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सोच की ताकत ही असली संसाधन है

सोच की ताकत ही असली संसाधन है

'मेरी निहारिका' के प्रबंध संपादक                   श्री राकेश शर्मा जी से विशेष                        बातचीत

भूमिका

कभी-कभी कोई रचना सिर्फ अपने स्वरूप से नहीं, बल्कि अपने पीछे छिपी सोच से पहचान बनाती है। सीमित संसाधनों के बीच भी जब कोई प्रयास अपनी अलग छाप छोड़ता है, तो वह न केवल सराहना का विषय बनता है, बल्कि एक उदाहरण भी बन जाता है। ‘मेरी निहारिका’ ई-पत्रिका के संदर्भ में एक बड़े समाचार पत्र के प्रबंधक द्वारा व्यक्त किए गए विचार इसी सत्य को उजागर करते हैं कि यदि दृष्टि व्यापक हो और संकल्प दृढ़, तो छोटी-सी टीम भी असाधारण परिणाम दे सकती है।

इन्हीं विचारों की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत है एक विशेष संवाद ऐसे व्यक्तित्व के साथ, जो न केवल पत्रकारिता में सिद्धहस्त हैं, बल्कि मानव संसाधनों में ऊर्जा, उत्साह और आत्मविश्वास भरने की अद्भुत क्षमता रखते हैं—श्री राकेश शर्मा जी। उनकी दृष्टि केवल कार्य को देखने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह हर प्रयास में छिपी संभावनाओं को पहचानने और उन्हें दिशा देने का कार्य करती है।

यह साक्षात्कार केवल एक व्यक्ति के विचारों का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि उस सोच का दर्पण है जो हमें भीड़ से अलग हटकर अपनी पहचान बनाने के लिए प्रेरित करती है—जहाँ संसाधन नहीं, बल्कि सोच ही असली ताकत बनकर उभरती है।

                           पत्रिका का आवरण पृष्ठ

साक्षात्कार

श्री राकेश शर्मा जी से विशेष बातचीत

प्रश्न १. माननीय शर्मा जी, हाल ही में ‘मेरी निहारिका’ ई-पत्रिका को लेकर एक बड़े समाचार पत्र के प्रबंधक द्वारा कही गई बात चर्चा में रही। आप इसे कैसे देखते हैं?

उत्तर: "देखिए, जब किसी अनुभवी व्यक्ति द्वारा किसी कार्य की सराहना होती है, तो वह केवल प्रशंसा नहीं होती, बल्कि एक मान्यता होती है। ‘मेरी निहारिका’ के संदर्भ में जो कहा गया, वह इस बात को पुष्ट करता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि सोच स्पष्ट और व्यापक हो, तो परिणाम असाधारण हो सकते हैं।"

प्रश्न २. उस टिप्पणी में यह भी कहा गया कि पत्रिका किसी बड़ी और अनुभवी टीम द्वारा संचालित लगती है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। इस विरोधाभास को आप कैसे समझते हैं?

उत्तर: "यही तो किसी भी सृजन की असली सफलता है। जब आपका काम आपकी वास्तविक परिस्थितियों से बड़ा दिखाई देने लगे, तो समझिए आप सही दिशा में हैं। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि सोच और समर्पण की जीत है।"

प्रश्न ३. आज के दौर में लोग अक्सर संसाधनों की कमी को अपनी सीमाओं का कारण मानते हैं। इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर: "संसाधन निश्चित रूप से सहायक होते हैं, लेकिन वे निर्णायक नहीं होते। असली अंतर आपकी सोच, दृष्टि और निरंतरता बनाती है। अगर ये तीनों आपके साथ हैं, तो संसाधनों की कमी भी आपको रोक नहीं सकती।"

प्रश्न ४. ‘मेरी निहारिका’ जैसी टीम, जिसमें बहुत कम लोग हैं और वे भी अलग-अलग स्थानों से काम कर रहे हैं—क्या यह भविष्य की कार्यशैली का संकेत है?

उत्तर: "बिल्कुल। आज का समय भौगोलिक सीमाओं से परे है। डिजिटल माध्यमों ने यह साबित कर दिया है कि यदि समन्वय और स्पष्ट दिशा हो, तो छोटी और बिखरी हुई टीम भी बड़े परिणाम दे सकती है।"

प्रश्न ५. आप मानव संसाधनों में ऊर्जा भरने और प्रोत्साहित करने के लिए जाने जाते हैं। आपकी इस दृष्टि के पीछे क्या सोच है?

उत्तर: "मेरा हमेशा से मानना रहा है कि हर व्यक्ति में अपार संभावनाएं होती हैं। जरूरत सिर्फ उसे पहचानने और सही समय पर प्रोत्साहित करने की होती है। जब व्यक्ति को विश्वास मिलता है, तो वह अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर काम करता है।"

प्रश्न ६. आपके अनुसार किसी भी टीम को भीड़ से अलग पहचान बनाने के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर: "सबसे पहले तो ‘भीड़ के साथ चलने’ की मानसिकता से बाहर आना होगा। अपनी मौलिक सोच विकसित करनी होगी, प्रयोग करने होंगे और असफलता से डरना नहीं होगा। पहचान हमेशा अलग सोच से बनती है, संसाधनों से नहीं।"

प्रश्न ७. अंत में, ‘मेरी निहारिका’ और उसके जैसे प्रयासों के लिए आपका संदेश?

उत्तर: "ऐसे प्रयास वास्तव में प्रेरणा के स्रोत होते हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि यदि हमारे पास स्पष्ट सोच और दृढ़ संकल्प है, तो हम किसी भी सीमा को पार कर सकते हैं। ऐसे कार्यों को निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।"

समापन 

किसी भी रचना की ऊंचाई उसके संसाधनों से नहीं, बल्कि उसकी सोच और संकल्प से तय होती है।

सूचना स्रोत 

 

विजया डालमिया

संपादक मेरी निहारिका और

राष्ट्रीय संयोजिका

उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका विंग)

हैदराबाद 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 




प्रस्तुति





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