05.02.2026
यह मेरे हृदय की पीड़ा है। बोझिल हृदय से व्यक्त कर रहा हूं। एपस्टिन एवं अन्य पुरुष दरिंदों ने एक वीरान टापू पर 7 से 10 साल की नाबालिकों का क्रूर शोषण किया। जहां उनकी दुखांत चीखें सुनने वाला कोई भी नहीं था।
हरियाणा के कैथल में क्रूरता की हदें पार करते हुए एक अबला बहू की हत्या की गई। पिछले दो-चार दिनों से इन घटनाओं ने मेरे मन को सुन्न कर रखा है।
आज मैं पुरुष जाति पर बड़े प्रश्न खड़ा करूंगा। सभी प्रकार से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक प्रभुत्व रखने वाले पुरुषों क्या स्त्री कोई निर्जीव वस्तु है जिसे जैसे चाहो अपनी जरूरत के मुताबिक उपयोग में लाओ?
क्या स्त्रियों का जन्म मात्र पुरुषों को शारीरिक सुख एवं वंश वृद्धि के लिए हुआ है? क्या स्त्रियां पशु हैं जिनके हाथ में उनकी रस्सी दे दो वह चाहे जैसे उनको हांके?
जिसे तुम चरित्रहीनता कहते हो... क्या उनको चरित्रहीन बनाने में तुम पुरुषों की कोई भूमिका नहीं है?
आज किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए पुरुषों ने किसान संगठन बनाए हुए हैं। स्वर्णो ने अपने, दलितों ने अपने, भिन्न-भिन्न जातियों ने अपने, भिन्न-भिन्न धर्मो ने अपने संगठन बने हुए हैं। क्या कोई धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक प्रभाव रखने वाले पुरुष स्त्रियों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध संगठन बनाने में स्त्रियों की सहायता कर सकता है?
ओ पुरुषों तुम उन्हें बहलाते हो, फुसलाते हो। धार्मिक आधार पर उनका शोषण करते हो। उनके कोमल स्त्रीत्व का फायदा उठाकर उनसे उनके पतियों की हत्या कराते हो।
धीरे-धीरे जाल बुनकर उन्हें भागकर उनके माता-पिता से उनका संबंध तुड़वाते हो। उन्हें झूठी ममता परोसकर उनका उत्पीड़न करते हो, ब्लैकमेल करते हो।
ओ नारी तू अबला है। तेरा दूसरा नाम कमजोरी है। तुझे देवी की संज्ञा देना, तेरी पूजा करना.. सब मिथ्या बातें हैं। तू सदैव पीड़ित रही है।
पुरुष धर्म के आधार पर, सामाजिक रीति रिवाजों के आधार पर तेरा शोषण करता आया है... करता रहेगा। "तेरा जन्म केवल धैर्य रखने के लिए हुआ है।"
04.02.2026
भेदभाव की भावना तो सगे भाइयों में भी होती है। परंतु जब सगे भाई की तुलना चचेरे भाई से हो तो झुकाव सदैव सगे भाई की ओर रहता है। जब चचेरे भाईयों की तुलना किसी दूसरे परिवार के सदस्यों से हो तो झुकाव सदैव पारिवारिक सदस्यों की ओर रहता है।
यह अवधारणा 'कौन कितना अपना है-कितना पराया है!' के सिद्धांत पर कार्य करती है। यह अवधारणा स्वाभाविक है, जिसके मूल में मोह बसा है।
यह स्वाभाविक अवधारणा जाति और धर्म जैसे बड़े वर्गों पर जोरदार ढंग से लागू होती है। अपना धर्म, अपनी जाति सदैव पराये धर्म, परायी जाति से अधिक अच्छे लगते हैं।
अपने-पराये के इस भेद को... मनुष्यों के मन से कोई नहीं निकल सकता। क्योंकि यह मनुष्यों के जैविक स्वभाव का हिस्सा है। जैसे कहा भी जाता है कि डायन कितनी भी भूखी हो, अपने बच्चों को नहीं खाती।
बड़े-बड़े पीर-पैगंबर, ऋषि-मुनि, दार्शनिकों ने इस मोह और अपने-पराये के भेद को मिटाने की भरपूर कोशिश की। परंतु यह अपने-पराये का भेद सतत बना हुआ है। क्योंकि यह हमारे स्वभाव का जैविक गुण है, या यूं कहूं दोष है।
दूसरी और सगे भाई अपने-पराये का भेद रखते हुए भी एक साथ रहने की आदत डाल लेते हैं।और इस आदत के परिणाम स्वरूप भाइयों से परिवार, परिवार से कुनबा, कुनबा से गांव, गांव से समाज, समाज मे भिन्न-भिन्न जातियां और भिन्न-भिन्न धर्म बसते चले जाते हैं।
दूसरी ओर जहां अपने-पराये का भेद होने के कारण, मनुष्य एक साथ रहने की आदत छोड़ देते है वहां धर्म, जातियां, समाज, गांव, कुनबे, परिवार,अपने-पराये के भेद की आग की लपटों में जलकर नष्ट हो जाते हैं।
यह सर्वविदित है, इसे हर कोई जानता है कि "बसने में खुशहाली एवं शांति है, उजड़ने में पीड़ा एवं अशांति है।"
इतिहास इसका गवाह है। बीता हुआ समय अनेको बार इस अपने-पराये के भेद के कारण मानवता का विनाशकारी मंजर देख चुका है। इस विनाश के पीछे जो बचते हैं वे उस भयावह मंजर को देखकर शांति एवं एक साथ मिलकर रहने के महत्व को समझते हैं। फिर से अपने-पराये का भेद रखते हुए एक साथ रहने की आदत डाल लेते हैं।
परंतु यहां महत्व इस बात का है कि बिना ठोकर खाए संभलना बुद्धिमानी है। भारतीय समाज में सदैव अपने-पराये का भेद कुछ अधिक रहा है। फिर भी इतिहास से सबक लेकर हमें मानवता के विनाश से बचने के लिए एक दूसरे के साथ मिलकर रहने की आदत डालनी होगी।
यदि मेरे लिए सब कुछ अनुकूल रहा तो अपने-पराये के भेद से होने वाले विनाश से बचने के लिए मैं कुछ प्रभावी सिद्धांतों के बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगा.....
सृजक
श्री मौसम सिंह
रामपुर मनिहारान (सहारनपुर)
प्रस्तुति

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