“पुरुषार्थ का सम्मान ही आत्मसम्मान का वास्तविक आधार है”
जब आचार्य निखिल यह कहते हैं—
“कर्म करके कुछ उपार्जित करना शर्म की बात नहीं, अपितु दूसरों का मुँह ताकना शर्म की बात है।”
तब वे केवल श्रम की महिमा का गुणगान नहीं कर रहे होते, बल्कि मनुष्य के आत्मसम्मान, स्वावलंबन और पुरुषार्थ के शाश्वत सिद्धांत को उद्घाटित कर रहे होते हैं। उनका यह कथन समाज में व्याप्त उस भ्रम को तोड़ता है, जहाँ लोग कार्य के स्वरूप से व्यक्ति का मूल्य आँकते हैं, जबकि गुरुजी बताते हैं कि कोई भी ईमानदार कर्म छोटा नहीं होता। छोटा यदि कुछ है, तो वह है अपनी क्षमता होते हुए भी परिश्रम से बचना और जीवनभर दूसरों पर आश्रित बने रहना।
उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत ओजस्वी, यथार्थवादी और करुणा से भरी हुई प्रतीत होती है। वे ऐसे युवाओं को देख रहे होते हैं जो केवल प्रतिष्ठित कार्य की प्रतीक्षा में साधारण कार्य करने से भी संकोच करते हैं। वे उन लोगों को भी देख रहे होते हैं जो परिश्रम करने के स्थान पर भाग्य, परिस्थितियों या दूसरों की कृपा पर अपना भविष्य टिका देते हैं। गुरुजी का हृदय उन्हें देखकर द्रवित होता है। वे उन्हें यह स्मरण कराना चाहते हैं कि ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को कर्म करने की शक्ति दी है, इसलिए हाथ फैलाने से पहले हाथों को काम में लगाना ही मनुष्य का धर्म है।
मानो गुरुजी अपने शिष्यों से कह रहे हों— “रोटी का स्वाद उसके मूल्य में नहीं, उसके पीछे लगे श्रम में होता है। जो व्यक्ति अपने पसीने से कमाता है, वह चाहे कम खाए, पर सम्मान से खाता है। किंतु जो बिना प्रयत्न केवल दूसरों की ओर आशा भरी दृष्टि लगाए बैठा रहता है, वह धीरे-धीरे अपना आत्मविश्वास भी खो देता है और आत्मसम्मान भी।”
वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक नगर में दो युवक रहते थे। पहला युवक पढ़ा-लिखा था, पर उसे अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी नहीं मिल रही थी। उसने प्रतीक्षा करने के स्थान पर एक छोटी-सी चाय की दुकान खोल ली। लोग पहले उसका उपहास करते थे, किंतु वह मुस्कुराकर कहता— “यह दुकान मेरी मेहनत की है, मेरी मजबूरी की नहीं।” कुछ वर्षों बाद वही दुकान एक प्रसिद्ध कैफ़े बन गई और अनेक लोगों को रोजगार देने लगी। दूसरा युवक केवल यह सोचता रहा कि “जब तक बड़ी नौकरी नहीं मिलेगी, मैं कोई छोटा काम नहीं करूँगा।” समय बीतता गया, अवसर हाथ से निकलते गए और वह दूसरों पर निर्भर होता चला गया। गुरुजी कहते हैं— “कार्य छोटा नहीं था, सोच छोटी थी। पुरुषार्थ ने पहले युवक को ऊँचा उठाया और अहंकार ने दूसरे को बैठाए रखा।”
फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक आश्रम में दो शिष्य रहते थे। गुरु ने दोनों को एक-एक खेत दिया और कहा— “जो चाहो करो।” पहला शिष्य प्रतिदिन खेत में श्रम करता, मिट्टी जोतता, बीज बोता और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करता। दूसरा शिष्य प्रतिदिन पहले शिष्य के खेत के किनारे बैठकर कहता— “यदि तुम्हारी फसल अच्छी होगी तो तुम मुझे भी थोड़ा अन्न दे देना।” कुछ महीनों बाद पहला खेत सुनहरी बालियों से भर गया, जबकि दूसरे के हिस्से में केवल प्रतीक्षा आई। गुरु ने कहा— “जिसने श्रम बोया, उसने सम्मान काटा; जिसने अपेक्षा बोई, उसने निराशा काटी।”
आचार्य निखिल की चेतना उस समय इस गहरे सत्य से प्रकाशित होती है कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अवस्था भी है। जो व्यक्ति अपने कर्म पर विश्वास करता है, वह परिस्थितियों का दास नहीं बनता। उसके भीतर यह विश्वास जन्म लेता है कि यदि आज सब कुछ छिन भी जाए, तो भी उसका पुरुषार्थ उसे पुनः खड़ा कर देगा। यही विश्वास वास्तविक संपत्ति है।
उनकी वाणी में करुणा इसलिए है कि वे जानते हैं— जीवन में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब सहायता लेना आवश्यक हो सकता है। वे सहायता लेने का विरोध नहीं करते; वे सहायता पर स्थायी निर्भरता का विरोध करते हैं। उनके लिए सहायता वह बैसाखी है जो कुछ दूर तक चलने में सहायक हो सकती है, लेकिन यदि मनुष्य उसी पर जीवनभर टिक जाए, तो उसके अपने कदम चलना भूल जाते हैं।
वे आगे मानो यह भी कह रहे हों— “कोई कार्य तुम्हारी गरिमा कम नहीं करता; आलस्य अवश्य करता है। कोई श्रम तुम्हें छोटा नहीं बनाता; परजीवी मानसिकता अवश्य बनाती है। इसलिए ऐसा जीवन जियो कि तुम्हारे हाथ माँगने के लिए नहीं, सृजन करने के लिए उठें।”
अंततः आचार्य निखिल का यह संदेश केवल आजीविका का नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का संदेश है। वे मानो कह रहे हों— “अपने पुरुषार्थ पर विश्वास रखो। ईमानदारी से किया गया प्रत्येक कर्म पूजा है, प्रत्येक श्रम साधना है और प्रत्येक स्वावलंबी प्रयास आत्मसम्मान का उत्सव है। यदि तुम्हें अपने हाथों की कमाई से सूखी रोटी भी मिले, तो वह किसी और के उपकार से मिली थाली से कहीं अधिक मधुर होगी। क्योंकि कर्म से अर्जित जीवन सम्मान देता है, जबकि बिना प्रयत्न की अपेक्षा धीरे-धीरे मनुष्य के व्यक्तित्व को भीतर से खोखला कर देती है। इसलिए कर्म को अपनाओ, पुरुषार्थ को अपना धर्म बनाओ और ऐसा जीवन जियो कि तुम्हारी पहचान तुम्हारे श्रम से बने, न कि दूसरों की कृपा से।”
वक्ता
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति







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