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शिक्षाविद् से ध्यान मार्ग की साधिका बनीं अन्नू सैनी जी

साक्षात्कार

मां ध्यान शून्यो (अन्नू सैनी जी) 

एक शिक्षाविद् से ध्यान मार्ग की साधिका तक का सफर


बातचीत

प्रश्न १. अन्नू सैनी जी, सबसे पहले आपके बत्तीस वर्षों के सफल शैक्षणिक जीवन और हाल ही में विद्यालय प्रमुख पद से सेवानिवृत्ति पर बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। इस लंबे सफर को आप किस रूप में देखती हैं?

उत्तर: "धन्यवाद। यह सफर मेरे लिए केवल 

आजीविका का साधन नहीं, बल्कि आत्म-विकास और समाज में योगदान का माध्यम, या यूँ कह लो एक साधना रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में बिताए गए ये बत्तीस वर्ष बच्चों के मन को समझने, उन्हें दिशा देने, उन्हें जीवन की अंतरदृष्टि देने, जीने की कला सीखाने और खुद भी निरंतर सीखते रहने की यात्रा थे। एक शिक्षक और फिर विद्यालय प्रमुख के रूप में मैंने यही प्रयास किया कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन को समझने और जीने की कला सीखने की माध्यम बने।"

प्रश्न २. शिक्षा के इतने लंबे अनुभव के बाद, आपके अनुसार आज की शिक्षा प्रणाली में सबसे बड़ा परिवर्तन क्या आया है?

उत्तर: "आज शिक्षा में तकनीकी विकास बहुत तेजी से हुआ है, लेकिन कहीं न कहीं संवेदनशीलता और जीवन मूल्यों का अभाव भी महसूस होता है। पहले शिक्षक और छात्र के बीच एक आत्मीय संबंध होता था, जो अब थोड़ा कम हुआ है। 

मेरा मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल करियर बनाना नहीं, बल्कि एक सजग और संवेदनशील मनुष्य बनाना होना चाहिए।

शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो मनुष्य के तन, मन, हृदय और आत्मा—इन चारों आयामों का संतुलित विकास करे। जब शिक्षा 'जीवन का मंदिर' बनेगी, तभी समाज से हिंसा, भ्रष्टाचार और दु:ख का अंत होगा।"

प्रश्न ३. आप पिछले बीस वर्षों से ओशो की अनुयायी हैं। यह यात्रा कैसे शुरू हुई?

उत्तर: "यह एक संयोग भी था और एक आह्वान भी। जीवन में एक समय ऐसा आया जब भीतर कई प्रश्न उठ रहे थे—‘मैं कौन हूँ?’, ‘जीवन का उद्देश्य क्या है?’ तभी ओशो के विचारों से परिचय हुआ। उनके शब्दों ने जैसे भीतर की खामोशी को आवाज दे दी। धीरे-धीरे यह केवल पढ़ने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन का हिस्सा बन गया।

ओशो का एक कथन ने जीवन दृष्टि ही बदल दी। ओशो कहते हैं, 'मानो नहीं जानो। पहले जानो, फिर मानो।' बात हृदय को छू गई और तब से ख़ुद को जानने की यात्रा का शुभारंभ हुआ।"

प्रश्न ४. ओशो के विचारों ने आपके जीवन और शिक्षण शैली में क्या परिवर्तन लाए?

उत्तर: "ओशो ने मुझे सिखाया कि जीवन को गंभीरता से नहीं, बल्कि जागरूकता, प्रफुल्लता और सहजता से वर्तमान क्षण का मजा लेते हुए जीना चाहिए। 

ओशो के इस जीवन में आगमन के बाद जीवन धन्य-धन्य हो उठा है - आनंदित, प्रफुल्लित,मौज मस्ती से भरपूर, एकांत मौन का मजा लेता हुआ, ख़ुद में तृप्त और सबका मंगल चाहता, करुणा प्रेम से भरपूर। नित नूतन प्रभु प्रसाद बरस रहा है।

मैंने अपने शिक्षण में भी यही भाव रखा—बच्चों पर दबाव न डालकर उन्हें समझने का प्रयास किया। मैंने हमेशा उन्हें यह सिखाने की कोशिश की कि वे अपने भीतर झांकें, खुद को पहचानें। 'प्रतिस्पर्धा' (दूसरों से तुलना) के बजाय 'आत्म-परिष्कार' (स्वयं में सुधार) पर ध्यान दें। और  हर बच्चे को यह सिखाया कि वह 'यूनीक' (अद्वितीय) है और उसे किसी और जैसा बनने की जरूरत नहीं है।"

प्रश्न ५. ‘मां ध्यान शून्यो’ के नाम से आपको जाना जाता है। इस नाम के पीछे क्या भाव है?

उत्तर: "यह नाम मेरे लिए एक पहचान नहीं, बल्कि एक अनुभव है। ‘ध्यान’ यानी निष्क्रिय जागरूकता और ‘शून्य’ यानी वह अवस्था जहाँ अहंकार समाप्त हो जाता है और मौन का प्रसाद बरस उठता। जब हम शून्य हो जाते हैं, तभी जीवन की सच्चाई को महसूस कर सकते हैं। यह नाम मुझे ओशो ध्यान केंद्र में मिला, जो मेरे लिए एक आंतरिक यात्रा का प्रतीक है।"

प्रश्न ६. आप ओशो के कथनों को स्पष्ट करने के अभियान से जुड़ी हैं। इस कार्य की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

उत्तर: "ओशो के विचार बहुत गहरे और कई बार प्रतीकात्मक होते हैं, जिन्हें लोग सतही रूप में समझ लेते हैं। इससे भ्रम पैदा होता है। मैंने महसूस किया कि उनके विचारों को सरल और स्पष्ट रूप में लोगों तक पहुँचाना जरूरी है, ताकि वे सही अर्थ में उन्हें समझ सकें और अपने जीवन में उतार सकें।

और दूसरे ओशो के विराट साहित्य सागर में से मुख्य उपदेश रूपी मोती चुनना बहुत कठिन है, जीवन का कोई भी पहलू ऐसा नहीं जिसके बारे में उन्होंने ज्ञान का प्रसाद नहीं बांटा।

तो जिसकी जो जानने की आवश्यकता होती है, ओशो के विराट सागर से उसको वो मोती चुन के भेंट कर पाऊँ; ऐसी कोशिश रहती है और मुख्य बात इस कार्य में मुझे बहुत आनंद आता है।"

प्रश्न ७. ध्यान और शिक्षा—इन दोनों को आप किस प्रकार जोड़कर देखती हैं?

उत्तर: "मेरे लिए ध्यान और शिक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। शिक्षा बाहरी ज्ञान देती है, जबकि ध्यान आंतरिक ज्ञान। यदि दोनों का संतुलन हो जाए, तो एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण संभव है। आज के समय में बच्चों को ध्यान सिखाना बहुत जरूरी है, ताकि वे तनाव से मुक्त रह सकें और अपने भीतर की शक्ति को पहचान सकें।

इसमें ध्यान की विधियां होनी चाहिए ताकि मनुष्य अपने भीतर के शाश्वत जीवन को जान सके।"

प्रश्न ८. सेवानिवृत्ति के बाद आपकी आगे की योजनाएँ क्या हैं?

उत्तर: "सेवानिवृत्ति मेरे लिए अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। अब मैं अपना समय ध्यान, आध्यात्मिक जागरूकता और लोगों को जीवन की गहराई समझाने में लगाना चाहती हूँ। इसके साथ-साथ कुछ समय 'कुछ भी ना करने का मजा लेना' चाहती हूं; 'Sit silently doing nothing.' 

मैं चाहती हूँ कि अधिक से अधिक लोग अपने भीतर की शांति को खोजें और एक संतुलित जीवन जी सकें।"

प्रश्न ९. आज के युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?

उत्तर: "युवाओं से मैं यही कहना चाहूँगी कि वे केवल सफलता के पीछे न भागें, बल्कि अपने भीतर की शांति को भी महत्व दें। अपने आप को समझें, अपनी रुचियों को पहचानें , कला और सृजनात्मक को भी अपने जीवन में लाएं ताकि अस्तित्व की दिव्यता से जुड़ पाएं। जीवन में हास्य को भी जगह दें । जीवन को एक उत्सव की तरह जीएं। ध्यान को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं, क्योंकि यही आपको सच्ची दिशा देगा।"

प्रश्न १०. अंत में, आपके जीवन का मूल मंत्र क्या है?

उत्तर: "मेरा जीवन मंत्र है—“जागरूकता के साथ 'अभी और यहीं' में जीना।” जब हम हर क्षण को पूरी चेतना के साथ जीते हैं, तो जीवन अपने आप सुंदर, सरल,  ग़ैर गंभीर बन जाता है। और आप ख़ुद ब ख़ुद गा उठते हैं-

क्या उमंग है, क्या तरंग है।

 मेरी ज़िंदगी है क्या, उड़ती पतंग है।"

समापन टिप्पणी

अन्नू सैनी जी, जिन्हें ‘मां ध्यान शून्यो’ के नाम से जाना जाता है, न केवल एक सफल शिक्षाविद् रही हैं, बल्कि एक ऐसी साधिका भी हैं, जिन्होंने शिक्षा और ध्यान को एक सूत्र में पिरोकर जीवन को एक नई दिशा दी है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब बाहरी ज्ञान और आंतरिक चेतना का संगम होता है, तब व्यक्ति न केवल स्वयं को, बल्कि समाज को भी एक नई रोशनी दे सकता है।

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