सभा और दूसरी तरफ दिन भर की सारी शैक्षणिक गतिविधियाँ..... तब भी प्रार्थना सभा ज़्यादा शिक्षाप्रद, ज़्यादा उपयोगी और संस्कारमय है। हममें से अधिकांश शिक्षक साथी इसको कितनी गंभीरता से लेते हैं, यह विचारणीय पक्ष है और आत्मावलोकन का विषय है। अनेक विद्यालयों में प्रभावी प्रार्थना कार्यक्रम को लेकर अच्छा प्रयास होता है।
पर, जरा एक विचार करें कि शिक्षक भी छात्रों के साथ प्रार्थना कर लें तो थोड़ा-सा अकल्पनीय लगता है। कुछ लोगों को ढोंग या नाटक भी लग सकता है। पर.... थोडा-सा मनन करें तो प्रार्थना सभा में यह सहभाग हमारे लिए व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से लाभदायक ही रहेगा। बच्चों पर तो ज़बरदस्त सकारात्मक प्रभाव होगा ही क्योंकि बच्चे माता-पिता और गुरुजनों के आवरण से भी अनेक बातें सीखते हैं।
विद्यार्थी भी शिक्षा के साधक है और हम भी शिक्षा के साधक है। ऐसे में हम शिक्षक प्रार्थनातीत कैसे हो सकते हैं? शिक्षकों के लिए तो प्रार्थना करना ज़्यादा उपयोगी और करणीय कार्य है। मेरा मानना है कि शिक्षक को भी प्रार्थना में सहभागी होना चाहिए। सस्वर बोलें या मौन रहें पर प्रार्थना के समय आँखें बंद करके एक स्थान पर बैठना चाहिए। यह बहुत लाभदायक है। यह सब मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। प्रार्थना सभा में प्रार्थना के अलावा होने वाले अन्य कार्यक्रमों में चाहे वह बैठकर सहभागी हो अथवा वहाँ अपने स्थान से खड़े हो जाए पर प्रार्थना में सक्रिय सहभागी होना चाहिए।
सामान्यतया हमारे यहाँ पर प्रार्थना के बोल होते हैं-
"हमको मन की शक्ति देना मन विजय करें......,
सुबह सवेरे लेकर तेरा नाम प्रभु हे शारदे माँ हे शारदे माँ अज्ञानता से हमें तार दे माँ....,
सच्चा वीर बना दे माँ, हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी, अम्ब विमल मति असतो माँ सद्गमय.....,
इतनी शक्ति हम हमें देना दाता,
मन का विश्वास कमजोर हो ना।"
इन सब प्रार्थनाओं में ऐसी कौन-सी बात है जो केवल विद्यार्थियों द्वारा ही अंगीकार की जानी चाहिए हम शिक्षकों के द्वारा नहीं। विचार करेंगे तो ध्यान में आएगा कि आज की इस अत्यंत तनावपूर्ण जिंदगी में हमको भी मन की शक्ति चाहिए, हमको भी मन को विजय करने की आवश्यकता है, हमको भी अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली शक्ति की जरूरत है।
शिक्षक बनने के बाद पहले दिन से ही प्रार्थना सभा मेरी रुचि का विषय रहा है। विद्यालय में यदि उपस्थित हूं तो विद्यालय की प्रार्थना सभा कभी नहीं छोड़ी। हालांकि शिक्षक बनने के बाद पिछले कई वर्षों तक तो मैंने भी कभी स्कूल में बच्चों के साथ बैठकर, आँखें बंद करके, हाथ जोड़कर कभी प्रार्थना नहीं की थी, लेकिन एक बार गोदन विद्यालय में कार्यरत था, उस समय एक बार प्रार्थना सभा में मस्तिष्क में यह विचार आया। मौसम भी मस्त था, शीतल मंद पवन चल रही थी। प्रार्थना स्थल पर अग्रेसर (प्रार्थना बोलने वाले) बच्चों के लिए एक चबूतरे जैसा स्टेज बना हुआ है। वहीं पर उनके पास बैठ कर कई दिन तक बच्चों के साथ, उन्हीं की तरह प्रार्थना करने का यह प्रयोग किया। वास्तव में यह बहुत अच्छा अनुभव रहा। दिन भर के लिए पर्याप्त ऊर्जा मिल जाती हैं। गोदन में यह प्रयोग बाद में लगभग नियमित हो गया। फिर स्थान परिवर्तन होने से रेवत विद्यालय आना हो गया। यहाँ प्रारंभ में कोई व्यवस्थित स्टेज नहीं था। विद्यालय परिसर छोटा होने के कारण स्टेज बनाने के लिए स्थान भी नहीं था। वर्षा जल संग्रहण का एक गोल टाँका (भूमिगत टैंक) था। संस्थाप्रधान श्री छगनपुरी जी से आग्रह करके टाँके की गोलाई को बाहर से कुछ दीवार जैसा करके चौकोर मंच का स्वरूप दिया, तो प्रार्थना-स्थल थोड़ा व्यवस्थित लगने लगा। यहाँ भी बच्चों के साथ प्रार्थना करने का यह प्रयोग प्रारंभ किया है। अच्छा लगता है एक दो और भी स्टाफ साथियों का प्रार्थना करने का मन बन रहा है। आप भी करके देखें, बच्चों के साथ मंच पर ही अथवा विभिन्न कक्षाओं की पंक्तियों में सबसे पीछे अथवा कुर्सी पर बैठ कर ..... जैसे भी जंचे, प्रार्थना ज़रूर करें।
शिक्षक के, बच्चों के, विद्यालय के, परिवार के और शिक्षा के लिए यह शुभ और लाभप्रद ही है।
प्रार्थना सभा के सकारात्मक उद्देश्य को समझने पर हम पाएँगे कि प्रार्थना सभा विद्यालय की शिक्षण अधिगम प्रणाली के आरंभ होने से पूर्व होने वाली एक औपचारिक सभा मात्र नहीं है, बल्कि उस दिन के विद्यालय की सभी गतिविधियाँ सही ढंग से चलें तथा विद्यालय में शिक्षा का उचित माहौल तैयार हो. इसके लिए प्रार्थना का आयोजन करवाया जाता हैं। प्रभावी प्रार्थना सभा नव बालकों में अच्छे चरित्र के गुण विकसित करने में मदद करती है। यह वह समय होता है जब पूरा विद्यालय परिवार एकत्र होता है, एक नज़र में निहारा जा सकता है। छात्र व शिक्षक, सभी उपस्थित होते हैं। प्रार्थना आयोजक के निर्देश पर समस्त क्रियाएँ संपन्न करने तथा अनुशासन में रहने के कारण बाल मन में विभिन्न गुण अनायास ही विकसित हो जाते हैं। ऐसे में यदि आप उनके साथ बैठे हैं तो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष बहुत लाभ होने वाले हैं। केवल प्रार्थना अवधि तक ही बैठना है। प्रतिज्ञा, समाचार वाचन जैसी अन्य गतिविधियों में भले स्थान छोड़ दें।
जब किसी काम में मन से लगते हैं तो उस कार्य से संबंधित नए विचार, रचनात्मक विचार और आइडिया स्वतः आने लगते हैं। काम कोई भी हो उसमें नवीनता लाने पर काम में उत्साह बढ़ता है, आनंद आता है। पिछले दिनों एक प्रयोग किया। राजस्थान में पिछले दिनों बोर्ड की परीक्षाएँ चल रही थी अतः कक्षा 8, 10, 12 इन तीन कक्षाओं के बच्चे विद्यालय नहीं आ रहे थे। तीनों कक्षा मिलाकर लगभग 160 छात्र संख्या कम हो गई। प्रार्थना सभा भी कुछ खाली खाली लगने लगी। ऐसे में प्रार्थना सभा में छात्रों के बैठने की स्थिति में कुछ नए प्रयोग किए। विद्यार्थियों को सीधी पंक्ति में बिठाने की बजाय गणित की विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों के आधार पर, गणितीय संकेतों के आधार पर, अपनी सांस्कृतिक परंपरा के कुछ चिह्नों के आधार पर, भूगोल की रचनाओं के आधार पर प्रार्थनास्थल पर बैठक व्यवस्था में बिठाया। जैसे वर्ग, आयत, त्रिभुज, जोड, बाकी, गुणा, भाग, स्वस्तिक संरचना, सूर्य किरण संरचना, संकेंद्रीय आकाशगंगा इत्यादि।
जैसा कि हम जानते हैं। अनेक विद्वान भी ऐसा मानते हैं कि विद्यालय में आठों कालांश में होने वाली पढ़ाई एक तरफ और विद्यालय की प्रार्थनासभा एक तरफ। तो भी दोनों पलड़े बराबर ही होंगे, विद्यालय की प्रातःकाल की प्रार्थना का इतना महत्त्व है। प्रार्थना सभा के प्रति विद्यार्थियों में रुचि और उत्साह बना रहे इसके लिए ऐसे कुछ नए प्रयोग कभी कभी किए जा सकते हैं। लगातार कई दिन तक विभिन्न सरंचनाओं में बैठकर प्रार्थना करने में बच्चों को बहुत आनंद आया। प्रार्थना कार्यक्रम में उनका सक्रिय सहभाग बढ़ा। विलम्ब से विद्यालय आने वाले छात्रों की संख्या में कमी आई।
सामान्य दिनों में जब सारी कक्षाएं उपस्थित होती हैं, तो छात्र संख्या अधिक होने के कारण छोटे मैदान में यह प्रयोग करना संभव नहीं हो पाता, किंतु बोर्ड परीक्षाओं के दौरान छात्र संख्या कम थी तो विद्यालय के मैदान को भरने में यह प्रयोग बहुत सहायक सिद्ध हुआ। विद्यालय का मैदान तो भरा भरा ही अच्छा लगता है ना। बच्चों को इतना आनंद आया कि कई बार तो छात्रों ने स्वयं सुझाया कि अगले दिन किस सरंचना में बैठना है।
एक दिन कुछ ऊँचाई से प्रार्थना सभा के इस दृश्य के फोटो लिए। दृश्य अत्यंत मनोरम, मनमोहक था। दो तीन बार अलग-अलग सरंचनाओं के फोटो लिए। सुंदर, आकर्षक दृश्य। बाद में फ़ोटो लेने बंद कर दिए क्योंकि मूल उद्देश्य फ़ोटो लेना नहीं था। एक दिन विद्यालय की प्रार्थना सभा की नई सरंचना वाली कुछ फोटो सोशल मीडिया पर शेयर कर मित्रों को इस प्रयोग की जानकारी दी। सभी को यह बहुत अच्छा लगा, सभी ने इसे सराहा। दो दिन में तो विभिन्न अन्य विद्यालयों के फोटो आने शुरू हो गए। इस प्रयोग को बहुत प्रतिसाद मिला। 5-6 दिन में 25 से अधिक विद्यालय के समाचार मिल गए कि उन्होंने अपने यहाँ भी यह प्रयोग किया है। अच्छे प्रयोग करने के प्रति स्वीकार्यता बढ़ रही है यह बहुत अच्छी स्थिति है। सप्ताह में एक बार या महीने में दो तीन बार प्रार्थना सभा में ऐसे कुछ विशेष प्रयोग किए जा सकते हैं। सामान्यतः नियमित रूप से सीधी पंक्ति बनाकर प्रार्थना करवाना ही उचित रहेगा।
कभी कभी होने से उत्सुकता, उत्साह और रोचकता बनी रहेगी। बस्ता मुक्त शनिवार की एक गतिविधि के रूप में भी शनिवार की प्रार्थना सभा मे यह विविधता पूर्ण प्रयोग कर सकते हैं। प्रार्थना सभा में करने जैसे और भी अनेक प्रयोग कर सकते हैं जैसे हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी भाषाओं में क्रमशः प्रतिज्ञा बुलवाना, विभिन्न भाषाओं में अच्छे गीत सीखकर, उन्हें मासिक गीत के रूप में प्रार्थना में अभ्यास करवाना इत्यादि। ऐसे और भी अनेक प्रकार के नए-नए प्रयोग प्रार्थना सभा में किया जाना अपेक्षित है ताकि हमारी प्रार्थना सभा आनंददायी, रोचक, ज्ञानवर्धक और संस्कारक्षम बने। हर बार यह याद रखना अति आवश्यक है कि हमारा अंतिम लक्ष्य बालक की अंतर्निहित शक्तियों का विकास करना है, बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है। प्राचीन भारत में भी शिक्षा का यही लक्ष्य था, स्वतंत्रता आंदोलन के समय विभिन्न राष्ट्रीय विद्यालय संचालित करने वाले शिक्षाविदों का भी यही लक्ष्य था और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का भी यही लक्ष्य है, क्योंकि यही शिक्षा का शाश्वत लक्ष्य है।
संदीप जोशी (व्याख्याता)
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, रेवत,
जालोर (राज.)
शि.वि.रा. (शिक्षा विभाग राजस्थान) पत्रिका से साभार
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