भूमिका
लेखन केवल शब्दों का संयोजन नहीं होता, वह मन, समाज और संवेदना के बीच का जीवंत अंतर्संबंध होता है। प्रस्तुत रचना ‘मैं क्यों लिखती हूं’ इसी अंतर्संबंध की गहरी अभिव्यक्ति है, जहाँ लेखिका का लेखन व्यक्तिगत संतोष से आगे बढ़कर सामाजिक चेतना, आत्ममंथन और मानवीय करुणा का माध्यम बन जाता है। यह कविता उस आंतरिक द्वंद्व, वेदना, आक्रोश और जिम्मेदारी का दस्तावेज है, जो संवेदनशील मन को अन्याय, भेदभाव और पीड़ा के दृश्य देखकर भीतर तक झकझोर देता है।
इस रचना में लेखन को यश, पुरस्कार या प्रतिष्ठा का साधन नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार, कर्तव्य की अनुभूति और समाज के प्रति उत्तरदायित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि दबे हुए स्वर, मौन चीखों और संवेदनाओं का विस्तार हैं, जो अंतर्मन से निकलकर पन्नों पर उतरते हैं और पाठक के मन में आत्मचिंतन की लहर जगाते हैं।
अंतर्संबंध ब्लॉग के संदर्भ में यह कविता व्यक्ति और समाज, संवेदना और विवेक, पीड़ा और परिवर्तन के बीच गहरे रिश्ते को उजागर करती है। यह बताती है कि सच्चा लेखन आत्मशुद्धि, सामाजिक जागरण और सकारात्मक परिवर्तन का सेतु बन सकता है। लेखिका का यह कथ्य हमें यह भी समझाता है कि जब भीतर की आवाज शब्दों का रूप लेती है, तब वह केवल निजी अनुभूति नहीं रहती, बल्कि सामूहिक चेतना को स्पंदित करने वाली प्रेरणा बन जाती है।
'मैं क्यों लिखती हूँ?'
मैं पुरस्कार के लिए नहीं लिखती
न यश की अभिलाषा में लिखती
मैं लिखती हूं अपने आक्रोश,
मैं लिखती हूं अपनी वेदना
मैं लिखती हूं अपने हृदय की तपन
जो परेशान करती है मुझे बार-बार
मैं लिखती हूं आंखों के समक्ष घटित अन्याय,
मैं लिखती हूं कमजोर के प्रति हुआ भेदभाव,
जो रुलाता रहता है मेरी आत्मा को
कई चीत्कार निकलती है अंदर से
मैं अपने आनंद के लिए नहीं लिखती,
न ही प्रतिष्ठा के लिए लिखती
मैं लिखती हूं उन मजबूरियों को
परेशानियों को, उन पीड़ाओं को
जो सत्ता, पद , दंभ के नीचे क्रंदन करती है,
मुझे कोई शौक नहीं है कई रातें जगकर कलम चलाने का
पर मजबूर हूं कि देखा हुआ अन्याय सहन नहीं होता
जलाती हूं स्वयं को पर पीड़ा में
लिखती हूं उन निर्बलों के दुख में
पर आवाज अंदर ही दब के रह जाती है,
वही आवाज पन्नों पर उतरती है
मैं किसी को दिखाने के लिए नहीं लिखती,
नहीं अमरत्व की उम्मीद में लिखती
मैं लिखती हूं सिर्फ अपनों के लिए
जो मेरी रूह को झझकोर देते हैं,
अंतरात्मा में अंदर तक उतर जाते हैं,
संवेदना के पाट को तोड़ देते हैं,
मैं लिखती हूं संवेदनहीन में संवेदना जगाने के लिए
मैं लिखती हूं अपनी तड़प, संताप को कम करने के लिए,
मैं लिखती हूं अपने संतोष के लिए,
मैं लिखती हूं अपने जीवन की सार्थकता के लिए,
मैं लिखती हूं अपनी जिम्मेदारी के लिए,
मैं लिखती हूं अपने होने के लिए,
मैं लिखती हूं अपने वजूद के लिए,
मैं लिखती हूं स्वयं के जीवन के लिए,
क्योंकि मैं ना लिखूं तो दिमाग के हजार टुकडे हो जाएंगे
दिल कब का रो रो कर मर जाएगा,
मैं लिखती हूं आत्म चिंतन के लिए,
अपने विचारों को परिपक्वता देने के लिए,
जीवन को सफल बनाने के लिए,
किसी के काम आने योग्य बनने के लिए,
किसी का पथ प्रदर्शक बनने के लिए,
किसी की प्रेरणा बनने के लिए,
एक विचार को क्रांति और क्रांति को आंदोलन बनाने के लिए,
समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए,
अपना फर्ज अदा करने के लिए
मैं लिखती हूं।
रचनाकार
सुनिता मीणा
उपप्राचार्य
राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय
मानटाउन, सवाई माधोपुर (राज.)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






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