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फागुन महोत्सव (संस्मरण)

फागुन महोत्सव

हर वर्ष फागुन का महीना आते ही सारा वातावरण जैसे रंगीन हो जाता है, और हो भी क्यों न—रंगों के त्योहार ‘होली’ की बारी जो रहती है। पीली चुनर ओढ़े प्रकृति और जाति-भेद, ऊँच-नीच, अमीरी-गरीबी से ऊपर उठकर मित्रता और भाईचारे का संदेश देने वाला यह त्योहार मानो सबके जीवन में फागुनी बहारें भर देता है।

‘फाग’ के सौन्दर्य को कवियों और शायरों ने बखूबी कलमबंद किया है। आइए, उन्हीं की नज़र से फागुन को देखते हैं।

होली भारत में मनाए जाने वाले सबसे जीवंत और रंगीन त्योहारों में से एक है। हर साल मार्च महीने में मनाया जाने वाला यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। यह मूलतः वसंत ऋतु के आगमन, शीत ऋतु के अंत और नई फसल के मौसम के आशीर्वाद का उत्सव भी है।

होली वसंत और ग्रीष्म ऋतु के मध्य उल्लास के साथ मनाई जाती है। पहले दिन के उत्सव के बाद लोग रंगों से खेलते हुए, गीत गाते हुए, कहानियाँ सुनाते हुए, नाचते हुए और घर में बनी मिठाइयों का आनंद लेते हुए इस पर्व को मनाते हैं। भारतीय अपने सभी त्योहारों से भली-भांति परिचित हैं, और होली उनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है।

खासकर बचपन की होली तो कभी भुलाई ही नहीं जा सकती। हम गुब्बारों में रंग वाला पानी भरकर मैं और मेरा भाई बालकनी से फेंकते और फिर छुपकर देखते। सामने वाला चारों तरफ देखता, मुस्कुराता और आगे बढ़ जाता। रंग लगाए हुए व्यक्ति पर फेंकने में उतना मज़ा नहीं आता था; जो बिल्कुल कोरा, साफ-सुथरा दिखता, उसी पर रंग फेंकते थे। मेरा भाई तो घर से ही गुलाल लगाकर निकलता था, ताकि लोग उसे ज़्यादा रंग न लगाएँ।

एक सहेली के घर पर हम सब सहेलियाँ इकट्ठा होती थीं। वहाँ किसी भी जेन्ट्स की एंट्री नहीं होती थी। सभी लड़कियाँ और महिलाएँ मिलकर होली मनातीं। कुछ औरतें रसिया गातीं, होली के फिल्मी गाने बजते रहते और खाने-पीने का भी बहुत अच्छा इंतज़ाम रहता। शाम को पापा हमें लेने आते और हम घर लौटते।

शादी के बाद ससुराल में भी होली बहुत धूमधाम से मनाई जाती थी। पाँच परिवार एक ही वाड़े में रहते थे—वाड़ा यानी बीच में आँगन और उसके चारों ओर बने पाँच घर। सब लोग बहुत मिल-जुलकर रहते थे। होली के दिन सबका खाना एक साथ बनता, सुबह ठंडाई तैयार होती और पूरे आनंद के साथ त्योहार मनाया जाता।

एक बार होली के दिन मैंने सुबह-सुबह पति को सोते में ही रंग लगा दिया। वे नींद से उठकर चाय पीने आए और सब उन्हें देखकर हँसने लगे। मेरी सासु माँ ने उन्हें आईना लाकर दिखाया। वे हँसते हुए मेरी ओर देखने लगे। मैंने इशारे से कहा, “मैं नहीं,” और यह देखकर सब लोग ज़ोर से हँस पड़े।

सच ही है—त्योहार बीत जाते हैं, पर उनकी मधुर स्मृतियाँ जीवन भर साथ रहती हैं।

स्मृति



सूचना स्रोत 
प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय सम्पादिका 
उलझन सुलझन लेडीज विंग 
हैदराबाद (तेलंगाना)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 





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