सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

विचार-प्रक्रिया : प्रवेन्द्र दहिया का आत्ममंथन

 विचार-प्रक्रिया 

प्रवेन्द्र दहिया का आत्ममंथन

होली चाइल्ड पब्लिक इंटर कॉलेज के प्रांगण में कार्यक्रम की सफलता के बाद जब सब लोग धीरे-धीरे अपने घरों को लौट रहे थे, तब प्रधानाचार्य प्रवेन्द्र दहिया कुछ देर विद्यालय के आँगन में ही खड़े रह गए। सामने लगी छात्राओं की पेंटिंग्स और क्राफ्ट की झलकियाँ उनके मन में बार-बार उभर रही थीं।

वह मन ही मन सोचने लगे—

“आज का दिन सचमुच सार्थक रहा। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं होना चाहिए, बल्कि यह हमारी बेटियों के आत्मविश्वास को जगाने का माध्यम बनना चाहिए। अगर विद्यालय के मंच से बालिकाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिले, तो उनके भीतर छिपी शक्ति समाज के सामने आ सकती है।”

उनकी दृष्टि बैडमिंटन प्रतियोगिता में सम्मानित हुई छात्राओं की ओर चली गई।

“सृष्टि, अनामिका, पीहू, आरूषी, अनुश्री, आफिया… इन सबके चेहरे पर जो आत्मविश्वास था, वही तो इस आयोजन का उद्देश्य था। खेल, कला और शिक्षा—तीनों में लड़कियाँ आगे बढ़ें, तभी महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ पूरा होगा।”

प्रवेन्द्र दहिया को कार्यक्रम की तैयारी के वे दिन भी याद आने लगे जब उन्होंने शिक्षकों के साथ बैठकर योजना बनाई थी—

“क्यों न इस बार महिला दिवस को केवल भाषणों तक सीमित न रखकर छात्राओं की प्रतिभा से जोड़ दिया जाए? कला प्रदर्शनी हो, खेल प्रतियोगिता हो और समाज के ऐसे लोग आमंत्रित किए जाएँ जो बालिकाओं को प्रेरणा दे सकें।”

उन्हें संतोष था कि मुख्य अतिथि और अन्य अतिथियों के विचारों ने भी छात्राओं के मन में नई चेतना जगाई।

वे सोचने लगे—

“भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति कहा गया है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’—यह केवल श्लोक नहीं, बल्कि समाज का आदर्श है। विद्यालय का दायित्व है कि वह इस आदर्श को नई पीढ़ी के मन में संस्कार के रूप में स्थापित करे।”

उनकी नजर फिर से कला प्रदर्शनी पर पड़ी—

अनमोल, अर्पिता, आराध्या, खुशी, शिवांश, विधि, सावन, अदिति और फरहान की कलाकृतियाँ मानो चुपचाप उनसे कह रही थीं कि बच्चों को अवसर दिया जाए तो वे अद्भुत सृजन कर सकते हैं।

प्रवेन्द्र दहिया ने मन ही मन निश्चय किया—

“यह तो बस शुरुआत है। आने वाले समय में विद्यालय में ऐसे और कार्यक्रम होंगे जो बेटियों को शिक्षा, कला, खेल और आत्मविश्वास के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा देंगे।”

विद्यालय के प्रांगण से बाहर निकलते हुए उनके मन में एक संतोष की लहर थी—

आज का आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि बालिकाओं के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में उठाया गया एक सार्थक कदम था।

सूचना स्रोत 

श्री प्रवेंद्र दहिया जी

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...