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नारी है सृष्टि की आधारशिला

नारी है सृष्टि की आधारशिला

नारी जननी है, माता है; परिवार की आधारशिला है। वही घर को स्वर्ग बनाती है और एक साधारण मकान को स्नेह, ममता और संस्कारों से घर का रूप देती है। उसके आंचल में वात्सल्य भरा होता है, जिसकी छाया तले अनेक दु:ख स्वतः ही दूर हो जाते हैं। अपनी ममता और त्याग से वह सबका पालन-पोषण करती है। उसके स्नेहिल स्पर्श में जैसे एक अद्भुत जादू होता है, जो दुख-दर्द को शांत कर देता है।

नारी जीवन में अनेक रूप धारण करती है—कभी बेटी, कभी बहन, कभी पत्नी और कभी मां। हर रूप में वह परीक्षाएँ देती है, अनेक संघर्षों से गुजरती है, फिर भी अक्सर उसे पूरी तरह समझा नहीं जाता। कभी-कभी परिस्थितियों का बोझ इतना बढ़ जाता है कि स्त्री हो या पुरुष, कोई भी व्यक्ति अवसाद में चला जाता है। ऐसी स्थिति में जीवन से हार मानने का विचार अत्यंत घातक सिद्ध हो सकता है।

फिर भी नारी अपनी सूझ-बूझ, धैर्य और समझदारी से गृहस्थी की नैया संभालती है। वह अपनी संतानों को संस्कार देती है और परिवार को एक सूत्र में बांधकर रखती है। वास्तव में वही समाज और संसार की सच्ची आधारशिला है।

नम्रता, सुशीलता और शिष्टता की प्रतिमूर्ति नारी को अपने कुल और समाज को गौरवान्वित करने की जिम्मेदारी निभानी होती है। मर्यादा और संतुलन के साथ जीवन जीते हुए ही वह समाज में गिरते मूल्यों को संभाल सकती है। आज हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि हम कौन थे और क्या बनकर रह गए। लावण्य और बाहरी सौंदर्य के मोह में कहीं हम अपने मूल संस्कारों से दूर तो नहीं हो गए?

एक स्त्री होने के नाते यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी संस्कृति और संस्कारों को सुरक्षित रखें। ये केवल परंपराएँ नहीं, बल्कि हमारी अमूल्य धरोहर हैं। जिस प्रकार समुद्र-मंथन से अमृत प्राप्त हुआ था, उसी प्रकार जीवन-मंथन से भी हमें सद्विचार और सद्बुद्धि को ग्रहण करना चाहिए।

जब सहिष्णुता, समानता, करुणा और दया जैसे गुण जीवन में स्थान पाते हैं, तब एक स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव होता है। साधना और उपासना से ही घर की नींव मजबूत होती है, और इस सुदृढ़ नींव पर ही एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण किया जा सकता है।

रचनाकार

 
प्रमिला त्रिवेदी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 










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