विजयसिंह पथिक
स्वेच्छाचार के विरुद्ध एक ज्वलंत जीवन
“यश, वैभव और सुख की मुझे चाह नहीं,
जीवन रहे या न रहे इसकी भी परवाह नहीं।"
बस एक ही आकांक्षा है—
"इस संसार में किसी का स्वेच्छाचार और अत्याचार न रहे।”
यह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व की आत्मा की पुकार थी जिसने अपना पूरा जीवन अन्याय और दमन के विरुद्ध समर्पित कर दिया। यह जीवन-मंत्र था महान क्रांतिकारी, चिंतक और किसान चेतना के अग्रदूत विजयसिंह पथिक का।
पथिक जी का जीवन आरंभ से ही संघर्षों से घिरा रहा। माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया। जीवन की पहली ठोकरों ने उन्हें समय से पहले ही परिपक्व बना दिया। वे अपनी बड़ी बहन के पास इंदौर चले गए, जहाँ उनके जीजा सरकारी सेवा में थे। औपचारिक शिक्षा अधिक नहीं मिल सकी; हाई स्कूल से आगे पढ़ने का अवसर भी नहीं मिला। किंतु यह कमी उनके व्यक्तित्व की सीमा नहीं बन सकी।
ज्ञान की भूख जब भीतर जलती है तो विद्यालयों की दीवारें भी छोटी पड़ जाती हैं। पथिक जी ने स्वाध्याय को अपना गुरु बनाया। अध्ययन की साधना से उन्होंने अंग्रेज़ी, उर्दू, गुजराती, मारवाड़ी और अनेक क्षेत्रीय भाषाओं पर ऐसा अधिकार प्राप्त किया कि बड़े-बड़े शिक्षित लोग भी चकित रह जाते। अंग्रेज़ी भाषा पर उनकी पकड़ विशेष रूप से प्रभावशाली थी। यही कारण था कि उनका पत्राचार ब्रिटेन की संसद के कई सांसदों से होता था।
इन्हीं संवादों के परिणामस्वरूप 1928 में उनकी एक महत्वपूर्ण पुस्तक सामने आई—
**“What are Indian States”**।
यह पुस्तक केवल एक लेखकीय प्रयास नहीं थी, बल्कि भारतीय रियासतों की वास्तविकता का दस्तावेज़ थी। ब्रिटेन के अनेक लोग यह तक नहीं जानते थे कि भारत के भीतर भी ऐसी रियासतें हैं जहाँ पूर्ण राजशाही शासन चलता है और जनता के अधिकार नगण्य हैं। ब्रिटिश सांसद **मिस ए. हडसन** की प्रेरणा से लिखी गई इस पुस्तक ने उस अंधेरे परत को उजागर किया जिसे लंबे समय से छिपाकर रखा गया था।
पथिक जी के संपर्क में कई ब्रिटिश सांसद थे—
डॉ. अर्नेस्ट बैरिस्टो, रशब्रुक विलियम्स, डब्ल्यू. टी. केली, पर्सेल, सेर्नर ब्रॉकवे और विल्फ्रेड वेलॉक जैसे लोग। इन संवादों के माध्यम से पथिक जी ने रियासतों के अत्याचारों की सच्चाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने का साहसिक प्रयास किया।
उनकी पुस्तक में उस समय की रियासती व्यवस्था के कई कठोर और अमानवीय पक्षों का उल्लेख मिलता है। उदाहरण के रूप में जयपुर राज्य में “पटार खाना” जैसी व्यवस्था का वर्णन मिलता है, जहाँ सुंदर और युवा लड़कियों को रखकर उन्हें नृत्य-संगीत सिखाया जाता और अलग-अलग दलों में विभाजित किया जाता था। इन दलों को “अखाड़ा” कहा जाता था और प्रत्येक की देखरेख एक जमादारनी करती थी।
हजूर का अखाड़ा, माधो निवास का अखाड़ा, ग्रीन पैलेस अखाड़ा, झाली जी का अखाड़ा, चंदावत का अखाड़ा और तनवर जी का अखाड़ा जैसे नाम उस व्यवस्था का हिस्सा थे। यह उस दौर की राजशाही विलासिता और सामाजिक असमानता की कठोर तस्वीर थी।
ऐसे ही अन्यायपूर्ण वातावरण ने पथिक जी के भीतर विद्रोह की आग को और प्रज्वलित किया। उन्होंने किसानों के अधिकारों के लिए जो आंदोलन प्रारंभ किया, वह इतिहास में **बिजौलिया किसान आंदोलन** के नाम से अमर हो गया। यह केवल एक आंदोलन नहीं था, बल्कि शोषित किसानों की चेतना का जागरण था। यह सत्याग्रह छह वर्षों तक चला और पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
इस संघर्ष की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी। पथिक जी को पाँच वर्षों तक उदयपुर की जेल में रहना पड़ा। परंतु जेल की दीवारें उनके विचारों को कैद नहीं कर सकीं। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने **देशी राज्य परिषद** का गठन किया और रियासतों की जनता को संगठित करने का कार्य प्रारंभ किया।
उस समय राष्ट्रीय राजनीति में भी रियासतों के प्रश्न को लेकर संकोच था। कांग्रेस राजाओं के क्षेत्रों में खुलकर काम नहीं करना चाहती थी। किंतु पथिक जी के आग्रह और प्रयासों ने इस दिशा में परिवर्तन का मार्ग खोला। रियासती जनता को प्रतिनिधित्व देने का विचार धीरे-धीरे स्वीकार किया जाने लगा।
जनसेवा को संगठित रूप देने के लिए उन्होंने **राजस्थान सेवा संघ** की स्थापना की। जिस प्रकार गोपालकृष्ण गोखले ने भारत सेवा समिति और लाला लाजपत राय ने लोक सेवक समिति की नींव रखी थी, उसी प्रकार पथिक जी ने राजस्थान की धरती पर सेवा और जनजागरण का एक सशक्त आधार तैयार किया।
1920 में उन्होंने वर्धा से सेठ **जमनालाल बजाज** के सहयोग से **“राजस्थान केसरी”** नामक पत्र निकाला। यह पत्र रियासतों की जनता के अधिकारों की आवाज़ बन गया। बाद में इसी प्रेरणा से अन्य क्षेत्रों में भी इसी प्रकार के पत्र निकलने लगे।
पथिक जी केवल क्रांतिकारी ही नहीं, एक संवेदनशील साहित्यकार भी थे। उन्होंने राष्ट्रध्वज के सम्मान में एक **झंडा-गान** की रचना की, जिसे स्वतंत्रता सेनानी जेलों में गाते थे। शब्दों में भी उनके भीतर वही आग थी जो उनके कर्मों में दिखाई देती थी।
दिल्ली बम कांड के बाद उन्होंने **भूप सिंह** नाम से भी कार्य किया। 1915 में सशस्त्र क्रांति की एक योजना भी बनाई गई थी। उन्होंने लगभग तीस हजार बंदूकों की व्यवस्था कर उन्हें सुरक्षित स्थानों पर छिपा दिया था, किंतु सरकार को सूचना मिल जाने के कारण साथियों को तितर-बितर होने का आदेश देना पड़ा।
1930 में उन्हें राजपूताना, अर्थात आज के राजस्थान का प्रांतीय अध्यक्ष बनाया गया। बाद में वे आगरा गए और वहाँ से **“नवसंदेश”** नामक समाचार पत्र निकाला। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय अंग्रेज़ी सरकार ने इस पत्र को जब्त कर लिया।
पथिक जी का प्रभाव इतना गहरा था कि आज भी राजस्थान के गाँवों में विवाह और उत्सवों के अवसर पर महिलाएँ उनके सम्मान में लोकगीत गाती हैं। यह सम्मान इतिहास में विरले ही किसी व्यक्ति को प्राप्त हुआ है।
उन्होंने अपने जन्मस्थान **गुठावली** को छोड़ दिया था और जीवन भर फिर कभी वहाँ लौटकर नहीं गए। उनका जीवन किसी एक स्थान का नहीं, बल्कि पूरे समाज का हो चुका था।
### **एक जीवन, एक संदेश**
विजयसिंह पथिक का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा संघर्ष केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों, साहस और त्याग से लड़ा जाता है।
उन्होंने कभी यश या वैभव की कामना नहीं की। उनका एक ही स्वप्न था—
मानव समाज में अन्याय और स्वेच्छाचार का अंत।
इसलिए उनका जीवन-मंत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
“जब तक संसार में अन्याय है, तब तक संघर्ष ही सच्चा धर्म है।”
आइडिया 💡
श्री विजेंद्र कसाना जी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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