सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

फ्रेंडशिप डे पर विशेष प्रस्तुतियाँ

कैफे हाउस ....

शांत झील और उसके किनारे "मिलन कैफे हाउस" जहां आकर किसी का जाने का मन ना करे ।यहीं तो मिली थी वह पहली बार कृष से। तब से आज तक दोनों इसी वक्त यहीं मिलते रहे। आज झील की शांति उसे बेचैन कर रही थी। पूरा एक महीना हो गया उसे कृष से मिले हुए।रोज की तरह वह चाय के दो कप  लेकर बैठ गई। एक कप उसके हाथ में था और दूसरा कप सामने रखा था। वही कप उससे बातें करने लगा...

.. "कैसी हो"?..

 .."क्या रोज-रोज यही पूछते हो! तुम्हें नहीं पता, मैं कैसी हूंँ"...?

.."अरे कह दो ना, अच्छी हूँ"..।

.."हां वो तो हूं ही! तुम कहो, क्या लिख रहे हो आजकल"..?

.." अरे यार, आज लिखूं तो कल छूट जाता है और कल लिखूं तो आज दूर चला जाता है"..।

 .."यार तुम जो भी लिखो सच लिखो! यही तो तुम्हारी पहचान है। तुम्हारे अपने अनुभव तुम्हारी शान है। उन्हें उतारो पन्नों पर"...।

.." सच यार तुम्हारी जैसी दोस्त कहीं नहीं, जो चुटकियों में हर उलझन सुलझा देती है".. ।

…."ओए, तुम्हें मुझसे प्यार तो नहीं हो गया"...?

.. नहीं, कभी नहीं ,क्योंकि कुछ रिश्ते प्यार से भी ऊपर होते हैं! ऐसा ही रिश्ता है मेरा तुम्हारा"...।

 .."देखो कृष तुम्हारी बातें मुझे इमोशनल कर देती है"..।

.." पता है कुकू, कभी-कभी बहुत मन करता है... तुम्हें गले लगाने का... तुम्हारी गोद में सर रखकर सोने का.. किंतु कहीं तुम...."

.." क्या कहीं तुम "...?

.."कुछ नहीं"... कहकर कृष कुछ गुनगुनाने लगा।

इधर कोकिला ने मन ही मन में कहा..." मैं जानती हूं कृष तुम मुझे बहुत पसंद करते हो, किंतु मैं अपनी मर्यादा भी समझती हूं। हम दोस्त बन रहें ,वही ठीक है"...।

कृष युवा पत्रकार था जो हर घटना की सच्चाई दुनिया तक पहुंचाना अपना धर्म मानता था। मैं यानी... "कोकिला" एक कवयित्री थी, जो हर घटना के पीछे छुपे मनुष्य के दर्द ,प्रेम और संवेदना को शब्द देती थी।

कृष अक्सर उससे  पूछता...

"तुम्हारी स्याही  में इतने आंसू क्यों है"..?

वो कहती.." तुम्हारा आंसुओं से क्या लेना देना..?

वो हंसकर कहता ..."आंसुओं में बहकर सच नहीं लिखा जाता मैडम"...! तुम्हारे शब्द सुंदर है, लेकिन सच्चाई कम है"...।

वो कहती..."आपकी खबरों में सच्चाई तो  है, पर थोड़ी संवेदना कम है"...!

दोनों एक दूसरे की आलोचना कर एक दूसरे को निखारते रहे। एक की कलम तथ्य लिखती ,दूसरी कलम मन की धड़कन। कृष ने कोकिला से संवेदनशील होना सीखा और कोकिला ने कृष से निर्भीक होकर सच कहना। अचानक कृष का तबादला हो गया। जाते-जाते उसने कहा...

" जब कविता ज्यादा ही भावनाओं में बहने लगे तो उसे सच के किनारे पर ले आना"...।

..."और जब सच लिखते लिखते शब्द थक जाए तो उसे मेरे पास भेज देना"...!

दोनों जानते थे कि वो अपनी कविताओं में उसे लिखती है और हर सच में वह उसे तलाशता है। यही उनकी सच्ची दोस्ती थी कि वह एक दूसरे की संवेदनाओं में जीते थे ताकि एक जैसे ना होते हुए भी एक दूसरे को पूर्ण कर सकें।

तभी अचानक एक आवाज..." अरे तुम्हारी चाय ठंडी हो गई"...! नजर उठाए बगैर ही 

आंखों में आई हुई नमी को छुपा कर खुशी से कांपती हुई आवाज में उसने कहा...

"कोई बात नहीं ! इतने दिनों से रोज ठंडी ही चाय पी रही हूं"...।

बिना स्पर्श किए एक आवाज ,एक मुस्कान, एक नजर और एक शब्द सब कुछ बदल देता है... यह उसे महसूस हुआ। उस एक आवाज ने उसके टूटे हुए हिस्से को सहला दिया और बातों में चाय के साथ संवेदना की गर्माहट फिर से घुलने लगी।

कृष ने उस दिन जाकर एक खबर लिखी कि... एक कप चाय आपको सम्मानित कर सकती है। मेरी सबसे अच्छी दोस्त वो है जो शब्द नहीं बदलती ...अपनी संवेदनाओं से नजर बदल देती है।

और! कोकिला ने अपनी डायरी में लिखा... मेरे सबसे अच्छे मित्र तुम हो, जो सच से कभी समझौता नहीं करते। इसीलिए मेरी कविताओं में आज भी उम्मीद जिंदा है।

स्त्री और पुरुष की हर आत्मीयता प्रेम नहीं होती। कुछ रिश्ते शब्दों  से दोस्ती करके भी निभाए जाते हैं।

विजया डालमिया

दोस्ती हो तो कृष्ण-सुदामा जैसी। 

थोड़ी हकीकत थोड़ा फसाना..

कृष्ण का अंतिम उपहार..

द्वारका डूबने वाली थी। श्रीकृष्ण अपने अंतिम समय के निकट थे। चारों ओर शोक का वातावरण था। तभी कृष्ण ने अपने सेवक से कहा—

"जाओ... सुदामा को बुला लाओ।"

सेवक ने विनम्रता से कहा— "प्रभु, समय बहुत कम है। इतनी दूर से वे कैसे पहुँच पाएँगे?"

कृष्ण मुस्कुराए— "समय कम है... इसलिए तो बुला रहा हूँ।"

संदेश मिलते ही सुदामा नंगे पाँव दौड़ पड़े। रास्ते में मूसलाधार वर्षा होने लगी। पैरों में काँटे चुभते रहे, वस्त्र भीगते रहे, पर मित्र से मिलने की चाह ने उन्हें कहीं रुकने नहीं दिया।

जब वे द्वारका पहुँचे...

कृष्ण मौन हो चुके थे।

सुदामा ने उनके चरणों में सिर रख दिया। उनकी आँखों से आँसू और बाहर की वर्षा एक साथ बह रहे थे।

तभी उनकी नज़र कृष्ण के पास रखी एक छोटी-सी पोटली पर पड़ी।

उन्होंने काँपते हाथों से उसे खोला।

उसमें वही मुट्ठी भर चिवड़ा था, जो वर्षों पहले उन्होंने अपने मित्र कृष्ण को प्रेम से दिया था।

साथ में एक पंक्ति लिखी थी—

"मित्र...

प्रेम कभी समाप्त नहीं होता।

मैं तुम्हारा दिया हुआ स्नेह अपने साथ नहीं ले जा सकता।

इसे संसार में बाँट देना, ताकि लोग जान सकें कि मित्रता का सबसे बड़ा धन प्रेम है।"

सुदामा ने उस पोटली को अपने हृदय से लगा लिया।

उस दिन उन्हें समझ आया...

भगवान सबका साथ छोड़ सकते हैं, लेकिन सच्चे मित्र का प्रेम कभी नहीं छोड़ते।

बाहर वर्षा बरस रही थी...

और भीतर एक मित्र की आँखों से भी।

पूरी कथा एक दृष्टि में

सृजक




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...