महिला सशक्तिकरण
हम अपने सनातन धर्म में धरती माता, गौ माता और प्रकृति को भी ‘मां’ ही मानते हैं। हमारे यहाँ धरती को माता का स्वरूप माना गया है, जो जन्म देने के साथ-साथ पालन-पोषण भी करती है।8
माता वह भी होती है जो शिशु को जन्म दे, और वह भी जो उसे गोद लेकर उसका पालन-पोषण करे। पौराणिक इतिहास में यशोदा, कृष्ण की पालनकर्ता माता के रूप में जानी जाती हैं, जो जन्म देने वाली देवकी से भी अधिक प्रेम करती हैं।
इसी प्रकार पन्नाधाय, चित्तौड़ एवं उदयपुर के महाराणा उदयसिंह की धाय माँ थीं। उन्होंने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर न केवल मेवाड़ के राजवंश को उसका उत्तराधिकारी बचाया, बल्कि उसका पालन-पोषण भी किया और अपने धाय-धात्री धर्म का पूर्ण निर्वाह किया।
पन्नाधाय नारी-शक्ति का प्रतीक और देशभक्ति की अद्वितीय मिसाल हैं। वह वह माँ हैं, जिन्होंने बिना आँसू बहाए अपने ही बच्चे का वध होते देखा, ताकि राज्य और राष्ट्र की रक्षा हो सके। इतिहास में पन्नाधाय को देशभक्ति के सर्वोच्च उदाहरणों में गिना जाता है।
धरती माता और गौ माता भी हम सबकी जननी तथा धाय माँ के समान हैं। भारतवर्ष का इतिहास ऐसी अनेक भारतीय नारियों के पराक्रम से भरा पड़ा है, जिन्होंने मातृत्व और त्याग की अद्भुत मिसालें प्रस्तुत की हैं।
आज महिलाएँ जीवन के हर क्षेत्र में अपना मुकाम हासिल कर चुकी हैं, पर जब भी पन्नाधाय का नाम लिया जाता है, मन श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है।
अपने बच्चों के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाली माताएँ तो बहुत मिल जाएँगी, पर देश के लिए अपने ही बच्चे का बलिदान देने वाली माँ का उदाहरण विरला है। अपने सामने एक नन्हे बच्चे को बलिदान होते देखना—एक माँ ने यह पीड़ा कैसे सहन की होगी, यह सोचकर आज भी मन द्रवित हो उठता है।
आज भी हमारे देश के सैनिकों की माताएँ अपने पुत्रों को देश-सेवा के लिए सेना में भेजती हैं। किंतु एक नन्हे बालक को राष्ट्र की रक्षा के लिए कुर्बान कर देने वाली पन्नाधाय के प्रति श्रद्धा से सिर झुक जाता है।
जिस दिन हमारे देश का प्रत्येक नागरिक धरती, गाय और प्रकृति को माँ के रूप में मानने लगेगा, उस दिन भारतवर्ष पुनः उसी गौरव के साथ ‘विश्वगुरु’ कहलाएगा।
रचनाकार





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