हाँ! मैं एक स्त्री हूँ।
भूमिका
मानव सभ्यता की संरचना में यदि किसी शक्ति ने सबसे गहरे, सबसे शांत और सबसे निरंतर रूप से अपना योगदान दिया है, तो वह नारी है। नारी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सृजन, संवेदना और समर्पण की वह धारा है जो जीवन को अर्थ और विस्तार देती है। वह जन्म देने वाली जननी है, संस्कारों की प्रथम गुरु है और रिश्तों को आत्मा की गहराइयों से सींचने वाली करुणा का स्रोत भी है।
नारी के इसी बहुआयामी स्वरूप को जब एक स्त्री स्वयं अपने अनुभवों, अपने आत्मबोध और अपने गर्व के साथ अभिव्यक्त करती है, तो वह केवल कविता नहीं रह जाती—वह स्त्री अस्मिता का आत्मकथ्य बन जाती है। इसमें नारी के उस स्वाभिमान की झलक मिलती है जो ईश्वर की सृष्टि में अपने सहभागी होने का बोध रखता है, जो हर रिश्ते को निभाते हुए भी अपनी गरिमा और अपनी शक्ति को पहचानता है।
प्रख्यात लेखिका प्रमिला त्रिवेदी की यह कविता स्त्री के इसी आत्मगौरव, सहनशीलता और सृजनशीलता की मार्मिक अभिव्यक्ति है। इसमें स्त्री के विविध रूप—मां, बहन, बेटी, पत्नी और बहू—के माध्यम से यह बताया गया है कि नारी केवल संबंधों को निभाती ही नहीं, बल्कि उन्हें संवेदना और प्रेम की ऊँचाइयों तक ले जाती है।
यह कविता स्त्री होने के उस स्वाभाविक अभिमान को स्वर देती है, जो किसी प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि सृष्टि में अपने अद्वितीय योगदान की सहज अनुभूति से जन्म लेता है।
यदि आप चाहें तो मैं इसी कविता के लिए एक और अधिक साहित्यिक और भावनात्मक भूमिका (पत्रिका प्रकाशन स्तर की) भी तैयार कर सकता हूँ, जो इसे और प्रभावशाली बना दे।
हाँ! मैं एक स्त्री हूँ।
और! मुझे इस पर गर्व है
कि ईश्वर ने मुझे एक स्त्री का रूप दिया।
सृष्टि रचने के अपने काम में
अपना सहभागी बनाया।
कोई भी महत्वपूर्ण काम तो
विश्वासपात्र को ही सौंपा जाता है।
वो जानता है कि नारी सहनशील है।
सृष्टि की रचना का काम आगे बढ़ाने के लिए
और गोवर्धन पर एक एक लाठी लगाने के लिए
उसने हमारा चुनाव किया।
इसीलिए अपने बराबर का दर्जा भी दिया।
संसार में ईश्वर के समान ही मां का भी सम्मान करते हैं।
क्यों के उसने सृष्टि रचाने में भगवान का साथ दिया।
ईश्वर ने यह बता दिया है कि
मेरे काम को जो आगे बढ़ाएगा।
संसार में वो सम्मान ही पाएगा।
ईश्वर को भी आना पड़ा है इस जगत में।
उसने भी मां का सहारा लिया है इस संसार में।
प्रथम गुरु का भी मान दिया मां को।
ईश्वर ने अपने बाद दुसरा स्थान दिया मां को।
उसकी इतनी कृपा है हम पर।
मां, बहन, बेटी, पत्नी, बहू।
हर रूप में हमने अपना फर्ज निभाया,
शायद यह स्त्री का मन है—
जो रिश्तों को गहराई से जीता है,
जो प्रेम को केवल स्वीकार नहीं करता,
उसकी पुष्टि भी चाहता है।
शायद यही स्त्री की शक्ति है—
भावों और संवेगों के शिखर तक
सरलता से पहुँच जाना।
तो क्यों ना अभिमान करें, अपने स्त्री होने पर।
रचनाकार





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