प्रमाणपत्र बनाम वास्तविक कौशल की पड़ताल
आज के समय में ‘कौशल’ शब्द केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की सहजता का आधार बन चुका है। घर की एक साधारण सी तकनीकी समस्या जब कई दिनों तक समाधान की प्रतीक्षा में खड़ी रह जाए, तो यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि व्यवस्था की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।
राजीव के घर में आधे हिस्से की विद्युत आपूर्ति का अचानक बाधित होना एक सामान्य तकनीकी समस्या थी, जिसका समाधान कुछ ही घंटों में संभव था। परंतु विडंबना यह रही कि एक के बाद एक तकनीशियन आते रहे, अनुमान लगाते रहे, समय टालते रहे और समस्या जस की तस बनी रही। किसी ने एमसीबी को कारण बताया, किसी ने अतिरिक्त सहयोगी की आवश्यकता बताई, तो किसी ने बिना समाधान के ही सेवा शुल्क की मांग कर दी।
स्थिति तब और जटिल हो गई जब अनजाने हस्तक्षेप से तीन-फेज मीटर के एक फेस की सप्लाई ही बाधित हो गई और शासकीय विद्युत विभाग की सहायता लेनी पड़ी। यह घटना केवल तकनीकी असफलता नहीं, बल्कि कौशल की कमी, जिम्मेदारी की कमी और कार्य के प्रति संवेदनशीलता की कमी का संकेत भी है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है —
क्या प्रमाणपत्र प्राप्त कौशल ही वास्तविक कौशल का प्रमाण है?
जब तीन दिन की भागदौड़, प्रतीक्षा और असमंजस के बाद ग्रामीण अंचल से आए तकनीशियन आज़ाद ने समस्या का मूल कारण पहचानकर त्वरित समाधान कर दिया, तब यह स्पष्ट हुआ कि वास्तविक दक्षता केवल औपचारिक प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि अभ्यास, समर्पण और बहुआयामी अनुभव से विकसित होती है।
आज कौशल विकास की योजनाएँ, जैसे कि Skill India, युवाओं को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से चल रही हैं, जो निस्संदेह एक सकारात्मक पहल है। किंतु जमीनी स्तर पर यदि प्रशिक्षित कर्मियों में समस्या-विश्लेषण, व्यावहारिक समझ और उत्तरदायित्व का अभाव है, तो प्रशिक्षण का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
इस घटना से तीन प्रमुख निष्कर्ष सामने आते हैं—
1. तकनीकी कार्य में अनुमान नहीं, विश्लेषण आवश्यक है।
2. कौशल का मूल्य प्रमाणपत्र से अधिक कार्य-क्षमता से तय होता है।
3. सेवा-भाव और जिम्मेदारी, तकनीकी ज्ञान जितने ही आवश्यक हैं।
ग्रामीण तकनीशियन आज़ाद का दृष्टिकोण उल्लेखनीय था। उन्होंने समस्या को श्रेणियों में बाँटकर देखा, संपूर्ण वायरिंग, लोड वितरण, मीटर कनेक्शन और एमसीबी की क्षमता का परीक्षण किया तथा मूल दोष को पहचानकर व्यवस्थित समाधान प्रस्तुत किया। यह व्यवहार बताता है कि वास्तविक स्किल वह है जो समस्या के मूल तक पहुँचकर स्थायी समाधान दे सके।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि कौशल विकास योजनाओं में केवल प्रशिक्षण और प्रमाणन पर ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक दक्षता, नैतिक कार्यसंस्कृति और समस्या-समाधान क्षमता पर विशेष बल दिया जाए।
अन्यथा स्किल एक दस्तावेज बनकर रह जाएगा और समाज को वास्तविक समाधान के लिए आज़ाद जैसे जमीनी कुशल व्यक्तियों की तलाश करनी पड़ेगी।
प्रेरक
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







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