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अमृतवाणी

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अमृतवाणी

वाणी    

मल में कमल खिला, तू क्यों उदास?

मनुष्य सत्संग सुनता है और संसार  में भी रहता है। जैसे कि बताया जा रहा है कि कमल के पत्ते को कितने भी  पानी में डूबा कर रखो, उसको पानी छू नहीं सकता है। ऐसा जीवन हो हमारा कि जगत के नहीं जगदीश के हो जाएं। 

एक के होना यानि सत्य की ओर गति हो। सत्य की चिंगारी लग गई तो प्रकाश की ओर गति स्वतः हो जाती है।

जब प्रकाश की और हो जाए तो अंधेरा कहा होगा। वो तो रहेगा ही नहीं। तो अज्ञानता के कारण मानव फिर भोगों में चला जाता है। इसलिए कहा कि एक सत्य की चिंगारी लग जाये कि तुम ब्रह हो। यह प्रकाश की किरण पूर्ण  प्रकाश ही है। ये मान लो कि मैं ब्रह्म हूँ तो भोगों का नाम नहीं रहेगा प्रसाद समझ कर लेंगे जितना जरूरी हो।भोग नहीं होगा। रूप बदल जाएगा सब चीजों का। बॉडी के लिए जितना जरूरी है उतना ही सही है। 

अन्यथा प्रकाश बिना ज्ञान ना हो तो सारे दिन हम बॉडी के भाव में ही लगे रहते हैं। बॉडी से परे कुछ है। संत हमें बताते हैं। एक चिंगारी भोग की भोग को जला देती है और एक चिंगारी प्रभु के भाव की लग जाए हमारे भीतर तो भोग सारे विदा हो जाते हैं और सत्य का दिया जल जाता है।

वाणी यही कह रही है कि हम कभी भोग में तो कभी वियोग में ना हों। प्रकाश में अगर हम आ गए तो हम प्रकाश में ही रहें। प्रकाश की ही बातें करें। प्रकाश  ही सबको दें, तो निरंतर ज्योति जलती रहेगी।

अंधेरा कमरा बरसों से पड़ा है। एक छोटा-सा दिया मात्र जलाने से वो रोशन हो जाता है। उसका सारा अन्धेरा एक छोटे से दिए की वजह से मिट जाता है। वैसे ही कितना भी अंधेरा  क्यों ना हो छोटी-सी वाणी भी हमारे जीवन को पूरे प्रकाश से भर देती है।

कमल कीचड़ में भी खिला है क्योंकि निरन्तर सूर्य को देख रहा है।

हरि ॐ

सूचना स्रोत

मंजू माँ 

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