संवाद से समरसता तक : एक आत्मकथ्य
डॉ. अशोक कुमार चौधरी
दिनांक 03-04-2026, शुक्रवार का वह सवेरे का समय मेरे मन में आज भी एक उजली स्मृति की तरह अंकित है। मुज़फ्फरनगर जिले के खतौली कस्बे के समीप तिसंग गांव में आयोजित हमारे पुरखे न्यास का पारिवारिक मिलन कार्यक्रम केवल एक आयोजन नहीं था, बल्कि वह हमारे साझा इतिहास, संस्कृति और भावनात्मक एकता का जीवंत प्रतीक था।
प्रातः 10 बजे जब कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, तो वातावरण में अपनत्व, सौहार्द और भाईचारे की सहज अनुभूति थी। मुस्लिम गुर्जर और हिन्दू गुर्जर समाज के गणमान्य व्यक्तियों का एक साथ बैठना, संवाद करना और एक-दूसरे के अनुभवों को सुनना, यह अपने आप में उस विचारधारा का प्रमाण था जिसे हमारा पुरखे न्यास वर्षों से संजोए हुए है।
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता अंतवाड़ा गांव निवासी आदरणीय श्री महाराज सिंह जी ने की तथा संचालन योगेन्द्र जी ने अत्यंत सहज और प्रभावी शैली में किया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में हमारे पुरखे न्यास के अध्यक्ष श्री सूर्य प्रकाश जी ने जो मार्गदर्शन दिया, वह केवल शब्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह हमारी दिशा और दृष्टि को स्पष्ट करने वाला था।
मुझे भी गुर्जर परियोजना के प्रांत संयोजक के रूप में अपने विचार रखने का अवसर मिला। मैंने अपने आत्मकथ्य में यही अनुभव किया कि जब हम अपने पुरखों की विरासत को समझते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि हमारी पहचान किसी एक धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक साझा सांस्कृतिक धरोहर है, जो हमें जोड़ती है, विभाजित नहीं करती।
कार्यक्रम में गुर्जर परिषद के अध्यक्ष श्री सतेंद्र सिंह आर्य, पूर्व एसपी श्री रमेश गुर्जर एवं कार्यक्रम के आयोजक पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष चौधरी इरशाद गुर्जर ने भी अपने विचार रखे। सभी वक्ताओं के शब्दों में एक समान भाव था—समाज की एकता, पारस्परिक सम्मान और भविष्य के लिए सामूहिक प्रयास।
जब मैं वहां उपस्थित सभी साथियों—अज्जू प्रधान, राजीव प्रधान, अरविंद गुर्जर, सतीश जी, इमरान गुर्जर, फरमान गुर्जर, आशू, अनम, अय्यूब, यूसूफ, अरशद, पप्पू, मनव्वर, हारिश और भूरा गुर्जर—को एक साथ देख रहा था, तो यह अनुभव हो रहा था कि यह केवल नाम नहीं, बल्कि एक परिवार के सदस्य हैं, जो अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं।
हमारे पुरखे न्यास का उद्देश्य ही यही है—
हम अपनी विरासत को पहचानें, अपने रिश्तों को समझें और समाज में फैली कृत्रिम दूरियों को समाप्त कर एक सशक्त, समरस और संगठित समाज का निर्माण करें।
इस आयोजन ने मेरे भीतर यह विश्वास और दृढ़ किया कि यदि संवाद बना रहे, तो कोई भी दूरी स्थायी नहीं रह सकती। हम सब एक हैं—हमारे पुरखे, हमारी परंपराएं और हमारा भविष्य हमें एक सूत्र में बांधते हैं।
यह केवल एक कार्यक्रम नहीं था, यह एक संदेश था—
“समरसता ही हमारी शक्ति है, और एकता ही हमारा भविष्य।”
झलकियाँ














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