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इंसानियत की राह पर किरण जी का मौन सेवा-संकल्प

इंसानियत की राह पर किरण जी का मौन सेवा-संकल्प

भूमिका

दिल्ली की रहने वाली, हिंदी ऑनर्स से शिक्षित किरण जी का जीवन एक साधारण व्यक्ति की तरह शुरू हुआ, पर उनका मार्ग असाधारण संवेदनाओं से भरा है। उन्हें एकांत प्रिय है, और प्रकृति के साथ समय बिताना उनके मन को सुकून देता है।

सड़क किनारे रहने वाले श्वानों के प्रति उनका अपनापन किसी भावुक क्षण का परिणाम नहीं, बल्कि लगभग तेईस वर्षों की निरंतर साधना है। अपने घर के श्वान को टहलाते-टहलाते कब उन्होंने स्ट्रीट डॉग्स से रिश्ता बना लिया, यह उन्हें भी पता नहीं चला। धीरे-धीरे वे उनसे संवाद करने लगीं, उनकी पीड़ा समझने लगीं, और उनका छोटा-सा संसार एक बड़े परिवार में बदल गया।

किरण जी न केवल इन बेजुबान प्राणियों को भोजन देती हैं, बल्कि उनकी सेवा-सुश्रुषा, उपचार और गंभीर स्थिति में इलाज की व्यवस्था भी करती हैं। सीमित सहयोग के बावजूद उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ।

अध्यात्म में रुचि रखने वाली किरण जी के लिए इंसानियत ही उनका धर्म है। सत्संग, सामाजिक कार्य, लेखन-पठन और बेबाक विचार—यही उनके जीवन के आधार स्तंभ हैं।

उनकी यह यात्रा न केवल करुणा की मिसाल है, बल्कि समाज के लिए एक गहरी प्रेरणा भी है।

साक्षात्कार 

प्रश्न १. किरण जी, अपने बारे में और अपने जीवन के मूल विचारों के बारे में बताइए।

उत्तर: "मैं दिल्ली से हूं और हिंदी ऑनर्स किया है। मुझे हमेशा से एकांत और प्रकृति के बीच समय बिताना अच्छा लगता है। मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा सिद्धांत है—इंसानियत। मैं मानती हूं कि अगर हमारे भीतर करुणा है, तो वही सबसे बड़ा धर्म है।"

प्रश्न २. स्ट्रीट डॉग्स के साथ आपका यह जुड़ाव कैसे शुरू हुआ?

उत्तर: "यह सब बहुत सहज रूप से शुरू हुआ। जब मैं अपने घर के श्वान को घुमाने जाती थी, तब रास्ते में मिलने वाले अन्य श्वानों से एक अपनापन बनने लगा। धीरे-धीरे मैं उनसे बात करने लगी, उन्हें समझने लगी, और कब वे मेरे परिवार का हिस्सा बन गए, पता ही नहीं चला।"

प्रश्न ३. पिछले 23 वर्षों में इस सेवा यात्रा के दौरान आपने क्या अनुभव किया?

उत्तर: "यह यात्रा मेरे लिए साधना जैसी रही है। मैंने इन बेजुबान प्राणियों में सच्चा प्रेम और निस्वार्थ भाव देखा है। इनसे जुड़कर मैंने धैर्य, संवेदना और सच्ची खुशी का अर्थ सीखा है।"

प्रश्न ४. आप इन श्वानों की देखभाल कैसे करती हैं?

उत्तर: "मैं उन्हें नियमित रूप से खाना खिलाती हूं, उनकी साफ-सफाई का ध्यान रखती हूं और अगर कोई बीमार हो जाए तो उसका इलाज करवाती हूं। बहुत गंभीर स्थिति में उन्हें अस्पताल भी भेजती हूं। यह सब मैंने समय के साथ सीख लिया है।"

प्रश्न ५. क्या आपको इस कार्य में समाज से सहयोग मिलता है?

उत्तर: "सहयोग बहुत कम मिलता है। कई बार लोगों को यह काम समझ में नहीं आता, लेकिन मैं यह मानती हूं कि अगर हम सही काम कर रहे हैं, तो हमें रुकना नहीं चाहिए।"

प्रश्न ६. आप समाज को क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर: "मैं सभी से यही अनुरोध करूंगी कि कृपया जीवों के प्रति मानवीय बनें। अगर आप कुछ नहीं कर सकते, तो कम से कम दिन में एक बार उन्हें खाना जरूर दें। यह छोटा-सा प्रयास भी उनके लिए बहुत मायने रखता है।"

प्रश्न ७. अध्यात्म और आपके सामाजिक कार्यों का क्या संबंध है?

उत्तर: "मेरे लिए अध्यात्म का अर्थ है—हर जीव में ईश्वर को देखना। जब हम किसी बेजुबान की सेवा करते हैं, तो वह भी एक तरह की पूजा है। सत्संग और सेवा दोनों ही मेरे जीवन का हिस्सा हैं।"

प्रश्न ८. आपके व्यक्तिगत शौक और रुचियां क्या हैं?

उत्तर: "मुझे लिखना-पढ़ना पसंद है। मैं अपने विचारों को बेबाक तरीके से व्यक्त करना पसंद करती हूं। साथ ही प्रकृति के साथ समय बिताना मेरे लिए सबसे बड़ा सुकून है।"

प्रश्न ९. भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं?

उत्तर: "मैं चाहती हूं कि अधिक से अधिक लोग इस सेवा कार्य से जुड़ें और इन बेजुबान प्राणियों के लिए एक सुरक्षित और प्रेमपूर्ण वातावरण बने। यही मेरी सबसे बड़ी इच्छा है।"

समापन

किरण जी की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि सेवा केवल बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि बड़े दिल से होती है। जब इंसान अपने भीतर की करुणा को पहचान लेता है, तब वह न केवल अपने जीवन को, बल्कि अनगिनत जिंदगियों को भी रोशन कर सकता है।

सूचना स्रोत 

प्रमिला त्रिवेदी

स्थानीय सम्पादिका 

उलझन सुलझन (लेडीज विंग)

बेंगलुरु

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 




प्रस्तुति




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