एक मौलिक और पवित्र प्रयास था प्रोत्साहन
आखिर अब हम क्यों उत्साहित नहीं करते?प्रोत्साहन कभी हमारे सामाजिक संस्कार का सहज और पवित्र अंग हुआ करता था। यह कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि जीवन की धड़कनों में रचा-बसा एक भाव था। शिशु के पहले कदम से लेकर युवा के पहले प्रयास तक, किसान की पहली फसल से लेकर श्रमिक के अतिरिक्त श्रम तक—हर जगह उत्साहवर्धन की मौन-मुखर उपस्थिति दिखाई देती थी। “डू-डू-डू” की साधारण-सी ध्वनि शिशु के लिए साहस का शंखनाद बन जाती थी और वही शिशु बार-बार गिरकर भी उठने का दुस्साहस कर पाता था। यह केवल शब्द नहीं थे, यह भरोसे की ऊर्जा थी।
समूहों में तो प्रोत्साहन का प्रभाव और भी तीव्र था। “पकड़ो-पकड़ो” की आवाज़ केवल चेतावनी नहीं होती थी, वह सामूहिक साहस का उद्घोष होती थी। एक क्षण में आमजन निडर हो उठता था और अवांछित तत्व स्वयं को अकेला और कमजोर महसूस करने लगता था। यह सामाजिक मनोविज्ञान था, जहाँ उत्साह नैतिक बल में बदल जाता था।
इसी क्रम में यदि हम ग्रामीण जीवन की ओर दृष्टि डालें तो डंगवारा जैसे क्षेत्रों में प्रचलित वह गतिविधि आज भी स्मृति में जीवित है, जहाँ बिना किसी वित्तीय लेन-देन के केवल मानव श्रम का लेखा-जोखा रख एक-दूसरे की मदद की जाती थी। किसी के खेत की जुताई हो, फसल की कटाई, घर की छत डालनी हो या विवाह-समारोह की तैयारी—पूरा गाँव अपने-अपने श्रम के साथ खड़ा हो जाता था। आज मैं तुम्हारे साथ, कल तुम मेरे साथ—यही उसका मौन समझौता था। वहाँ प्रशंसा मुद्रा में नहीं, सहभागिता में व्यक्त होती थी। “अच्छा किया”, “तू आगे बढ़”—जैसे शब्दों से अधिक प्रभावी था कंधे से कंधा मिलाकर किया गया श्रम, जो आत्मसम्मान और आत्मबल दोनों को पुष्ट करता था। दुर्भाग्यवश, आज वही परंपरा एक दुर्लभ उदाहरण बनकर रह गई है।
लेकिन वर्तमान समय में स्थिति उलटती प्रतीत होती है। प्रोत्साहन की जगह निरुत्साह ने ले ली है। प्रशंसा को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है और उत्साहवर्धन को कमजोरी का पर्याय मान लिया गया है। कार्यस्थलों पर, शिक्षण संस्थानों में, यहाँ तक कि पारिवारिक संवादों में भी—गलतियों की गिनती तो होती है, पर प्रयासों की सराहना दुर्लभ हो गई है। एक कर्मठ श्रमिक जब अतिरिक्त उत्साह से बेहतर कार्य करता है और बदले में केवल मीन-मेख सुनता है, तो उसका मनोबल टूटता है। “प्रशंसा से इंसान कमजोर होता है”—यह कथन भले ही व्यावहारिक बुद्धि का भ्रम दे, पर इसके दीर्घकालिक परिणाम समाज को भीतर से खोखला कर देते हैं। शायद यही सोच धीरे-धीरे उन ग्रामीण परंपराओं को भी निगल गई, जहाँ श्रम और उत्साह एक-दूसरे के पूरक हुआ करते थे।
यही वह बिंदु है जहाँ प्रोत्साहन का अभाव एक कुत्सित कुरीति का रूप ले लेता है। यह कुरीति इसलिए भी घातक है क्योंकि यह शोर नहीं मचाती—यह चुपचाप हिम्मत को खा जाती है। परिणामस्वरूप हर क्षेत्र में उदासीनता फैलती है। लोग काम तो करते हैं, पर मन से नहीं; प्रयास तो होते हैं, पर विश्वास के बिना; उपलब्धियाँ तो मिलती हैं, पर संतोष नहीं।
इस कुरीति से मुक्ति का मार्ग कठिन नहीं, बस नीयत का है। सबसे पहला उपाय है—प्रयास की पहचान। पूर्णता से पहले प्रयास की सराहना करना सीखना होगा। दूसरा, आलोचना को सुधार का साधन बनाना होगा, अपमान का नहीं। तीसरा, परिवार, विद्यालय और कार्यस्थल—इन तीनों स्तरों पर प्रोत्साहन को संस्कार की तरह पुनः स्थापित करना होगा। साथ ही ग्रामीण समाज की उस सामूहिक श्रम-संस्कृति से फिर सीखना होगा, जहाँ बिना धन के भी सहयोग, उत्साह और विश्वास के सहारे बड़े-बड़े काम संपन्न हो जाते थे। छोटे-छोटे शब्द—“अच्छा प्रयास”, “तुम कर सकते हो”, “आगे और बेहतर होगा”—और छोटे-छोटे कर्म—किसी के साथ खड़ा हो जाना—असाधारण परिणाम दे सकते हैं।
समाज को यह समझना होगा कि प्रोत्साहन से व्यक्ति कमजोर नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी बनता है। आत्मविश्वासी व्यक्ति ही जिम्मेदार, रचनात्मक और नैतिक समाज की नींव रखता है। यदि हम फिर से उत्साहित करना सीख लें और डंगवारा जैसी परंपराओं के भाव को आधुनिक जीवन में समाहित कर लें, तो संभव है कि उदासीनता के इस दौर से बाहर निकलकर हम एक बार फिर जीवंत, संवेदनशील और साहसी समाज की ओर लौट सकें।
प्रोत्साहन कोई अतिरिक्त खर्च नहीं है—यह तो वह पुण्य है, जिसे बाँटने से ही बढ़ाया जा सकता है।
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