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मंगल वेला ब्याह की... बिटिया के श्रृंगार की...

मंगल वेला ब्याह की...                    बिटिया के श्रृंगार की...

भूमिका

बेटी का दुल्हन बनना केवल एक सामाजिक संस्कार नहीं, बल्कि भावनाओं का वह महासंगम है जहाँ वर्षों के स्नेह, सपनों, स्मृतियों और संस्कारों की धाराएँ एक साथ उमड़ पड़ती हैं। यह वह क्षण होता है जब घर का हर कोना, हर वस्तु और हर चेहरा अनगिनत यादों से भर उठता है। जिस नन्हीं कली को कभी उँगली पकड़कर चलना सिखाया था, उसे आज जीवन की नई राह पर बढ़ते देखने का सुख और उससे बिछड़ने का दर्द एक साथ हृदय को भिगो देता है।

बिटिया का श्रृंगार केवल उसके रूप को नहीं सँवारता, वह माता-पिता, भाई-बहन, बुआ और समस्त परिवार के मन में संजोए गए उन अनगिनत सपनों को भी साकार करता है, जिन्हें उन्होंने वर्षों तक प्रेम से सींचा होता है। मुस्कुराते अधरों के पीछे छिपे आँसू, आँखों में तैरती स्मृतियाँ और हृदय में उठती अनकही वेदना—सब मिलकर इस मंगल बेला को अविस्मरणीय बना देते हैं।

प्रस्तुत भावाभिव्यक्ति एक ऐसी ही बुआ के कोमल हृदय की आवाज़ है, जो अपनी लाडली को दुल्हन के रूप में देखकर गर्व, स्नेह, वात्सल्य और विरह के अद्भुत मिश्रण को शब्द दे रही है। यह केवल एक बेटी की विदाई की कथा नहीं, बल्कि उन अनमोल रिश्तों की संवेदनशील दास्तान है जो समय के साथ बदलते तो हैं, पर कभी टूटते नहीं।

यह भूमिका पाठक को आगे आने वाले संस्मरण से भावनात्मक रूप से जोड़ने के साथ उसकी जिज्ञासा भी बनाए रखेगी।

भाव

मंगल वेला ब्याह की... बिटिया  के श्रृंगार की...

मेरी लाडो की आएगी बारात, ढोल बजाओ। 

कोई गजरा लाओ री, कोई कजरा लाओ। 

नून राई वारो, मेरी बन्नो की नजर उतारो। 

अपने आँसुओं की वारा-फेरी करूँ इस पर। 

कितना ही निहारूँ थमती नहीं नजर। 

बस दिल थम-सा जाता है। यह अल्फाज हर उस मां, बहन, बुआ के होते हैं जिसकी लाडली दुल्हन बन विदा होने को तैयार होती है। हर माता-पिता का स्वप्न होता है बेटी को दुल्हन के रूप में देखना। लेकिन यह इतना आसान कहाँ होता है?

आँखें भर आईं खुशियों से, और दिल ने हाहाकार किया। 

जब मेरी लाडली बेटी ने दुल्हन जैसा श्रृंगार किया।

आँखों ने अश्रु धार छोड़ी, धीरज पर  प्रहार किया।

जब मेरी लाडली बेटी ने, दुल्हन जैसा श्रृंगार किया।

आँखों में आँसू लिए एक खामोश सवाल..."मैं कैसी दिख रही हूँ..?  और! जवाब में नि:शब्द होकर सिर्फ आँसू बहने लगते हैं। एक ऐसा सपना जो भीगी आँखों से ही पूरा होता है। 

विदा की यह वेला सबसे विशेष होती है क्योंकि इसमें खुशी के साथ आँसुओं की भी बरसात होती है। आँखें जिस पल के लिए तरस रही थीं वह पल आते ही बरसने लगती हैं। जब से रिश्ता तय होता है जाने कितनी बार ऐसा माहौल बन जाता है। लब मुस्कुराते हुए कहते हैं.. अब मेरी लाडली होने चली पराई और आँखें छलक उठती हैं। उस वेला का ध्यान कर जब हकीकत में दिल के टुकड़े को किसी और को सौंप दिया जाता है। जिसे हम जानते तक नहीं। एक अनजान के साथ, एक विश्वास के साथ उसे अपनी बेटी का भाग्य विधाता मान लिया जाता है।  कितनी अनूठी और निराली है यह रस्म। बचपन से जिसके कदम हमारी उंगलियाँ थामकर आगे बढ़ते हैं, अनायास ही उसका हाथ किसी और के हाथों में सहर्ष सौंप देते हैं, यह कहते हुए-- "आज से यह तुम्हारी अमानत हुई! एक पल में हकदार बदल जाते हैं। क्या वाकई...? इतना मात्र कह देने से क्या बिटिया पराई हो जाएगी..? कभी नहीं! यह तो हमारा वो अमिट हिस्सा और किस्सा  है जो  हर पल बयाँ होता है उसके हाव-भाव में। हमारी ही तो परछाईं है वो जो किसी की परछाईं बनने चली है। हर परछाई के आकार स्वरूप अलग होते हैं किंतु प्रतिरूप तो वह सिर्फ माता-पिता की ही होती है।

जिसके नन्हे कदम थिरकते थे मेरे आंगन में, आज वो कदम ढोलक की थाप पर थिरकते हुए नए सफर को बढ़ चले जहाँ मां, बाबुल, बुआ, बहन की जगह नए रिश्तों के, नए रूप से उसका प्रगाढ़ परिचय होगा। 

स्मरण हो आ रहा है जब शिवानी छोटी थी तब उसे मैं नहलाते समय आखिर में तेल लगाकर  फिर  पानी डाल देती थी उस पर तब वह अपनी आँखों को मटकाकर कहती थी --"बुआ जी मुझे तेल से नहलाती हैं।"

और! सब हंसने लगते थे। मेरे ख्यालों में तो आज भी वही नन्ही, ताई जी की पल्लवी घूम रही है। बटरफ्लाई बनकर नन्हे पांव तेजी से हिलाते हुए, बटरफ्लाई करती हुई पल्लवी। ताई जी की पल्लू।  कल की पल्लवी आज शिवानी बन गई। ताऊजी, ताई जी, मम्मी जहाँ भी हैं वहीं से खूब आशीर्वाद दे रहे हैं...शिवानी बेटा! जहाँ रहो खुश रहो। अपने संस्कारों के साथ। अपनी सच्चाई और अच्छाई के साथ, एक  नई उड़ान भरने को तैयार जहाँ ख्वाहिशों का पूरा आसमान तुम्हारा है, यही आशीर्वाद हमारा है।

रचनाकार











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