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समझने की जरूरत

प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के कभी अज्ञात रहे पर अब ज्ञात शहीदों में सम्मिलित बाबा शाहमल की स्मृति में हुए कार्यक्रम निःसन्देह प्रशंसनीय हैं और जनमानस को इस दिशा में पर्याप्त जागरूक कर सकते हैं, पर उस संग्राम का नेतृत्व करने वाले स्वतन्त्रता सेनानी समेत विभिन्न समुदायों के अन्य कभी के अज्ञात और अब ज्ञात स्वतन्त्रता सेनानियों की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान उस समय की सबसे बड़ी निजी सेना वाले परीक्षितगढ़ के कदम सिंह समेत वाल्मीकि समुदाय के शान्ति-प्रेरक मातादीन का स्मरण भी प्राय: नहीं किया जाता है। स्थानीय इतिहासकार बागपत जिले के बासौद में तो वृक्षारोपण कर सकते हैं पर मेरठ जनपद के निकट स्थित प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व करने वाले क्रांतिनायक धन सिंह कोतवाल, भीषण जन-हानि करने वाले गाजियाबाद जिले के निकटवर्ती ग्राम सीकरी कलां और तत्कालीन सबसे बड़ी सेना वाले परीक्षितगढ़ के कदम सिंह के क्षेत्र में या फिर मातादीन समेत अन्य समुदायों के स्वतन्त्रता सेनानियों की स्मृति में जनमानस को जागरूक करने को कार्यक्रम नहीं करते। आखिर इस सब के मूल में क्या है? यह खेद का विषय है कि समभाव रखते हुए सही परिप्रेक्ष्य में न तो कल इतिहास को रखा गया था न आज रखा जा रहा है। तमाम तथा सर्वज्ञात होने के बावजूद भी नियोजित तरीके से जनमानस के समक्ष परोसा जा रहा है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि वैयक्तिक - स्तर पर राष्ट्रीय धरोहरों का महिमामंडन हो रहा है। वाल्मीकि, मुस्लिम और गुर्जर स्वयं कार्यक्रमों का आयोजन कर इन राष्ट्रीय धरोहरों का महिमामंडन करने लगे हैं, जबकि ऐसे आयोजन स्थानीय इतिहासकारों के निर्देशन में समग्र समाज के द्वारा किए जाने चाहिए थे।

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