चिंता रोग बीमारी नहीं है और न ही दिमागी फितूर। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें सकारात्मक सोचने और बेहतर परिणाम तक पहुंचने की इंसान की स्वाभाविक क्षमता कम हो जाती है। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि एग्जाम से ठीक पहले आपके हाथ-पैर कांपने लगे हों, या फिर सेवा साक्षात्कार से पहले हथेलियों में पसीना आने लगा हो? असल में ये किसी बीमारी का संकेत नहीं हैं बल्कि किसी बड़ी घटना से पहले ये खुद को तैयार करने का शरीर का अपना तरीका है। दिमाग से आने वाले ये संकेत घटना के शुरू होते ही जितनी तेजी से उठे थे उतनी ही तेजी से शांत भी हो जाते हैं। धीरे-धीरे सांसों की गति और हृदय गति सामान्य होने लगती है। ये चिंताएं हमें किसी भी इवेंट के लिए मानसिक रूप से तैयार होने में मदद करती हैं।
अगर ये चिंता बिना किसी स्पष्ट कारण के होने लगे, तब जरूर ये परेशान करने वाली बात हो सकती है। कई लोगों में यह समस्या चरम पर पहुंचने के बाद उनके रोजमर्रा के कामों और उनकी जिंदगी को प्रभावित करने लगती है। ऐसी हालत में इसे चिंता रोग या एंग्जाइटी डिसऑर्डर कहा जा सकता है। वक्त पर इलाज और करीबियों का साथ इस बीमारी से निपटने में अहम भूमिका निभाता है।
लक्षण
- हृदयगति में अनियमितता
- मांसपेशियों में अनावश्यक तनाव
- छाती में खिंचाव
- चिंतित रहने की प्रवृत्ति
- गैरजरूरी चीज से अनावश्यक व अत्यधिक लगाव
इसमें करीब रहने वालों के लिए निम्न सावधानियां अपेक्षित हैं -
- मरीज को अकेला ना छोड़ें।
- पूरी नींद लें और प्रयास करें कि मरीज भी पूरी नींद ले।
- योगा और मेडिटेशन नियमित रूप से करें।
- मनोरोग विशेषज्ञ के संपर्क में रहें।
- तनाव मुक्त रहें और रोगी पर भी तनाव हावी ना होने दें।
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