छंद अनुशासन नहीं, अभिव्यक्ति की आत्मा है - छोटेलाल
भूमिका
हिंदी साहित्य का संसार उन साधकों से समृद्ध होता है, जो बिना किसी प्रसिद्धि की आकांक्षा के निरंतर शब्द-साधना में रत रहते हैं। ऐसे ही एक समर्पित साहित्यकार हैं श्री छोटेलाल सारस्वत। विज्ञान विषय से स्नातक होकर लेखा-विभाग में वर्षों तक अपनी सेवाएँ देने के पश्चात वर्ष 2021 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपने जीवन को पूर्णतः साहित्य-साधना के लिए समर्पित कर दिया।
राजस्थान के अजमेर जनपद के कोटड़ा निवासी श्री सारस्वत छंद-विधा के गहन अध्येता एवं कुशल मार्गदर्शक हैं। वे स्वयं उत्कृष्ट रचनाएँ सृजित करने के साथ-साथ अनेक नवोदित साहित्यकारों को छंद, भाषा और अभिव्यक्ति की बारीकियों का धैर्यपूर्वक मार्गदर्शन भी देते हैं। उनकी रचनाएँ देश की अनेक प्रतिष्ठित ई-पत्रिकाओं एवं ई-समाचार पत्रों—जैसे आकाश कविघोष (लखनऊ), संचेतना के स्वर (प्रयागराज), व्हाइट्स इंदौर, संस्कार न्यूज़, राष्ट्रीय नवाचार इंदौर तथा दस्तक प्रभात पटना—में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी दो कृतियाँ—'हाड़ीरानी' एवं 'पन्नाधाय'—शीघ्र ही पुस्तक रूप में पाठकों के समक्ष आने वाली हैं।
उलझन सुलझन के पाठकों के लिए प्रस्तुत है श्री छोटेलाल सारस्वत जी से एक विशेष साहित्यिक संवाद, जिसमें उन्होंने अपने जीवन, साहित्य-साधना, छंद-विधान और वर्तमान साहित्यिक परिवेश पर अत्यंत सारगर्भित विचार साझा किए हैं।
विशेष साक्षात्कार
"छंद अनुशासन नहीं, अभिव्यक्ति की आत्मा है"
वरिष्ठ साहित्यकार एवं छंद-मार्गदर्शक श्री छोटेलाल सारस्वत से बातचीत
प्रश्न १. सबसे पहले अपने बचपन और पारिवारिक परिवेश के बारे में कुछ बताइए।
उत्तर: "मेरा जन्म 14 मार्च 1956 को राजस्थान के *करौली जिले की तहसील हिण्डौन सिटी* में हुआ। मेरे पिता स्वर्गीय श्री राम प्रसाद सारस्वत ने सदैव संस्कार, ईमानदारी और परिश्रम का पाठ पढ़ाया। वही मूल्य आगे चलकर मेरे व्यक्तित्व और साहित्य का आधार बने।"
प्रश्न २. विज्ञान का विद्यार्थी होने और लेखा-विभाग में कार्य करने के बाद साहित्य की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ?
उत्तर: "साहित्य का प्रेम बचपन से ही था। नौकरी की व्यस्तताओं के कारण समय सीमित था, परंतु मन सदैव साहित्य से जुड़ा रहा। सेवानिवृत्ति के बाद मुझे पूरा समय मिला और मैंने स्वयं को साहित्य-साधना के लिए समर्पित कर दिया।"
प्रश्न ३. छंद-विधा में आपकी विशेष रुचि कैसे विकसित हुई?
उत्तर: "छंद हमारी काव्य परंपरा की धरोहर है। इसकी लय, अनुशासन और सौंदर्य मुझे सदैव आकर्षित करते रहे। निरंतर अध्ययन, अभ्यास और वरिष्ठ साहित्यकारों के सान्निध्य से मैंने इसे समझा और आज भी सीखने- सिखाने की प्रक्रिया जारी है।"
प्रश्न ४. आज के युवा साहित्यकारों के लिए छंद कितना आवश्यक है?
उत्तर: "मुक्त लेखन का अपना महत्व है, लेकिन छंद का ज्ञान लेखक की भाषा को परिष्कृत करता है। जो कवि छंद को समझता है, उसकी अभिव्यक्ति अधिक सशक्त, संतुलित और प्रभावशाली होती है।"
प्रश्न ५. आप साहित्यिक पटलों पर अनेक रचनाकारों का मार्गदर्शन करते हैं। इस प्रेरणा का स्रोत क्या है?
उत्तर: "ज्ञान तभी सार्थक है जब वह दूसरों तक पहुँचे। यदि मेरे अनुभव से किसी नए रचनाकार का मार्ग प्रशस्त होता है, तो यह मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।"
प्रश्न ६. आपकी रचनाएँ अनेक प्रतिष्ठित ई-पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई हैं। इस अनुभव को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर: यह मेरे लिए प्रसन्नता का विषय है कि मेरी रचनाओं को विभिन्न मंचों ने स्वीकार किया। इससे लिखने का उत्साह बढ़ता है और जिम्मेदारी भी कि पाठकों को सदैव सार्थक साहित्य मिले।
प्रश्न ७. आपकी आगामी पुस्तकों 'हाड़ीरानी' और 'पन्नाधाय' के विषय में कुछ बताइए।
उत्तर: "ये दोनों कृतियाँ भारतीय इतिहास की उन महान विभूतियों को समर्पित हैं जिन्होंने त्याग, स्वाभिमान और राष्ट्रधर्म की अमिट मिसाल प्रस्तुत की। मेरा प्रयास रहा है कि नई पीढ़ी उनके आदर्शों से परिचित हो।"
प्रश्न ८. वर्तमान हिंदी साहित्य में आपको सबसे बड़ी चुनौती क्या दिखाई देती है?
उत्तर: "आज लेखन तो बहुत हो रहा है, लेकिन गंभीर अध्ययन की प्रवृत्ति कम होती जा रही है। साहित्य में गुणवत्ता बनाए रखने के लिए अध्ययन, भाषा-संस्कार और निरंतर अभ्यास आवश्यक हैं।"
प्रश्न ९. आपके अनुसार एक अच्छे साहित्यकार की सबसे बड़ी पहचान क्या है?
उत्तर: "विनम्रता, निरंतर अध्ययन और समाज के प्रति संवेदनशीलता। साहित्यकार केवल शब्दों का शिल्पी नहीं, बल्कि समाज का सजग पथप्रदर्शक भी होता है।"
प्रश्न १०. युवा पीढ़ी और नवोदित रचनाकारों के लिए आपका संदेश?
उत्तर: "खूब पढ़िए, धैर्यपूर्वक लिखिए और आलोचना से सीखिए। साहित्य साधना है, प्रतियोगिता नहीं। जितना अधिक अध्ययन करेंगे, आपकी लेखनी उतनी ही अधिक परिपक्व होगी।"
समापन
श्री छोटेलाल सारस्वत का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सेवानिवृत्ति कर्म का अंत नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक स्वप्नों को जीने का नया प्रारंभ भी हो सकती है। उन्होंने अपने अनुभव, अध्ययन और साहित्य-प्रेम को समाज के साथ साझा करते हुए न केवल स्वयं को एक गंभीर साहित्यकार के रूप में स्थापित किया है, बल्कि अनेक नवोदित रचनाकारों के प्रेरणास्रोत एवं मार्गदर्शक भी बने हैं।
उलझन सुलझन परिवार उनकी साहित्य-साधना को नमन करता है तथा उनके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और सतत सृजनशीलता की मंगलकामना करता है।
सूचना स्रोत
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








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