'स्वर्ण-चेतना: सूर्य'
अंधकार की कोख से जन्मा, एक मौन उद्घोष है
शून्यता के हृदय में बसा
तू अनंत का संतोष है।
न आदि तेरा,
न अंत कहीं,
बस वर्तमान की धारा है,
तू ही दृष्टा, तू ही दृश्य,
तू ही जगत का सहारा है।
तू प्रतीक है उस ज्ञान का,
जो भीतर कहीं सोया है,
माया के घने कुहासे में,
जिसे मनुष्य ने खोया है।
जैसे किरणें तेरी छूती हैं,
धरा के कण-कण को निश्छल,
वैसे ही सत्य जगाता है,
आत्मा को कर के निर्मल।
तू जलता है निरंतर,
कि सृष्टि को प्रकाश मिल सके,
तू तपता है अकेला,
कि जीवन का हर पुष्प खिल सके।
तेरा समर्पण सिखाता है 'अहं' को भस्म करना,
स्वयं को मिटाकर ही तो है,
परोपकार में उतरना।
उदय तेरा सवेरा नहीं,
जागृति का एक संकेत है,
अस्त होना अंत नहीं,
विश्राम का ही एक खेत है।
तू सिखाता है कि
जो ऊँचा है, उसे झुकना भी आता है,
संध्या की लालिमा में तू,
वैराग्य का राग सुनाता है।
हे हिरण्यगर्भ! हे प्राणपुंज! तू आत्मा का दर्पण है,
बाहर जिसे हम ख़ोज रहे, वह भीतर ही समर्पण है।
जब तक़ मन में मोह रहेगा,
तब तक़ तिमिर का साया है,
जिस दिन तू भीतर उगेगा,
समझो मिट गई सब माया है।
हे सूर्य, तू केवल एक
खगोलीय पिंड नहीं,
बल्कि चेतना, ज्ञान और
निरंतरता का सर्वोच्च
प्रतीक है।
रचनाकार
-डॉ. दक्षा जोशी 'निर्झरा'
अहमदाबाद (गुजरात)
प्रस्तुति


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