किसी से ना कहना…
बनाम
… सबसे कह देना
“किसी से ना कहना…” — यह एक ऐसा वाक्य है जो सुनते ही अपने भीतर एक अजीब-सी सनसनी पैदा कर देता है। जैसे ही यह शब्द किसी के कानों तक पहुँचते हैं, बात अपने मूल रूप में नहीं रहती; वह पल भर में हवा में तैरती हुई कई कानों को छूने लगती है और हर पड़ाव पर उसके शब्द भी बदलते जाते हैं और उसके एहसास भी।
विचार करने की बात यह है कि जिस बात को हम स्वयं अपने भीतर सीमित नहीं रख पाए, उसे हम किसी और से कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वह अपने तक ही सीमित रखेगा? सच तो यह है कि “किसी से ना कहना…” कहकर हम अक्सर अपनी ही नासमझी का परिचय दे देते हैं।
निस्संदेह, किसी पर विश्वास करना अच्छी बात है। विश्वास ही रिश्तों की बुनियाद होता है। परंतु यह भी एक सच्चाई है कि जैसे ही घर की कोई बात घर की सीमा से बाहर जाती है, वह धीरे-धीरे परायी हो जाती है। उसका अर्थ बदल जाता है और कई बार उसका प्रभाव भी वैसा नहीं रहता जैसा हम चाहते थे।
दरअसल, हर व्यक्ति के जीवन में अपने-अपने हिस्से के कुछ किस्से और अनुभव होते हैं। यह समझदारी की बात है कि कौन-सी बात किससे कहनी चाहिए और कौन-सी बात अपने तक ही सीमित रखनी चाहिए। विवेक का यही संतुलन हमें अनावश्यक उलझनों से बचा सकता है।
अक्सर हम किसी अपने से कहते हैं — “देखो, किसी से ना कहना।” लेकिन वही अपना व्यक्ति किसी और अपने से यही कह देता है — “तुमसे कह रहा हूँ, किसी से मत कहना।” फिर यह क्रम आगे बढ़ता जाता है और देखते ही देखते एक लंबी श्रृंखला तैयार हो जाती है।
यदि इस स्थिति को थोड़ी सहज दृष्टि से देखें, तो इसका अर्थ कुछ ऐसा ही निकलता है — “सबसे कह देना।”
यह बात सुनकर मुस्कान आना स्वाभाविक है, परंतु यही जीवन की एक छोटी-सी परंतु सच्ची विडंबना भी है।
इसीलिए, कभी-कभी लगता है कि इस वाक्य का उल्टा प्रयोग शायद अधिक प्रभावी हो सकता है। यदि सच में हम चाहते हैं कि कोई बात सीमित ही रहे, तो शायद मज़ाक-मज़ाक में कहना पड़े — “अरे, यह बात तो सबसे कह देना।” और यदि हमें कोई बात दूर-दूर तक पहुँचानी हो, तो बस इतना कहना काफ़ी है — “देखना, किसी से ना कहना।”
मानव स्वभाव की यही रोचकता है कि शब्दों के पीछे छिपी मनोवृत्तियाँ अक्सर उनके अर्थों को उलट देती हैं। इसलिए बोलने से पहले थोड़ा ठहरकर सोचना ही बुद्धिमानी है। क्योंकि कई बार एक छोटा-सा वाक्य ही किसी बात को गोपनीय रखने या उसे जगजाहिर करने का कारण बन जाता है।
रचनाकार
विजया डालमिया
सम्पादिका, मेरी निहारिका और
राष्ट्रीय संयोजिका, उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका विंग)
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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