समाज में सभी अपने प्रभाव में वृद्धि करने के ध्येय से भ्रम फैलाने के कार्य में किसी ना किसी रूप में अवश्य संलिप्त रहते हैं और ऐसा सिर्फ धर्म को लेकर ही नहीं कहा जा सकता। भ्रम ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति वास्तविक और काल्पनिक में अंतर नहीं कर पाने के कारण मतिभ्रम का शिकार हो जाता है। इस रोग की दशा में व्यक्ति काल्पनिक चीज़ों पर अधिक विश्वास करता है। भ्रम कई मानसिक रोगों का भी एक लक्षण हो सकता है और वास्तविकता का भी। भ्रम रोग उसे कहते हैं, जब व्यक्ति को मुख्य रूप से भ्रम की ऐसी समस्या उत्पन्न हो रही हो जिसमें वास्तविकता के समतुल्य काल्पनिकता भी हो। भ्रम ऐसी स्थिति है जिसमें रोगी एक महीने या उससे अधिक समय के लिए एक या एक से अधिक विषय के बारे में भ्रमित रहता है। भ्रम से ग्रस्त व्यक्ति अपने सामान्य कार्य करता रहता है और कोई भी अजीब व्यवहार नहीं करता। हालांकि, वह भ्रम से इतना अधिक प्रभावित हो जाता है कि इससे उसके सामान्य जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।
भ्रम हो धर्म हो या फिर कुछ और इन सब में विवेक की प्रमुख भूमिका होती है। अतः हमको अपने विवेक का उपयोग निश्चित ही करना चाहिए।
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