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रागनियाँ

रागनी एक

गूजर विशिष्टियाँ 

गूजर के घर जन्म ले लिया क्या इतना ही काफी है।

नाम के आगे गूजर लिख दिया क्या इतना ही काफी है।।


गूजर वाले गुर भी हो और गूजर वाला जिगर भी हो।

गूजर वाली हमदर्दी  और गूजर जैसा निडर भी हो।।

सिर कटगे हथियार छुटे ना गूजर वाला सर भी हो।

सातों जात अभय पाती  गूजर जैसा घर भी हो ।।

वंश विरासत पे अकड़ो क्या इतना ही काफी है।।


कब तक काम चलाओगे तुम पुरखों की परिपाटी से।

गूजर जुड़कर रहे  हमेशा  भारत मां की  माटी  से ।।

काम चलाना चाहो हो तुम बस पुरखों की लाठी से।

गूजर का जौहर झलकें है  हर पर्वत हर घाटी  से ।।

मां बापों के नाम पें जीना क्या इतना ही काफी है।।


देश का मस्तक झुकण दिया ना सीने पे अरि वार सहे।

आज तलक गूजर को दुनिया भारत की दीवार कहे।।

देश के मालिक कई बणे  गूजर बण प्रतिहार रहे।

गूजर से रक्षित गुजरात्रा अमन चैन की ब्यार बहे।।

रहे सलामत गूजर मर्यादा बस इतना ही काफी है।


बिरादर वाली अकड़ छोड़ अब परिवर्तन करना होगा।

शिक्षा और बुनियादी ढांचा  नव सृजन करना होगा ।।

व्याप्त दहेज बीमारी का अब उन्मूलन करना होगा।

पढ़ लिख बणो स्वावलंबी ये पिछड़ापन हरना होगा।।

रतनवीर खुद आप बदल क्या लिखना ही काफी है।।

रचनाकार 

रतनवीर जी

रागनी दो

तर्ज चौकलिया देहाती 

दी खपा पीढ़ियां देश थर्म पें फिर भी तु बदहाल फिरें।

अन्नदाता कहलाता है और फिर भी तु कंगाल फिरें।। 


आप तुडावें हाड़ खेत में बेटा सरहद पे भेजा।

 देश रुकें ना देश झुकें ना ख़ून पसीना तु देजा।। 

खटे मरें तु देश धर्म पें आनन्द मौज और लेजा। 

तेरी मेहनत तेरी शहादत कब तक जावेंगी बेजा।। 

अन्न वस्त्र देने वाला तु आप लंगोटी डाल फिरें।।


 ना मेहनत का मोल मिला और नही ईनाम शहादत का।

 लुटता पिटता रहा हमेशा पुतला बना शराफ़त का ।।

 क्या तैने ही ठेका ले राख्यां सबकी सदा हिफाजत का। 

उनके जाके ठाट देख जो करते काम ख़िलाफत का ।।

 जो देश लूटते रहे सदा ही तु उनकी बन ढाल फिरें।। 


पैदा करने वाला तु और सरहद का रखवाला तु। 

पुलिस में बेटे तेरे हैं और डंडे खाने वाला तु ।। 

तेरी मेहनत पें मौज उड़ावें उनका चुनने वाला तु। 

हुक्म चलाने वाले वो और हुक्म बजाने वाला तु।। 

जो तन्ने चुनकें भेजे वो ही बणे तेरा काल फिरें।। 


कब तक भोला बना रहेंगा लुट पिट लिया भतेरा तु।

खुद अपनी तकदीर बना क्यूं मजलूम कमेरा तु ।।

रतनवीर ना सगे किसी के जिन्हें समर्थन देरा तु।। 

कोठी बंगलों में रहते वो झोंपड़ियों में रहरा तु।। 

तेरी पीठ पें पा धरके सत्ता के बने दलाल फिरें।।

रचनाकार

कवि रतनवीर भाटी 

बिसरख ग्रेटर नोएडा

साझाकर्त्री

सोना भाटी

रागनी तीन



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