जिसे अपनों की दुआओं ने बचा लिया
कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें हम अपनी स्मृतियों से नहीं, बल्कि माँ की आँखों और उनकी सुनाई बातों से जानते हैं। उम्र इतनी छोटी होती है कि घटना के सारे दृश्य याद नहीं रहते, लेकिन माँ-बाप के मन पर अंकित वह समय कभी मिटता नहीं।
मेरी माँ आज भी मुझे मेरे बचपन की वह घटना सुनाती हैं। उस समय मेरी उम्र करीब तीन साल थी। पापा सेना में थे और उनकी पोस्टिंग जैसलमेर में थी। मैं गाँव में माँ के साथ रहती थी। हमारा घर कच्चा था। माँ घर की दीवारों पर गारा लगा रही थीं। उस समय गाँव में मिट्टी और छोटे-छोटे कंकड़ों से बने गारे से कच्चे घरों को मजबूत और सुंदर बनाया जाता था।
मैं अपनी संझा दीदी के साथ खेल रही थी। वह मुझे खिलाती थीं, मेरे पीछे दौड़ती थीं और मैं भी अपनी छोटी-सी दुनिया में हँसती हुई उनसे बचकर भागती रहती थी। तीन साल की उम्र में दुनिया कितनी सरल होती है—न किसी डर का पता, न किसी आने वाले संकट का अंदाजा।
लेकिन उस दिन खेलते-खेलते मैं अचानक गिर गई।
गिरना तो बचपन में कोई बड़ी बात नहीं होती। बच्चे गिरते हैं, रोते हैं और थोड़ी देर बाद फिर खेलने लगते हैं। मगर मेरे उस गिरने के साथ एक ऐसी कहानी शुरू हुई, जिसने मेरे माता-पिता को भीतर तक हिला दिया।
मेरे पैर में एक छोटा-सा कंकड़ घुस गया था।
शुरुआत में वह चोट बहुत मामूली लगी। किसी ने शायद सोचा भी नहीं होगा कि पैर में चुभा यह छोटा-सा कंकड़ आगे चलकर इतना विकराल रूप ले लेगा कि मेरी जिंदगी और मेरा पैर दोनों संकट में पड़ जाएंगे।
माँ ने मेरा इलाज करवाया और पैर पर पट्टी बँधवा दी। उन्हें उम्मीद थी कि कुछ दिनों में चोट ठीक हो जाएगी। लेकिन समय बीतने के साथ दर्द कम होने के बजाय बढ़ता गया।
मेरे पैर में मवाद भरने लगी।
दर्द इतना बढ़ गया कि मैं बार-बार रोती और चीखती थी। माँ मुझे देखकर परेशान हो जातीं। गाँव में उस समय चिकित्सा की सुविधाएँ आज जैसी नहीं थीं। अस्पताल दूर थे और हर जगह तुरंत इलाज मिल जाना आसान नहीं था। फिर भी माँ ने हिम्मत नहीं छोड़ी।
वह मुझे लेकर एक जगह से दूसरी जगह जाती रहीं।
जहाँ किसी ने इलाज की उम्मीद दिखाई, वहाँ गईं। जरूरत पड़ी तो दूर तक गईं। मुझे टोंक तक लेकर गईं। हर बार माँ के मन में यही उम्मीद होती होगी कि शायद अब उनकी बच्ची ठीक हो जाएगी।
लेकिन मेरी तकलीफ बढ़ती जा रही थी।
पापा उस समय जैसलमेर में अपनी ड्यूटी पर थे। एक तरफ तीन साल की बच्ची का बढ़ता हुआ दर्द और दूसरी तरफ दूर तैनात पति—माँ के लिए वह समय कितना कठिन रहा होगा, इसका एहसास मुझे आज होता है।
उस कठिन समय में गाँव के कुछ लोगों ने भी हमारा साथ दिया। मेरे ताऊजी माँ के साथ मुझे दिखाने लेकर गए। पड़ोस के अर्जुन अंकल भी माँ के साथ मुझे इलाज के लिए लेकर गए।
उनकी कोई मजबूरी नहीं थी। न उन पर मेरी देखभाल की कोई जिम्मेदारी थी। उन्होंने सिर्फ इंसानियत और अपनापन समझकर हमारा हाथ थामा।
आज सोचती हूँ तो लगता है, विपत्ति रिश्तों की असली पहचान कराती है।
खुशी में साथ खड़े होने वाले बहुत मिल जाते हैं, लेकिन जब रास्ता कठिन हो, जब कोई अपने दर्द में टूट रहा हो, तब बिना किसी स्वार्थ के उसके साथ चलने वाला ही सच्चा अपना होता है।
लेकिन मेरी परेशानी अभी खत्म नहीं हुई थी।
मेरे पैर में मवाद बहुत अधिक भर चुकी थी। स्थिति धीरे-धीरे गंभीर होती जा रही थी। आखिरकार डॉक्टर ने ऐसी बात कही, जिसे सुनकर मेरी माँ के पैरों तले जमीन खिसक गई।
डॉक्टर ने बताया कि मवाद बहुत बढ़ गई है, अंदर की हड्डी गलने लगी है और अगर स्थिति नहीं संभली तो पैर काटना पड़ सकता है।
मैं उस समय केवल तीन साल की थी।
मुझे क्या मालूम था कि मेरे पैर के बारे में इतनी बड़ी बात हो रही है?
मैं तो केवल अपने दर्द को जानती थी।
लेकिन मेरी माँ उस दर्द के पीछे छिपा भविष्य देख रही थीं।
उनके सामने उनकी छोटी-सी बच्ची थी और एक ऐसा डर, जिसका सामना करने की कल्पना भी किसी माँ के लिए असहनीय है।
पापा उस समय हमसे दूर थे। उन दिनों आज की तरह मोबाइल फोन हर हाथ में नहीं होते थे। किसी बड़े-बुजुर्ग के घर लैंडलाइन फोन आया और माँ को वहाँ बुलाया गया।
फोन पर पापा थे।
माँ ने पापा को मेरी हालत बताई। बात करते-करते उनकी आवाज भर्रा गई और वह रोने लगीं।
पापा ने घबराकर पूछा—
“क्या हुआ?”
माँ ने रोते हुए बताया कि डॉक्टर कह रहे हैं कि मवाद बहुत बढ़ गई है, अंदर की हड्डी गलने लगी है और शायद पैर काटना पड़े।
एक पिता के लिए इससे बड़ा डर क्या हो सकता है कि उसकी छोटी-सी बेटी का पैर बचने की स्थिति में नहीं है?
पापा ने देर नहीं की।
वह अपनी ड्यूटी से हमारे पास आने के लिए निकल पड़े।
जब वह डॉक्टर के सामने पहुँचे तो उन्होंने अपने पद का सहारा नहीं लिया, कोई बहस नहीं की। उन्होंने केवल एक पिता बनकर अपनी बच्ची के जीवन की गुहार लगाई।
उन्होंने डॉक्टर के सामने हाथ जोड़ दिए और कहा—
“प्लीज, मेरी बच्ची के जीवन का सवाल है। आप इसका पैर मत काटिए। जैसे भी हो, इसका इलाज कर दीजिए।”
उस समय पापा के दिल पर क्या बीती होगी, यह मैं आज समझ सकती हूँ।
क्योंकि अब मैं स्वयं माँ हूँ।
आज मेरी बेटियों को जरा-सी चोट लगती है तो मेरा मन घबरा जाता है। उनके चेहरे पर दर्द देखती हूँ तो मन करता है कि उनका दर्द मुझमें आ जाए।
तो मेरी माँ ने उस समय क्या महसूस किया होगा, जब उनकी तीन साल की बच्ची दर्द से चीख रही थी?
कैसे उन्होंने मेरी हर चीख सुनी होगी?
कैसे अपने आँसू रोककर मुझे संभाला होगा?
कैसे हर बार मुझे इलाज के लिए लेकर गई होंगी?
और पापा ने अपनी आँखों के सामने वह डर कैसे सहा होगा कि उनकी बेटी शायद फिर अपने पैरों पर न चल पाए?
माँ और पापा दोनों की माता जी में गहरी आस्था थी।
उस समय उन्होंने माता जी के सामने जाकर प्रार्थना की।
माँ ने कहा—
“माता जी, मेरी बेटी को कुछ भी हो जाए, लेकिन उसका पैर नहीं कटना चाहिए।”
यह केवल शब्द नहीं थे।
यह एक माँ के हृदय से निकली वह पुकार थी, जिसमें अपनी बच्ची के जीवन की पूरी आस समाई हुई थी।
इलाज शुरू हुआ।
उस समय चिकित्सा सुविधाएँ आज जैसी नहीं थीं। न दर्द कम करने के इतने साधन थे और न इलाज इतना सहज था। मेरे पैर में बहुत अधिक मवाद भर गई थी। जब इलाज के दौरान मवाद निकाली जाती, तो मैं दर्द से चीख उठती थी।
मैं तो केवल तीन साल की थी। मुझे क्या पता था कि मेरे पैर में लगी एक छोटी-सी चोट इतनी बड़ी विपत्ति बन चुकी है।
मुझे तो बस अपना दर्द महसूस होता था।
लेकिन मेरी चीखों का दर्द सिर्फ मेरे शरीर तक सीमित नहीं था।
हर चीख मेरी माँ के हृदय को चीरती थी और हर आँसू मेरे पिता की आँखों में उतर आता था।
माँ मुझे अपनी गोद में थामे रहतीं। शायद वह चाहती होंगी कि मेरे हिस्से का सारा दर्द उनके हिस्से में आ जाए। वह मुझे सहलातीं, समझातीं और खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश करतीं, लेकिन उनकी आँखों से बहते आँसू उनकी मजबूरी और ममता दोनों की कहानी कह देते थे।
पापा भी अपनी बच्ची को इस हालत में देखकर रोते थे।
जिस पिता ने अपनी बेटी को कभी अपनी उँगली पकड़कर चलते देखा था, उसी पिता के सामने आज उसके पैर को काटने की बात हो रही थी।
यह सोचकर आज भी मेरा मन भर आता है।
और आज, जब मैं स्वयं माँ हूँ, तब जाकर उस घटना का दर्द मेरी समझ में आता है।
बचपन में मुझे अपना दर्द दिखाई देता था, लेकिन माँ बनने के बाद मुझे अपने माता-पिता का दर्द दिखाई देने लगा।
आखिरकार वह समय भी आया जब मेरा पैर नहीं काटना पड़ा।
इलाज हुआ और धीरे-धीरे वह भयानक संकट टल गया।
आज मैं अपने दोनों पैरों पर चलती हूँ। अपने काम करती हूँ। अपनी बेटियों के पीछे भागती हूँ। जिंदगी के रास्तों पर अपने कदमों से आगे बढ़ती हूँ।
और जब पापा मुझे अपने पैरों पर चलते हुए देखते हैं, तो उनके चेहरे पर जो खुशी होती है, उसमें शायद उस पुराने डर की पूरी कहानी छिपी होती है।
कभी एक समय ऐसा था, जब उन्हें डर था कि उनकी बेटी शायद अपने पैरों पर कभी चल ही न पाए।
और आज वही बेटी उनके सामने अपने पैरों पर चल रही है।
मेरी माँ आज भी जब यह कहानी सुनाती हैं तो मैं भावुक हो जाती हूँ।
सोचती हूँ—मेरे पैर में तो एक छोटा-सा कंकड़ चुभा था, लेकिन उस चोट ने मेरे माता-पिता के जीवन में कितना बड़ा तूफान खड़ा कर दिया था।
माँ ने अपनी बच्ची के लिए हर दरवाजा खटखटाया।
पापा ने दूर जैसलमेर से दौड़कर आकर डॉक्टर के सामने हाथ जोड़ दिए।
ताऊजी और अर्जुन अंकल जैसे लोगों ने कठिन समय में हमारा साथ दिया।
और मेरे माता-पिता ने माता जी के सामने अपनी बच्ची के लिए दुआ माँगी।
शायद इसी को कहते हैं—अपनापन।
अपनापन केवल रिश्ते का नाम नहीं है।
अपनापन वह है, जहाँ सामने वाले का दर्द देखकर मन अपने आप उसके पास चला जाए।
जहाँ कोई यह न सोचे कि “यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है।”
जहाँ किसी की विपत्ति में उसका हाथ पकड़कर बस इतना कहा जाए—
“घबराओ मत, मैं साथ हूँ।”
मेरी जिंदगी की यह घटना मुझे बार-बार यही सिखाती है कि इंसान की असली पहचान उसके सुख में नहीं, बल्कि किसी दूसरे के दुख में दिखाई देती है।
और फिर भी, इन सबके ऊपर मेरी माता जी की कृपा को मैं कैसे भूल सकती हूँ?
किसी ने इलाज किया, किसी ने रास्ता दिखाया, किसी ने साथ दिया, मेरे माता-पिता ने अपनी पूरी ताकत लगा दी—लेकिन अंततः मेरी जिंदगी बची, मेरा पैर बचा, तो उसमें उस शक्ति की कृपा भी थी, जिस पर मेरे माता-पिता ने उस कठिन समय में अपना विश्वास रखा था।
आज मैं जब अपने पैरों पर खड़ी होती हूँ, तो मुझे लगता है कि मेरे हर कदम के पीछे मेरे माता-पिता की वह प्रार्थना है।
मेरी माँ की ममता है।
मेरे पिता की बेचैनी है।
कुछ अपनों का निस्वार्थ साथ है।
और माता जी का आशीर्वाद है।
कभी-कभी जिंदगी हमें बहुत छोटी-सी चोट देकर बहुत बड़ा सबक दे जाती है।
मेरे पैर में चुभा वह छोटा-सा कंकड़ मेरे लिए सिर्फ एक चोट नहीं था।
वह मेरे माता-पिता के प्रेम की गहराई का प्रमाण था।
वह इंसानियत की पहचान था।
वह अपनों के साथ का अर्थ था।
और वह उस आस्था की कहानी थी, जिसने मेरे माता-पिता को सबसे कठिन समय में भी उम्मीद से जोड़े रखा।
मैं तब केवल तीन साल की थी।
आज मैं बड़ी हो गई हूँ, खुद माँ बन गई हूँ, लेकिन मेरी माँ की सुनाई वह कहानी आज भी मेरे भीतर कहीं उसी छोटी-सी बच्ची को जगा देती है।
और तब मन से बस एक ही बात निकलती है—
ईश्वर, मुझे उस माँ-बाप का प्रेम समझने की शक्ति देना, जिन्होंने मेरे लिए अपने हिस्से का हर डर सह लिया।
क्योंकि कुछ ऋण ऐसे होते हैं, जिन्हें पूरी जिंदगी भी चुका पाना संभव नहीं होता।
उन्हें बस सिर झुकाकर स्वीकार किया जाता है।
और मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य यही है कि—
जिसे अपनों की दुआओं ने बचा लिया, वह मैं हूँ।
सृजक
प्रस्तुति







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