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प्रेरणादायी व्यक्तित्व सुनीता जी से संवाद

 प्रेरणादायी व्यक्तित्व सुनीता जी से संवाद

उपप्राचार्य सुनीता मीणा (शेरपुर, खिलचीपुर) 

संघर्ष, शिक्षा और संकल्प की जीवंत दास्तां

यह साक्षात्कार शैली आपकी जनजागरण आधारित पत्रकारिता और भावनात्मक-प्रेरक लेखन शैली को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिससे व्यक्तित्व का कौशल पूर्ण रूप से उभरकर सामने आए।

 

बातचीत

प्रश्न १. सुनीता जी, सबसे पहले अपने प्रारम्भिक जीवन और संघर्षों के बारे में बताइए।

उत्तर: "मेरा जीवन वास्तव में संघर्षों की एक लंबी यात्रा रहा है। कम उम्र में, जब मैं कक्षा 11 में थी, उसी समय मेरा विवाह हो गया। उस दौर में पढ़ाई जारी रखना आसान नहीं था, क्योंकि सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ अचानक बढ़ जाती हैं। लेकिन मैंने यह निश्चय कर लिया था कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, शिक्षा का दीपक बुझने नहीं दूँगी। यही संकल्प मेरे संघर्ष की असली शक्ति बना।"

प्रश्न २. विवाह के बाद पढ़ाई जारी रखना कई लड़कियों के लिए कठिन हो जाता है। आपने यह संतुलन कैसे बनाया?

उत्तर: "यह संतुलन केवल समय प्रबंधन से नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और परिवार के सहयोग से सम्भव हुआ। मैंने अपनी पढ़ाई को कभी बोझ नहीं माना, बल्कि अपने अस्तित्व का आधार समझा। मेरे माता-पिता, सास-ससुर और पति का भरपूर सहयोग मिला, जिसने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। जब परिवार साथ हो, तो संघर्ष भी साधना बन जाता है।"

प्रश्न ३. आपने ग्यारह विषयों में एम.ए. कर एक अनूठा रिकॉर्ड बनाया है। इस प्रेरणा का स्रोत क्या रहा?

उत्तर: "मेरे लिए शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान का विस्तार है। भूगोल, इतिहास, अंग्रेजी, राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन, मनोविज्ञान, शिक्षा, दर्शनशास्त्र, हिंदी, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र  विषयों ने मुझे समाज को समझने की दृष्टि दी। मेरा मानना है कि एक शिक्षक जितना अधिक बहुआयामी ज्ञान रखता है, उतना ही प्रभावी मार्गदर्शन कर सकता है।"

प्रश्न 4. प्रतियोगी परीक्षाओं में आपकी लगातार सफलता युवाओं के लिए प्रेरणा है। इस यात्रा के बारे में बताइए।

उत्तर: "मैंने दो बार सेकंड ग्रेड शिक्षक भर्ती परीक्षा और दो बार व्याख्याता भर्ती परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके अतिरिक्त कॉलेज व्याख्याता भर्ती परीक्षा, केंद्रीय विद्यालय, सीटेट, आरटेट और सेट जैसी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त की। यह यात्रा निरंतर अध्ययन, अनुशासन और आत्मविश्वास की रही। असफलताओं ने मुझे रोका नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत बनाया।"

प्रश्न ५. शिक्षण कार्य के पंद्रह वर्षों में आपने किन नवाचारों को अपनाया?

उत्तर: "मेरे लिए विद्यालय केवल पाठ्यक्रम तक सीमित स्थान नहीं, बल्कि प्रतिभा निर्माण का केंद्र है। मैंने बोर्ड परीक्षाओं में श्रेष्ठ परिणाम देने के साथ-साथ कई नवाचार किए—

* कक्षा 10वीं और 12वीं की टॉपर छात्राओं को हवाई यात्रा की घोषणा।

* विभिन्न प्रतियोगिताओं और शैक्षिक परीक्षाओं का आयोजन।

* शिक्षण सामग्री का वितरण।

* छात्राओं में आत्मविश्वास और नेतृत्व कौशल का विकास।

मेरा उद्देश्य है कि छात्राएँ बड़े सपने देखने का साहस करें।"

प्रश्न 6. सामाजिक कार्यों में आपकी सक्रिय भूमिका के बारे में कुछ बताइए।

उत्तर: "मैं शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम मानती हूँ। इसलिए विद्यालय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम, प्रतियोगिताएँ और प्रेरक गतिविधियाँ आयोजित करती रहती हूँ। मेरा प्रयास रहता है कि छात्राएँ केवल पढ़ाई में ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी संवेदनशील और जागरूक बनें।"

प्रश्न ७. आपको राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया गया है। यह अनुभव कैसा रहा?

उत्तर: "शिक्षा सागर फाउंडेशन द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित होना मेरे लिए अत्यंत गौरव का क्षण था। यह सम्मान मेरे व्यक्तिगत प्रयासों से अधिक शिक्षा और छात्राओं के प्रति मेरी प्रतिबद्धता का सम्मान है। इससे मुझे और बेहतर कार्य करने की प्रेरणा मिली।"

प्रश्न ८. लेखन क्षेत्र में आपकी पहचान भी स्थापित हो चुकी है। लेखन की शुरुआत कैसे हुई?

उत्तर: "लेखन मेरे मन की अभिव्यक्ति का माध्यम है। शिक्षण के साथ-साथ जब भी समय मिलता है, मैं अपने विचारों और अनुभवों को शब्दों में ढालती हूँ। मेरी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। पेड़ बचाओ, काव्यांजलि, क्या नहीं है जीवन, संवेदनहीनता, मन की व्यथा, समर्पणता जैसी रचनाएँ समाज की संवेदनाओं और यथार्थ को दर्शाती हैं।"

प्रश्न 9. एक उपप्राचार्य, शिक्षिका, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता — इन सभी भूमिकाओं को आप कैसे संतुलित करती हैं?

उत्तर: "मैं हर भूमिका को सेवा के रूप में देखती हूँ, बोझ के रूप में नहीं। जब उद्देश्य स्पष्ट हो और मन में समर्पण हो, तो समय अपने आप व्यवस्थित हो जाता है। मेरे लिए शिक्षा, लेखन और समाज सेवा तीनों एक ही धारा के अलग-अलग प्रवाह हैं।"

प्रश्न 10. आपकी सफलता का श्रेय आप किसे देना चाहेंगी?

उत्तर: "मेरी सफलता का पूरा श्रेय मेरे माता-पिता, सास-ससुर और पति को जाता है, जिन्होंने हर परिस्थिति में मेरा साथ दिया। उनके विश्वास ने ही मेरे आत्मविश्वास को मजबूती दी। साथ ही, मेरी दृढ़ इच्छाशक्ति ने मुझे कभी रुकने नहीं दिया।"

प्रश्न ११. आज की बेटियों और विद्यार्थियों के लिए आपका संदेश क्या है?

उत्तर: "मैं सभी बेटियों से कहना चाहती हूँ कि परिस्थितियाँ कभी भी आपके सपनों से बड़ी नहीं होतीं। विवाह, जिम्मेदारियाँ या सामाजिक दबाव — ये सब जीवन का हिस्सा हैं, बाधा नहीं। यदि इरादे मजबूत हों और आत्मविश्वास अडिग हो, तो हर मंजिल हासिल की जा सकती है।

“संघर्ष ही वह तप है, जो व्यक्तित्व को कुंदन बनाता है।”

प्रश्न 12. आपके जीवन दर्शन को एक पंक्ति में कैसे व्यक्त किया जा सकता है?

उत्तर: “परिस्थितियाँ नहीं, हमारे संकल्प हमारी दिशा तय करते हैं; और शिक्षा वह प्रकाश है, जो हर अंधकार को पराजित कर देता है।”

समापन टिप्पणी

उपप्राचार्य सुनीता मीणा की जीवन यात्रा यह सिद्ध करती है कि संघर्ष यदि संकल्प से जुड़ जाए, तो वह बाधा नहीं, बल्कि उपलब्धियों की सीढ़ी बन जाता है। कम उम्र में विवाह, निरंतर अध्ययन, अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता, या कर्कविषयों में उच्च शिक्षा, शिक्षण में नवाचार और साहित्य सृजन— यह सब उनके अदम्य साहस, अनुशासन और समर्पण का जीवंत प्रमाण है।

उनकी कहानी केवल एक व्यक्तित्व की नहीं, बल्कि उन सभी बेटियों की प्रेरक गाथा है जो परिस्थितियों से नहीं, अपने सपनों से पहचान बनाना चाहती हैं।

विशेष कथन

मेरे माता-पिता निरक्षर एक साधारण किसान हैं। शादी के बाद मेरी सासू मां ज्ञानी देवी और पिता जगदीश प्रसाद जी ने मुझे अपने मां बाप के समान पाला पोसा और प्यार दिया। उन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए हमेशा ही प्रेरित किया और हर तरह से सहयोग दिया। वो दोनों बहुत ही सुलझे हुए और समझदार इंसान हैं उन्होंने कभी अपनी रूढ़िवादी या छोटी सोच मेरे ऊपर नहीं थोपी कि मैं बहू हूँ तो बहू की तरह रहा। उन्होंने मेरे साथ अपनी बेटी के समान व्यवहार किया।

सूचना स्रोत

 
                              सुनीता मीणा
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 











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