सच्ची श्रद्धांजलि: केवल स्मरण नहीं, संकल्प भी
डॉ रेशा
साइंस विभाग
श्री द्रोणाचार्य स्नातकोत्तर कॉलेज
हर वर्ष जब पुलवामा जैसे आतंकी हमलों की बरसी आती है, तो पूरा देश भावुक हो उठता है। हम शहीदों को नमन करते हैं, दो मिनट का मौन रखते हैं, सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि संदेश साझा करते हैं। लेकिन क्या केवल एक दिन का स्मरण ही हमारे कर्तव्य की पूर्ति है?
शहीदों ने अपना आज हमारे सुरक्षित कल के लिए न्यौछावर कर दिया। उनका बलिदान केवल एक घटना नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा में अंकित एक अमिट अध्याय है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या हम उस अध्याय को केवल पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं, या उससे प्रेरणा लेकर कुछ ठोस करने का संकल्प भी लेते हैं?आज हम सभी पुलवामा हमले को याद कर रहे हैं, लेकिन क्या वास्तव में केवल एक दिन याद कर लेना ही पर्याप्त है? क्योंकि हम शारीरिक रूप से कुछ विशेष नहीं कर पाते, तो क्या केवल एक दिन श्रद्धांजलि देकर हमारा कर्तव्य समाप्त हो जाता है?
क्या हम कुछ ऐसा नहीं कर सकते जिससे शहीद हुए वीरों के परिवारों की सहायता हो सके, उन्हें सम्मान मिल सके, और उन्हें यह एहसास दिलाया जा सके कि उनके अपने हमारे लिए कितने विशेष थे?
मैं सभी सभ्य नागरिकों से पूछना चाहती हूँ कि क्या मेरा यह सपना साकार हो सकता है या नहीं? सच्ची श्रद्धांजलि तो यही होगी कि हम उनके शहीद होने के बाद उनके परिवारों का ध्यान रखें, उनके बच्चों को सम्मानजनक जीवन और शिक्षा प्रदान करने में सहयोग दें। यही उनके प्रति हमारा वास्तविक सम्मान और कृतज्ञता होगी।
सच्ची श्रद्धांजलि शब्दों से नहीं, कर्मों से दी जाती है। यदि हम वास्तव में शहीदों का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें उनके परिवारों की जिम्मेदारी को भी अपनी जिम्मेदारी समझना होगा। जिन माताओं ने अपने पुत्र खोए, जिन पत्नियों ने अपने जीवनसाथी खोए, और जिन बच्चों ने अपने पिता का साया खो दिया — उनके जीवन को सम्मान और सुरक्षा देना ही हमारे राष्ट्रप्रेम की सच्ची परीक्षा है। हम एकजुट होकर कई सकारात्मक कदम उठा सकते हैं. शहीद परिवारों के लिए शिक्षा सहायता कोष की स्थापना
उनके बच्चों की उच्च शिक्षा और करियर मार्गदर्शन में सहयोग स्थानीय स्तर पर सम्मान समारोह और नियमित संवाद, समाज में उनके योगदान को पाठ्यक्रम और जनचर्चा का हिस्सा बनाना, जब समाज आगे बढ़कर उनके परिवारों का हाथ थामता है, तभी उन्हें यह एहसास होता है कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। राष्ट्र केवल सीमाओं की रक्षा से नहीं, बल्कि अपने वीरों के परिवारों की रक्षा से भी मजबूत बनता है। मेरा सपना है कि श्रद्धांजलि केवल एक दिन की औपचारिकता न रहे, बल्कि एक निरंतर सामाजिक दायित्व बन जाए। यदि हर नागरिक वर्ष में कम से कम एक छोटा प्रयास भी करे, तो हजारों परिवारों के जीवन में आशा का दीप जल सकता है। आइए, हम संकल्प लें कि शहीदों की स्मृति को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और उत्तरदायित्व में जीवित रखेंगे। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
रचनाकार
डॉ रेशा
प्रस्तुति



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