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सामाजिक बदलाव और सिनेमा के संग रामस्वरूप गुर्जर की प्रेरक यात्रा

गांव की मिट्टी से वैश्विक मंच तक 

सामाजिक बदलाव और सिनेमा के संग रामस्वरूप गुर्जर की प्रेरक यात्रा

भूमिका

राजस्थान के टोंक जनपद के पचेवर जैसे ग्रामीण अंचल से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक अपनी पहचान बनाना किसी साधारण उपलब्धि का परिणाम नहीं होता, बल्कि इसके पीछे वर्षों की सामाजिक प्रतिबद्धता, संवेदनशील सोच और निरंतर जनसेवा का समर्पित भाव होता है। पचेवर निवासी एवं सामाजिक कार्यकर्ता रामस्वरूप गुर्जर का इंडोनेशिया के बाली में आयोजित होने वाली प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय फिल्म कार्यशाला के लिए चयन न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष और समर्पण की पहचान है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का क्षण भी है।

7 से 9 सितंबर 2026 तक आयोजित इस कार्यशाला में 35 देशों के फिल्म निर्माता, कहानीकार और सामाजिक सरोकारों से जुड़े प्रतिनिधि भाग लेंगे। ऐसे मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करना और भारतीय संस्कृति, सामाजिक मूल्यों तथा जनहित के मुद्दों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना अपने आप में एक बड़ी जिम्मेदारी है।

बाल विवाह रोकथाम, बाल मजदूरी उन्मूलन, महिला अधिकार, शिक्षा और वंचित समुदायों की आजीविका जैसे विषयों पर वर्षों से सक्रिय रहे रामस्वरूप गुर्जर ने यह सिद्ध किया है कि यदि सोच में संवेदना और कार्य में निरंतरता हो, तो गांव की आवाज भी अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंच सकती है। प्रस्तुत है उनसे एक विशेष बातचीत।

विशेष साक्षात्कार 

रामस्वरूप गुर्जर से बातचीत

प्रश्न १. सबसे पहले इस अंतरराष्ट्रीय फिल्म कार्यशाला के लिए चयन पर हार्दिक बधाई। यह खबर मिलने पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

उत्तर : "बहुत-बहुत धन्यवाद। यह मेरे लिए बेहद भावुक और गर्व का क्षण था। मुझे लगा कि वर्षों से समाज के लिए किए जा रहे कार्यों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल रही है। यह सिर्फ मेरी उपलब्धि नहीं, बल्कि पचेवर और पूरे क्षेत्र की सामूहिक खुशी है।"

प्रश्न २. सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में आपकी यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?

उत्तर : बचपन से ही समाज में असमानता और कई सामाजिक समस्याओं को करीब से देखा। विशेष रूप से बाल विवाह, शिक्षा की कमी और महिलाओं की स्थिति ने मुझे सोचने पर मजबूर किया। वहीं से समाज के लिए कुछ सार्थक करने की प्रेरणा मिली।

प्रश्न ३. आपने बाल विवाह रोकथाम और बाल मजदूरी उन्मूलन जैसे गंभीर विषयों पर काम किया है। इस दिशा में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?

उत्तर :"सबसे बड़ी चुनौती लोगों की सोच में बदलाव लाना रही। कई बार परंपराओं के नाम पर लोग बदलाव स्वीकार नहीं करते। लेकिन संवाद, जागरूकता और लगातार प्रयास से सकारात्मक परिणाम सामने आए।"




प्रश्न ४. महिला अधिकार और शिक्षा के क्षेत्र में आपके प्रयासों के बारे में कुछ बताइए।

उत्तर : "मेरा मानना है कि यदि महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर होंगी तो समाज स्वतः मजबूत होगा। हमने ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाए, बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया।"






प्रश्न ५. वंचित और पिछड़े समुदायों की आजीविका को लेकर आपने किस प्रकार कार्य किया?

उत्तर : "हमने समुदायों को रोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित करने का प्रयास किया। कौशल विकास, शिक्षा और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग को लेकर कई स्तरों पर काम किया गया।"

प्रश्न ६. एक सामाजिक कार्यकर्ता से अंतरराष्ट्रीय फिल्म कार्यशाला तक की यात्रा को आप किस रूप में देखते हैं?

उत्तर : "मेरे लिए यह सामाजिक कार्य और सिनेमा के बीच एक सेतु जैसा है। फिल्में समाज को प्रभावित करने का बहुत सशक्त माध्यम हैं। यदि किसी मुद्दे को संवेदनशीलता के साथ कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो उसका प्रभाव अधिक गहरा होता है।"






प्रश्न ७. आपको क्या लगता है कि सामाजिक बदलाव में फिल्म और स्टोरीटेलिंग कितनी प्रभावी भूमिका निभा सकती है?

उत्तर : "कहानी लोगों के दिल तक पहुंचती है। एक प्रभावशाली फिल्म समाज को सोचने और बदलने के लिए प्रेरित कर सकती है। कई बार एक कहानी वह असर छोड़ जाती है जो लंबे भाषण भी नहीं छोड़ पाते।"















प्रश्न ८. बाली में आयोजित होने वाली इस कार्यशाला से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?

उत्तर : "मैं विभिन्न देशों के प्रतिभागियों से सीखना चाहता हूं कि वे किस प्रकार सामाजिक मुद्दों को फिल्मों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। साथ ही भारतीय सामाजिक मूल्यों और अनुभवों को साझा करने का अवसर भी मिलेगा।"

प्रश्न ९. इस मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करते समय आप किन मुद्दों को प्रमुखता से रखना चाहेंगे?

उत्तर : "मैं भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा और ग्रामीण भारत की वास्तविक चुनौतियों एवं संभावनाओं को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करना चाहूंगा।"

प्रश्न १०. ग्रामीण प्रतिभाओं के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर : "गांव में रहकर भी बड़े सपने देखे जा सकते हैं। यदि आपके अंदर लगन, ईमानदारी और समाज के प्रति समर्पण है, तो अवसर जरूर मिलते हैं। अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी दुनिया तक पहुंचा जा सकता है।"

प्रश्न ११. युवाओं के लिए आपका प्रेरणादायक संदेश क्या होगा?

उत्तर : "युवा केवल अपने करियर तक सीमित न रहें, बल्कि समाज के लिए भी समय निकालें। यदि युवा सकारात्मक बदलाव की जिम्मेदारी लें, तो देश और समाज दोनों मजबूत होंगे।"

प्रश्न १२. अंत में, इस उपलब्धि का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे?

उत्तर : "यह मेरे परिवार, सहयोगियों, शुभचिंतकों और उन लोगों का आशीर्वाद है जिनके बीच रहकर मैंने काम किया। समाज ने ही मुझे सीखने और आगे बढ़ने का अवसर दिया।"

समापन

बातचीत से स्पष्ट है कि रामस्वरूप गुर्जर केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि संवेदनशील सोच, सामाजिक प्रतिबद्धता और रचनात्मक बदलाव के वाहक हैं। उनका अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचना यह संदेश देता है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो गांव की मिट्टी से निकली प्रतिभा भी विश्व पटल पर अपनी पहचान बना सकती है।

सूचना स्रोत

श्री बद्रीनाथ गुर्जर

टोंक (राजस्थान)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 




प्रस्तुति






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