शिष्टाचार भेंट
उलझन सुलझन के प्रतिनिधि ने सघन जनसंपर्क अभियान के अंतर्गत समाज की कुछ अद्वितीय प्रतिभाओं एवं विशिष्ट व्यक्तित्वों से शिष्टाचार भेंट की। इस दौरान उन्होंने उन्हें उलझन सुलझन समाचार-पत्र तथा उलझन सुलझन अभियान के उद्देश्यों से अवगत कराया।
भेंट के दौरान समाज में अपने-अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही ऐसी प्रतिभाओं की उपलब्धियों को व्यापक जनसमुदाय तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने की आवश्यकता पर चर्चा हुई, जिनकी योग्यता और योगदान समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन सकते हैं।
उलझन सुलझन का उद्देश्य ऐसे ही सामान्य परिवेश से उभरकर अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले व्यक्तित्वों और उनकी उपलब्धियों को मंच प्रदान करना है, ताकि उनकी प्रेरक यात्रा समाज के अन्य लोगों, विशेषकर नई पीढ़ी, के लिए मार्गदर्शक बन सके।
इसी उद्देश्य से इन प्रतिभाओं से प्राप्त विवरण एवं उनके कार्यों को उलझन सुलझन के ब्लॉग पर प्रस्तुत करने का निर्णय लिया गया, ताकि उनकी उपलब्धियाँ व्यापक स्तर पर समाज तक पहुँच सकें और अधिक से अधिक लोग उनसे प्रेरणा ले सकें।
साधारण से असाधारण पहचान तक
वेदपाल सिंह
मिलनसार और मृदुभाषी वेदपाल जी
जिला कमांडेन्ट (होमगार्ड्स) वेदपाल सिंह का जीवन इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा को यदि संकल्प, अनुशासन और कर्मठता का साथ मिल जाए तो साधारण परिस्थितियाँ भी असाधारण उपलब्धियों की राह बन सकती हैं।
डॉ. देशराज सिंह के ग्रामीण अंचल से आने वाले इस शिष्य ने अपने जीवन को जिस धैर्य, लगन और संकल्प के साथ सँवारा है, वह निश्चित रूप से किसी को भी गर्व से भर देने वाला है। एक सामान्य खेतिहर परिवार और अपने ग्राम के परिवेश से निकलकर उन्होंने शिक्षा को अपनी प्रगति का आधार बनाया। अध्ययन के दौरान वे स्वयं को किसी असाधारण विद्यार्थी के रूप में भले ही स्थापित न कर पाए हों, लेकिन आगे बढ़ने की उनकी ललक और कुछ कर गुजरने का संकल्प लगातार मजबूत होता गया।
ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विज्ञान विषय के अपने गाँव के इस प्रथम उच्च शिक्षित युवा ने एम.फिल. शिक्षाशास्त्र से की। एक शिक्षित के रूप में वेदपाल सिंह की जीवन यात्रा स्वयं में प्रेरणादायक है। जिस परिवेश में उच्च शिक्षा के अवसर सहज उपलब्ध नहीं होते, वहाँ से निकलकर शिक्षाशास्त्र जैसे विषय में एम.फिल. तक पहुँचना उनके दृढ़ निश्चय और शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
अध्ययन काल पूरा करने के बाद उन्होंने संकल्पबद्ध होकर होमगार्ड विभाग की शासकीय सेवा में प्रवेश किया। सेवा में आने के बाद उन्होंने स्वयं को केवल निर्धारित दायित्वों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपनी कार्यक्षमता, नेतृत्व क्षमता और सक्रियता के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया। धीरे-धीरे उनकी पहचान ऐसे अधिकारी के रूप में बनी, जो जिम्मेदारी मिलने पर उसे केवल निभाता नहीं, बल्कि अपनी क्षमता की पूरी ऊर्जा उसके साथ लगा देता है।
उनकी इसी अद्वितीय कार्यक्षमता और विभाग के प्रति उल्लेखनीय योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली और उन्हें राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल उनके पद अथवा सेवा-अवधि का सम्मान नहीं, बल्कि उस कार्यनिष्ठा का सम्मान है जिसके बल पर उन्होंने अपने विभाग में एक विशिष्ट पहचान बनाई।
आज जिला कमांडेन्ट (होमगार्ड्स) के दायित्व का निर्वहन करते हुए वे जिस जिम्मेदारी और अनुशासन के साथ कार्य कर रहे हैं, वह उनके उस सफर की परिणति है जिसकी शुरुआत एक सामान्य ग्रामीण खेतिहर परिवार से हुई थी। उनकी यात्रा इस बात को प्रमाणित करती है कि किसी व्यक्ति का प्रारंभिक परिवेश उसकी अंतिम पहचान तय नहीं करता; उसकी इच्छाशक्ति, शिक्षा, कर्मठता और निरंतर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति ही उसकी वास्तविक पहचान बनाती है।
लेकिन वेदपाल सिंह की कहानी केवल होमगार्ड विभाग की शासकीय सेवा और राष्ट्रपति पदक तक सीमित नहीं है। उनके व्यक्तित्व का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है—समाज के प्रति उनका समर्पण।
उन्होंने एक सामाजिक संगठन के साथ जिस निष्ठा और सक्रियता से सहभागिता की, वह अपने आप में उल्लेखनीय है। इस सहभागिता को केवल औपचारिक उपस्थिति के रूप में देखना उनके योगदान को कम करके आँकना होगा। उन्होंने संगठन के कार्यों में अपनी क्षमता, समय और अनुभव का जिस प्रकार उपयोग किया, वह उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
विगत चौदह वर्षों के योगदान को यदि एक तराजू पर रखा जाए तो उसमें वेदपाल जी की सहभागिता वाला एक वर्ष भी कई वर्षों पर भारी दिखाई देता है। यह बात उनके योगदान की मात्रा से अधिक उसकी गुणवत्ता, प्रभाव और समर्पण को रेखांकित करती है।
उनका यह पक्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि जिला कमांडेन्ट (होमगार्ड्स) जैसे महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन करते हुए भी उन्होंने सामाजिक सरोकारों के लिए अपनी सक्रियता बनाए रखी। यह संतुलन बताता है कि उनके लिए सेवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व की एक व्यापक भावना है।
वेदपाल सिंह का व्यक्तित्व इसलिए विशिष्ट बनता है क्योंकि उनके जीवन में ग्रामीण संस्कार, खेतिहर परिवार की सादगी, विज्ञान विषय में एम.फिल. तक की उच्च शिक्षा, शासकीय सेवा का अनुशासन, अद्वितीय कार्यक्षमता, राष्ट्रपति पदक का सम्मान और सामाजिक सरोकार—ये सभी आयाम एक साथ दिखाई देते हैं।
उनकी जीवन-यात्रा उस पीढ़ी के लिए विशेष संदेश रखती है जो यह मान बैठती है कि सीमित संसाधन उसके सपनों की सीमा भी तय कर देते हैं। वेदपाल जी का जीवन बताता है कि संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन संकल्प सीमित नहीं होना चाहिए।
एक सामान्य ग्रामीण खेतिहर परिवार से निकलकर होमगार्ड विभाग में अपनी विशिष्ट पहचान बनाना, शिक्षाशास्त्र विषय में एम.फिल. तक शिक्षा अर्जित करना, अपनी कार्यक्षमता के लिए राष्ट्रपति पदक हासिल करना और साथ ही सामाजिक संगठन के लिए उल्लेखनीय योगदान देना—यह यात्रा निश्चित रूप से केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है; यह उस ग्रामीण भारत की क्षमता का उदाहरण है, जिसे अवसर और दिशा मिल जाए तो वह किसी भी ऊँचाई को छू सकता है।
वेदपाल सिंह चपराणा की कहानी उसी प्रेरणा का नाम है—
साधारण शुरुआत, उच्च शिक्षा, स्पष्ट संकल्प, असाधारण कर्मठता और समाज के प्रति निरंतर उत्तरदायित्व।
उलझन सुलझन ऐसे ही व्यक्तित्वों को समाज के सामने लाने का प्रयास कर रहा है, ताकि केवल उपलब्धियों की चमक ही नहीं, बल्कि उन उपलब्धियों के पीछे छिपे संघर्ष, संस्कार, संकल्प और सामाजिक योगदान को भी समाज पहचान सके।
झलकियाँ (पुरस्कार, मोमेंटो और सम्मान पत्र)
सामाजिक सरोकारों पर सार्थक विमर्श
कभी-कभी छोटी-सी मुलाकात अपने आकार से कहीं अधिक बड़े विचारों को जन्म दे जाती है। ऐसी ही एक आत्मीय और शिष्टाचारपूर्ण भेंट के अवसर पर एक लघु बैठक आयोजित हुई, जिसमें कुल चार लोग सम्मिलित थे, लेकिन चर्चा का दायरा किसी एक व्यक्ति, संस्था अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। बातचीत सहज थी, वातावरण पूरी तरह तनावमुक्त था और सभी ने बिना किसी औपचारिकता के अपने विचार खुलकर रखे।
इस लघु बैठक में शिक्षक प्रवीण चौधरी, समीर पंवार, पंकज पंवार और व्यवसायी संजीव चौहान सम्मिलित रहे। चारों की पृष्ठभूमि अलग-अलग होने के बावजूद बातचीत का केंद्र एक ही था—हम अपने स्तर पर समाज के लिए ऐसा क्या कर सकते हैं, जिसकी शुरुआत के लिए किसी बड़े संसाधन, पद या संस्था की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता न हो?
चर्चा के दौरान कई ऐसे विषय सामने आए, जो सामान्यतः हमारे आसपास मौजूद रहते हैं, हमें चिंतित भी करते हैं, लेकिन अक्सर चिंता और चर्चा से आगे नहीं बढ़ पाते। यही इस बैठक की विशेषता रही कि इन विषयों को केवल समस्या के रूप में देखने के बजाय यह विचार किया गया कि इन पर छोटे-छोटे स्तरों पर तत्काल कार्य कैसे आरंभ किया जा सकता है।
दस्तावेजीकरण—चर्चा का प्रमुख केंद्र
बैठक में सबसे महत्वपूर्ण विषय के रूप में दस्तावेजीकरण उभरकर सामने आया। पहली दृष्टि में दस्तावेजीकरण एक सामान्य शब्द लग सकता है, लेकिन सामाजिक संदर्भ में इसका महत्व अत्यंत व्यापक है।
हमारे आसपास प्रतिदिन अनेक सकारात्मक कार्य होते हैं। कोई शिक्षक किसी बच्चे के जीवन में परिवर्तन लाता है, कोई व्यक्ति चुपचाप किसी जरूरतमंद की सहायता करता है, कोई संस्था वर्षों से शिक्षा, पर्यावरण या सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में काम कर रही होती है, कोई गांव अपनी परंपरा और लोकज्ञान को बचाए हुए है और कोई युवा बिना किसी प्रचार के नई पहल शुरू करता है। लेकिन इनमें से कितने प्रयास स्थायी रूप से दर्ज हो पाते हैं?
अक्सर नहीं।
जो दर्ज नहीं होता, वह धीरे-धीरे सामूहिक स्मृति से बाहर हो जाता है।
यही कारण है कि सामाजिक दस्तावेजीकरण को केवल लेख लिखने या समाचार प्रकाशित करने की प्रक्रिया मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह समाज के अनुभवों, संघर्षों, उपलब्धियों, प्रयोगों, विचारों और स्थानीय ज्ञान को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने का माध्यम है।
लेखन में नागरिक सहभागिता क्यों घट रही है?
चर्चा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि आज हमारे पास सूचना के अनेक माध्यम हैं, लेकिन सार्थक सामाजिक लेखन में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
हम घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी हैं, अनुभवों के सहभागी हैं और अपने आसपास होने वाले परिवर्तनों के साक्षी भी हैं, फिर भी उन्हें लिखने, दर्ज करने और साझा करने की आदत धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं—समय का अभाव, यह संकोच कि “हम लेखक तो हैं नहीं”, अपने विचारों को महत्व न देना अथवा यह मान लेना कि किसी घटना का दस्तावेजीकरण किसी और की जिम्मेदारी है।
जबकि वास्तविकता यह है कि हर नागरिक अपने आसपास के समाज का संभावित दस्तावेजकार है।
किसी गांव के बुजुर्ग के पास उस क्षेत्र का ऐसा इतिहास हो सकता है, जो किसी पुस्तक में उपलब्ध न हो। किसी शिक्षक के पास शिक्षा के क्षेत्र के दशकों के अनुभव हो सकते हैं। किसी व्यवसायी के पास स्थानीय अर्थव्यवस्था और समाज में आए बदलावों की महत्वपूर्ण समझ हो सकती है। किसी युवा के पास वर्तमान पीढ़ी के प्रश्नों और संभावनाओं का अनुभव हो सकता है।
यदि ये अनुभव लिखे नहीं गए, तो आने वाली पीढ़ियां इनसे वंचित रह जाएंगी।
शुरुआत अपने स्तर से
बैठक में यही विचार प्रमुखता से सामने आया कि सामाजिक परिवर्तन के लिए हमेशा बड़े मंच की आवश्यकता नहीं होती। कई बार शुरुआत केवल चार लोगों की बातचीत, एक नोटबुक, एक मोबाइल फोन या एक छोटे-से लेख से हो सकती है।
किसी स्थानीय समस्या को दर्ज करना, किसी अच्छे प्रयास की कहानी लिखना, किसी प्रेरक व्यक्ति का साक्षात्कार लेना, किसी गांव की परंपरा को संकलित करना, किसी शिक्षक के अनुभव को सुरक्षित करना या किसी सामाजिक पहल का क्रमबद्ध विवरण तैयार करना—ये सभी दस्तावेजीकरण के छोटे लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास हो सकते हैं।
जरूरत केवल इतनी है कि हम अपने आसपास को देखने के साथ-साथ दर्ज करना भी शुरू करें।
यह कार्य किसी एक संस्था या समूह तक सीमित नहीं होना चाहिए। विद्यालय, महाविद्यालय, सामाजिक संगठन, युवा समूह, स्थानीय पत्रकार, लेखक, शिक्षक, व्यवसायी और सामान्य नागरिक—सभी इसमें अपनी भूमिका निभा सकते हैं।
चिंता से संकल्प की ओर
इस बैठक की सबसे सकारात्मक बात यह रही कि चर्चा किसी निराशाजनक निष्कर्ष पर समाप्त नहीं हुई। इसके विपरीत, चिंतित करने वाले विषयों के बीच यह विश्वास लगातार बना रहा कि यदि समस्या हमारी है तो समाधान की शुरुआत भी हमारे ही स्तर से हो सकती है।
शायद यही छोटी बैठकों का वास्तविक महत्व है। वे हमेशा बड़े निर्णय नहीं लेतीं, लेकिन वे विचारों को गति देती हैं। वे प्रश्न पैदा करती हैं, दृष्टिकोण साझा करती हैं और कभी-कभी किसी ऐसे कार्य की नींव रख देती हैं, जिसका प्रभाव आगे चलकर बहुत व्यापक हो सकता है।
यह भेंट भी मूलतः शिष्टाचार की भेंट थी, लेकिन बातचीत ने इसे एक सार्थक सामाजिक विमर्श में बदल दिया। चार व्यक्तियों की यह छोटी-सी बैठक इस विश्वास के साथ आगे बढ़ी कि समाज को बदलने से पहले समाज को समझना, और समाज को समझने के लिए उसके वर्तमान को ईमानदारी से दर्ज करना आवश्यक है।
दस्तावेजीकरण इसलिए भी जरूरी है कि आज का सामान्य-सा अनुभव कल का महत्वपूर्ण सामाजिक संदर्भ बन सकता है। आज लिखी गई एक छोटी-सी बात कल किसी शोधकर्ता, विद्यार्थी, लेखक या आने वाली पीढ़ी के लिए मूल्यवान सामग्री बन सकती है।
अंततः बात केवल लेखन की नहीं है।
बात अपनी भूमिका को पहचानने की है।
बात अपने समय को दर्ज करने की है।
बात समाज की स्मृति को सुरक्षित रखने की है।
और शायद इस दिशा में पहला कदम किसी बड़े आयोजन से नहीं, बल्कि ऐसी ही एक छोटी, सहज और मुक्त भाव वाली बैठक से उठता है।
आपके मूल भाव, आत्मीयता और शिष्टाचार-भेंट की श्रृंखला को बनाए रखते हुए इसे अधिक प्रवाहपूर्ण, संस्मरणात्मक और व्यक्तित्व-केंद्रित रूप में विस्तार दिया है।
अगला गंतव्य
श्री शेषराज सिंह
शिष्टाचार भेंटों की यह छोटी-सी यात्रा जब श्री शेषराज सिंह जी तक पहुँची, तो लगा जैसे किसी ऐसे व्यक्तित्व के सान्निध्य में प्रवेश कर रहे हों, जिसने अपने जीवन में अभियांत्रिकी को केवल एक पेशे के रूप में नहीं, बल्कि सोचने और जीवन को व्यवस्थित करने की एक पद्धति के रूप में अपनाया है।
शेषराज सिंह जी वर्षों से विविध समुदायों के बीच सहभागिता, संवाद और सामंजस्य स्थापित करने के प्रयासों में सक्रिय रहे हैं। लोगों को जोड़ना, उनके बीच संवाद के सेतु बनाना और सामाजिक स्तर पर परस्पर समझ को मजबूत करना उनके व्यक्तित्व का सहज हिस्सा रहा है। जीवन के आठहत्तरवें वर्ष में प्रवेश कर चुके शेषराज जी के भीतर आज भी वही ऊर्जा, वही जिज्ञासा और वही सक्रियता दिखाई देती है, जो सामने वाले को भी उत्साहित और ऊर्जित कर देती है।
हमारी भेंट में उनके व्यक्तित्व का एक और अत्यंत प्रभावशाली पक्ष सामने आया—अभियांत्रिकी और लेखन के प्रति उनका सतत जुड़ाव। अभियंता के रूप में उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र में ऊँचाइयों को स्पर्श किया, लेकिन सक्रिय जीवन से स्वयं को अलग करने के बजाय आज भी इंजीनियरिंग से जुड़ी गतिविधियों में मुक्त भाव से संलग्न रहते हैं। उनके लिए अनुभव समाप्त हो जाने वाली कोई चीज नहीं, बल्कि निरंतर उपयोग और साझा किए जाने वाली संपदा है।
उनसे हुई बातचीत केवल बातचीत नहीं थी; वह अनुभवों, विचारों और सीख से भरी एक प्रेरणास्पद यात्रा थी। उनकी अभियान्त्रिकीय दृष्टि केवल उनके तकनीकी कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी दैनिक गतिविधियों में भी सहज रूप से दिखाई देती है। चाहे स्टाफ के कार्य-दायित्वों का निर्धारण और प्रबंधन हो अथवा पुस्तकों को व्यवस्थित रखने के लिए बनाए गए रैक्स—हर जगह एक सुविचारित व्यवस्था, उपयोगिता और कार्यकुशलता दिखाई देती है।
विशेष रूप से उनकी स्टडी ने ध्यान आकर्षित किया। घर से कुछ दूरी पर स्थापित यह स्थान उनके लिए महज अध्ययन-कक्ष नहीं, बल्कि चिंतन, पठन, लेखन और निरंतर बौद्धिक सक्रियता का केंद्र है। पुस्तकों को व्यवस्थित रखने से लेकर अध्ययन की सुविधा के लिए स्थान के प्रत्येक हिस्से के उपयोग तक, वहाँ उनकी इंजीनियरिंग दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है। ऐसा लगता है मानो उन्होंने अपने अध्ययन-कक्ष को भी एक सुव्यवस्थित परियोजना की तरह विकसित किया हो—जहाँ प्रत्येक वस्तु का अपना स्थान और प्रत्येक व्यवस्था के पीछे कोई न कोई उद्देश्य है।
वर्तमान में वे एक पुस्तक पर गंभीरता से कार्य कर रहे हैं। इस पुस्तक के लिए उन्होंने जिस प्रकार व्यापक और अनथक अध्ययन किया है, वह उनके भीतर की सीखने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। पुस्तक पर कार्य अभी जारी है और वे निरंतर अध्ययन, चिंतन और सामग्री के संकलन में जुटे हुए हैं। यह देखकर सहज ही अनुभव होता है कि उम्र उनके लिए सक्रियता की सीमा नहीं, बल्कि अनुभव को नई दिशा देने का अवसर है।
शेषराज जी लंबे समय से विभिन्न चिंतन बैठकों में भी सहभागी रहे हैं। विचारों को सुनना, उन पर मनन करना और फिर अपनी समझ के आधार पर उन्हें आगे बढ़ाना उनकी कार्यशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शायद यही कारण है कि उनसे संवाद करते हुए बातचीत किसी एक विषय पर ठहरती नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से लेकर तकनीकी दृष्टिकोण, अध्ययन, लेखन और जीवनानुभवों तक स्वाभाविक रूप से विस्तार पाती जाती है।
इस आत्मीय भेंट में मेरे साथ समीर पंवार भी थे। मुलाकात का आरंभ शेषराज जी के घर से हुआ, जहाँ आत्मीयता और सहजता के वातावरण में बातचीत प्रारंभ हुई। लेकिन इस मुलाकात का वास्तविक विस्तार तब हुआ, जब हम उनके घर से दूर स्थित उनकी स्टडी तक पहुँचे। घर से स्टडी तक की यह छोटी-सी यात्रा जैसे उनके व्यक्तित्व के दो आयामों को जोड़ रही थी—जीवन की सहजता और ज्ञान की निरंतर साधना।
स्टडी में पहुँचकर लगा कि हमारी भेंट का एक नया अध्याय खुल गया है। पुस्तकों के बीच बैठकर हुई बातचीत में उनके अनुभवों की गहराई, अध्ययन की व्यापकता और भविष्य के लिए उनकी सक्रिय सोच और अधिक स्पष्ट होकर सामने आई। जिस उम्र में बहुत से लोग सक्रिय जीवन से स्वयं को धीरे-धीरे अलग करने लगते हैं, उस समय शेषराज जी का स्वयं को नए अध्ययन, लेखन और चिंतन में निरंतर लगाए रखना विशेष रूप से प्रेरक है।
उनसे विदा लेते समय यह अनुभूति मन में बनी रही कि व्यक्ति की वास्तविक सक्रियता उसकी उम्र से नहीं, उसकी जिज्ञासा से तय होती है। जिज्ञासा जीवित हो, सीखने की इच्छा बनी रहे और समाज के लिए कुछ करने का भाव भीतर सक्रिय रहे, तो जीवन का कोई दशक विश्राम का पर्याय नहीं बनता।
श्री शेषराज सिंह जी से यह शिष्टाचार भेंट इसलिए भी स्मरणीय रही कि इसमें औपचारिकता बहुत कम और आत्मीय संवाद बहुत अधिक था। उनसे मिलना केवल एक वरिष्ठ अभियंता से मिलना नहीं था; यह ऐसे व्यक्ति से मिलना था जिसने अभियांत्रिकी की तार्किकता, अध्ययन की गंभीरता, लेखन की सृजनात्मकता और सामाजिक सामंजस्य की प्रतिबद्धता—इन सभी को अपने जीवन में एक साथ साधा है।
ऐसी मुलाकातें वास्तव में शिष्टाचार भेंट से कहीं आगे निकल जाती हैं। वे हमें अपने ही भीतर झाँकने और यह सोचने का अवसर देती हैं कि हम अपने अनुभव, समय और ऊर्जा का उपयोग समाज और स्वयं के विकास के लिए किस प्रकार कर सकते हैं।
शेषराज जी के साथ हुई यह भेंट भी ऐसी ही एक प्रेरक स्मृति बनकर हमारे साथ रही—एक ऐसी स्मृति, जिसमें घर से शुरू हुई आत्मीय बातचीत अंततः पुस्तकों के बीच स्थित उनकी स्टडी में जाकर और अधिक अर्थपूर्ण हो गई।
यदि आप चाहें तो इसी श्रृंखला की पिछली शिष्टाचार भेंटों की शैली से बिल्कुल एकरूप रखते हुए इसे और अधिक साहित्यिक-संस्मरणात्मक रूप भी दिया जा सकता है।
झलकियाँ
अंतिम पड़ाव
श्री मौसम सिंह
इस पूरे क्रम को श्रृंखला के समापन पड़ाव के अनुरूप थोड़ा अधिक आत्मीय, प्रेरक और प्रभावपूर्ण रूप दिया जा सकता है।
शिष्टाचार भेंटों की इस आत्मीय और सार्थक श्रृंखला का अंतिम पड़ाव शिक्षक श्री मौसम सिंह जी से भेंट के रूप में रहा। दिनभर की मुलाकातों और विविध व्यक्तित्वों से हुए संवाद के बाद यह भेंट अपने आप में एक सुखद और प्रेरक अनुभव बन गई।
प्रतिनिधि जब उनसे मिलने पहुँचे तो एक आत्मीय दृश्य ने उनका स्वागत किया। मौसम सिंह जी अपने नवनिर्मित घर के भीतर प्रतीक्षा करने के बजाय मुख्य मार्ग पर, अपने घर के बाहर ही प्रतिनिधि की प्रतीक्षा करते हुए मिले। उनके इस सहज व्यवहार में आत्मीयता, अपनापन और मिलने वाले व्यक्ति के प्रति सम्मान की भावना सहज ही दिखाई दी। किसी औपचारिकता के बिना हुई यह शुरुआत आगे होने वाली बातचीत के सौहार्द्रपूर्ण वातावरण का संकेत भी थी।
भेंट के दौरान उलझन सुलझन के सामाजिक सरोकारों, जागरूकता अभियानों और समाज के विभिन्न वर्गों को सकारात्मक विचारों से जोड़ने के प्रयासों पर विस्तार से चर्चा हुई। मौसम सिंह जी ने अभियान के उद्देश्यों को ध्यानपूर्वक समझा और उसके प्रति अपनी सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे प्रयासों को निरंतरता और व्यापक सामाजिक सहभागिता की आवश्यकता है। उन्होंने प्रतिनिधि को आश्वस्त किया कि वे अपनी क्षमता और उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप हर स्तर पर सहयोग करने के लिए इच्छुक हैं।
बातचीत में विशेष रूप से युवाओं की भूमिका का विषय सामने आया। प्रतिनिधि ने उनसे आग्रह किया कि वे अपने संपर्क क्षेत्र के युवाओं को उलझन सुलझन के रचनात्मक और सामाजिक अभियानों से जोड़ने में सहयोग करें। यह आग्रह केवल किसी अभियान से युवाओं को जोड़ने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्हें समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने, सकारात्मक संवाद विकसित करने और अपने आसपास की समस्याओं के समाधान में सहभागी बनने की दिशा में प्रेरित करने का भी था।
लगभग आधे घंटे तक चली इस बातचीत में शिक्षा, युवा सहभागिता, सामाजिक जागरूकता, सकारात्मक सोच, समाज में संवाद की आवश्यकता तथा ऐसे प्रयासों को जन-जन तक पहुँचाने जैसे विभिन्न विषयों पर खुलकर चर्चा हुई। बातचीत की सबसे सुखद बात यह रही कि इसमें औपचारिकता कम और विचारों का सहज आदान-प्रदान अधिक था। एक शिक्षक के रूप में मौसम सिंह जी की सामाजिक दृष्टि और सकारात्मक सोच ने इस भेंट को और अधिक अर्थपूर्ण बना दिया।
समय बीतने का एहसास तब हुआ जब विदा लेने का क्षण आया। प्रतिनिधि ने उन्हें हिंदी एवं अंग्रेजी के समाचार-पत्रों की प्रतियाँ भेंट कीं। यह भेंट केवल समाचार-पत्र देने की औपचारिकता नहीं थी, बल्कि विचारों, सूचनाओं और जागरूकता के उस प्रवाह का प्रतीक थी, जिसे उलझन सुलझन अपने प्रयासों के माध्यम से समाज में निरंतर बनाए रखना चाहता है।
आत्मीय अभिवादन और भविष्य में सहयोग की सकारात्मक आश्वस्ति के साथ यह मुलाकात संपन्न हुई। इसके साथ ही शिष्टाचार भेंटों की यह श्रृंखला भी अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँची, लेकिन इन मुलाकातों से उपजे विचार, संवाद और सहयोग की संभावनाएँ आगे की यात्रा के लिए नई ऊर्जा छोड़ गईं।
किसी अभियान की सफलता केवल उसके प्रकाशित शब्दों या कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी तय होती है जो उसके विचारों से जुड़कर उसे आगे बढ़ाने की इच्छा रखते हैं। मौसम सिंह जी से हुई यह भेंट इसी विश्वास को मजबूत करती है कि सार्थक संवाद से संबंध बनते हैं और संबंधों से सामाजिक परिवर्तन की राह तैयार होती है।
यदि आप चाहें तो इसे पूरी शिष्टाचार भेंट श्रृंखला की समापन रिपोर्ट की शैली में भी ढाला जा सकता है, जिसमें पिछले सभी पड़ावों को जोड़कर अंत में एक प्रभावशाली निष्कर्ष दिया जाए।








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