सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

उन्नत कृषक श्री प्रकाशचंद्र जी से बातचीत

उन्नत कृषक श्री प्रकाशचंद्र जी

भूमिका 

भुस पर लीपना से आशय थोथी बात करने से होता है और भारत देश में कृषि क्षेत्र की जागरूकता को लेकर सभी सरकारों के प्रयास इसी कहावत को चरितार्थ करते हैं। इसको दर्शाने को इतना ही पर्याप्त है कि कृषक समाज में अधिसंख्य आज तक भी बीजों की किस्मों की पहचान कर सकने में अक्षम हैं। इतना ही नहीं कृषि कार्यों में प्रयुक्त होने वाली पेस्टीसाइड्स-इंसेक्टसाइड्स पर बने हुए चिन्हों को भी आम किसान नहीं समझ पाता ऐसे में अपने स्तर से रूटीन फसलों को अपने स्तर से व्यवस्थित कर सकने में सक्षम उन्नत कृषक मन मोह लेते हैं। ऐसे ही एक कृषक हैं मेरठ जनपद में परीक्षितगढ़ ब्लॉक के ग्राम बोंद्रा के श्री प्रकाशचंद्र नागर जिनकी सरसों की फसल की एकरूपता ऐसी कि उस मार्ग से आते जाते का मन स्वाभाविक तरीके से मोह ले।

श्री प्रकाश ब्लॉक के उन्नत कृषक हैं और कृषिगत जानकारियों के लिए उनकी अमिट जिज्ञासा ही ने उनको उन्नत कृषक बनवाने में मदद की है।

नीचे श्री प्रकाशचंद्र नागर (उन्नत कृषक, ग्राम—बोंद्रा, ब्लॉक—परीक्षितगढ़, मेरठ) पर आधारित एक सटीक, गहन, और विश्लेषणात्मक इंटरव्यू (प्रश्न–उत्तर प्रारूप) प्रस्तुत है। यह इंटरव्यू उनके ज्ञान, दृष्टिकोण, अनुभव और कृषक-मॉडल के रूप में उनकी उपयोगिता का समग्र मूल्यांकन करने में सहायक होगा।

साक्षात्कार 

प्रश्न १. आपको खेती का ज्ञान बढ़ाने की प्रेरणा कहाँ से मिली? क्या कोई विशेष घटना रही जिसने आपको उन्नत कृषक बनने की दिशा में आगे बढ़ाया?

उत्तर: "बचपन से ही खेत–खलिहान में काम करते हुए यह महसूस होता था कि अगर हम विज्ञान और तकनीक का उपयोग करें तो पैदावार कई गुना बढ़ सकती है। एक बार गलत किस्म के बीज लेने से पूरी फसल खराब हो गई थी। तभी तय किया कि ‘अनजान’ नहीं रहना है—बीज, मिट्टी, फसल और तकनीक सबका अध्ययन करना है। उसी जिज्ञासा ने मुझे आगे बढ़ाया। हमारा मार्गदर्शन पिता जी ने किया।"

प्रश्न २. सरसों की आपकी फसल की एकरूपता को देखकर लोग प्रभावित होते हैं। आप इसके पीछे कौन-से प्रमुख वैज्ञानिक तरीकों को अपनाते हैं?

उत्तर: "मुख्य रूप से दो बातें—बीज की शुद्धता और समान अंतराल पर सटीक बोवाई। बीज मैं प्रमाणित संस्थानों से लेता हूँ और हर बोवाई से पहले अंकुरण परीक्षण करता हूँ। उचित मात्रा में और सही अनुपात में सरसों बिखरते हैं जिससे पौधों की वृद्धि समान रहती है।"

प्रश्न ३. कई किसान अभी भी बीज की किस्मों की पहचान नहीं कर पाते। आप किस प्रकार बीज चयन करते हैं? कोई विशेष मानक?

उत्तर: "मैं सरसों के बीज की किस्म उसके तेल–प्रतिशत, कीट प्रतिरोधक क्षमता, //अंकुरण दर**, और **मौसम अनुकूलता** के आधार पर चुनता हूँ। खरीदी के समय लेबल, बैच नंबर, उत्पादन वर्ष और प्रमाणन चिह्न जरूर देखता हूँ। तभी खेत में डालता हूँ।

प्रश्न ४. आपको क्या लगता है—कृषि जागरूकता की कमी का सबसे बड़ा कारण क्या है?

उत्तर: "सबसे बड़ा कारण है व्यावहारिक प्रशिक्षण का न होना। सरकारें योजना तो बनाती हैं, लेकिन किसान तक प्रयोग के स्तर की जानकारी नहीं पहुँचती। कागज़ पर सब ठीक लगता है, पर जमीन पर सूचना बिखरी रहती है। किसान को जरूरत है हाथ पकड़कर सिखाने की, न कि सिर्फ मीटिंग भर करने की।"

प्रश्न ५. आपके अनुसार आज के किसान को सबसे पहले क्या जानना चाहिए—मिट्टी, पानी या बीज?

उत्तर: "सबसे पहले मिट्टी। मिट्टी को समझे बिना खेती करना वैसा ही है जैसे बिना नक्शे के सफर पर निकल जाना। मैं हर साल मिट्टी परीक्षण नहीं कराता लेकिन थोड़े अधिक अंतराल पर कराया है और उसी आधार पर पोषक तत्वों का संतुलन बनाता हूँ।"

प्रश्न ६. सरसों, गेहूं या अन्य फसलों के लिए आपका खाद प्रबंधन कैसा रहता है?

उत्तर: "मैंने न्यूट्रिएंट्स के साथ साथ गोबर खाद और जैविक खादों का उपयोग बढ़ाया है ताकि मिट्टी की संरचना सुरक्षित रहे। यूरिया का उपयोग सिर्फ आवश्यकता अनुसार करता हूँ, *ज्यादा उत्पादन* के लालच में नहीं।"

प्रश्न ७. आपकी सरसों की फसल को देखकर लोग कहते हैं कि “रास्ते से गुजरने वालों का मन मोह लेती है।” इस सौंदर्य के पीछे आपकी सोच क्या है?

उत्तर: "मेरी सोच सरल है—अगर फसल स्वस्थ है तो उसका रूप भी सुंदर होगा।

एकरूपता और अनुशासन खेती में भी उतना ही आवश्यक है जितना जीवन में। जब खेत सुव्यवस्थित दिखते हैं तो मन में सम्मान भी बढ़ता है और दूसरों को प्रेरणा भी मिलती है।"

प्रश्न ८. उन्नत कृषक बनने की दिशा में आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?

उत्तर:  "मेरे लिए उपलब्धि यही है कि मेरे गांव के कृषक अब खेती को बोझ नहीं, बल्कि एक विज्ञान और अवसर के रूप में देखने लगे हैं। दूसरे गांवों के लोग भी तकनीक सीखने आते हैं—यह मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।'

प्रश्न ९. नए किसानों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

उत्तर: “देखकर खेती मत करें, समझकर खेती करें।

* मिट्टी परीक्षण जरूर कराएं।

* बीज खरीदते समय प्रमाणन देखें।

* मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग ज्ञान बढ़ाने के लिए करें।

* एक फसल में माहिर बनें, फिर धीरे-धीरे विविधता बढ़ाएँ।

* खर्च को निवेश की तरह समझें—जहाँ ज़रूरी हो, वहीं लगाएँ।"

प्रश्न १०. क्या आपको लगता है कि सरकार के प्रयास किसानों तक ठीक तरह पहुँचते हैं?

उत्तर: "सच कहूँ तो अभी भी ज़मीन पर प्रयासों का असर उतना नहीं दिखता। योजनाएँ अच्छी हैं, पर क्रियान्वयन कमजोर है। किसानों को वैज्ञानिकों से सीधा जोड़ा जाए तो आधा बदलाव अपने आप आ जाएगा।"

प्रश्न ११. आप अपनी आने वाली पीढ़ी को खेती से जोड़ने के लिए क्या प्रयास कर रहे हैं?

उत्तर: "मैं पूछने वाले को फसल के पौधों के जीवनचक्र समझाता हूँ, आधुनिक तकनीकें दिखाता हूँ और ये बताता हूँ कि खेती सिर्फ हल चलाना नहीं—यह एक स्मार्ट और सम्मानजनक पेशा है।"

सूचना स्रोत 

श्री प्रकाशचंद्र जी

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 







टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...