सुगंध बनकर बोलती नारी दिव्य सुगंधा का आत्मकथ्य
मैं हूँ दिव्य सुगंधा।
फूल की तरह दिखना मेरा उद्देश्य नहीं, बल्कि सुगंध की तरह फैलना मेरा स्वभाव है।
आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का पावन दिन आया है, तो मन के आँगन में नारी के अनेक रूपों की महक एक साथ घुल उठी है। तब लगता है—नारी केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि परमात्मा की करुणा का जीवंत स्पर्श है।
कभी वह माँ बनकर सृष्टि को जन्म देती है,
कभी बहन बनकर स्नेह की छाया देती है,
कभी बेटी बनकर घर की आशा बनती है,
और कभी त्याग बनकर इतिहास में अमर हो जाती है।
मेरे मन की सुगंध आज उन मातृशक्तियों के चरणों में बिखरना चाहती है, जिन्होंने अपने जीवन से नारीत्व को एक दिव्य अर्थ दिया।
जब भी त्याग की बात आती है, मेरे भीतर श्रद्धा से सिर झुक जाता है पन्ना धाय के सामने। मेवाड़ की रक्षा के लिए उन्होंने अपने ही पुत्र चंदन का बलिदान दे दिया। उस क्षण एक माँ रोई जरूर होगी, पर राष्ट्र की रक्षा का संकल्प उसकी ममता से भी बड़ा हो गया। ऐसी नारी वास्तव में त्याग की मूर्ति ही नहीं, बल्कि इतिहास की आत्मा बन जाती है।
फिर स्मरण आता है रानी कर्णावती का, जिनके साथ अनेक वीरांगनाओं ने जौहर की ज्वाला में स्वयं को समर्पित कर दिया। यह केवल मृत्यु नहीं थी, यह स्वाभिमान की ऐसी अग्नि थी जिसने आने वाली पीढ़ियों को साहस की परिभाषा दी।
मेरा मन करुणा से भीग उठता है जब मैं दुक्का सीथम्मा का स्मरण करती हूँ। उन्होंने अपने संसाधनों को अपने लिए नहीं, बल्कि पीड़ितों के लिए समर्पित किया। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में भूखे-प्यासे लोगों के लिए भोजन और आश्रय की व्यवस्था करके उन्होंने सचमुच अन्नपूर्णा का रूप धारण किया।
और फिर स्मृतियों में उभरती है वह करुणामयी छवि—सिंधुदेवी सपकल।
एक गरीब परिवार में जन्मी, कभी ट्रेन में गाकर भीख माँगने को विवश हुई वह स्त्री एक दिन हजारों अनाथ बच्चों की “माई” बन गई। वर्धा और अमरावती के उनके आश्रम आज भी सैकड़ों नहीं, हजारों बच्चों के जीवन में माँ का स्नेह बाँट रहे हैं। यह करुणा की ऐसी सुगंध है जो समय के साथ और भी गहरी होती जाती है।
और मेरी श्रद्धा झुकती है उस साधना के आगे भी, जो विदेश से आई एक युवती को ब्रजभूमि में स्थायी कर गई—सुधेवी दासी। गोवर्धन के समीप राधासुरभि गौशाला में घायल और बीमार गौवंश की सेवा में लगा उनका जीवन बताता है कि करुणा की कोई सीमा नहीं होती।
इन सबके स्मरण से मेरा अंतर्मन कह उठता है—
नारी केवल शरीर नहीं, वह संवेदना की सुगंध है।
वह जब जन्म देती है तो सृष्टि बनती है,
जब त्याग करती है तो इतिहास बनती है,
और जब सेवा करती है तो मानवता की पहचान बन जाती है।
आज मैं, दिव्य सुगंधा, नारी के इन रूपों को प्रणाम करते हुए यही अनुभव करती हूँ—
नारी वास्तव में परमात्मा की वह आत्मा है, जो संसार को प्रेम, त्याग और करुणा की सुगंध से भरती रहती है।
समस्त मातृशक्ति को मेरा विनम्र नमन। 🌸
रचनाकार
दिव्य सुगंधा
स्थानीय संपादक
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
आगरा
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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