प्राचार्य श्री ओमकार सिंह जी से विशेष बातचीत
(शैक्षिक नेतृत्व, अनुसंधान, कृषि विज्ञान एवं अकादमिक प्रशासन पर केंद्रित)
परिचय
यह साक्षात्कार एक ऐसे शिक्षाविद् एवं प्रशासक के साथ है, जो सत्ताईस वर्षों से अधिक समय से उच्च शिक्षा, शोध, अकादमिक शासन, जेनेटिक्स, प्लांट ब्रीडिंग एवं बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में आप गोचर महाविद्यालय, रामपुर मनिहारान, सहारनपुर के प्राचार्य के रूप में कार्यरत हैं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति, शोध उन्नयन एवं संस्थागत विकास में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
बातचीत
प्रश्न १. सर, अपने शैक्षिक एवं व्यावसायिक जीवन की यात्रा के बारे में बताइए।
उत्तर: "मेरी शैक्षिक यात्रा सदैव ज्ञान, अनुसंधान और समाजोपयोगी शिक्षा के उद्देश्य से प्रेरित रही है। लगभग सत्ताईस वर्षों से मैं उच्च शिक्षा, शोध कार्य एवं अकादमिक प्रशासन से जुड़ा हूँ। इस यात्रा में मैंने न केवल शिक्षण की जिम्मेदारी निभाई, बल्कि संस्थागत विकास, अकादमिक उत्कृष्टता और शोध संस्कृति को बढ़ावा देने का भी प्रयास किया। विशेष रूप से जेनेटिक्स, प्लांट ब्रीडिंग एवं बायोटेक्नोलॉजी जैसे जटिल विषयों में कार्य करते हुए, मैंने इन विषयों को छात्रों के लिए सुलभ और समझने योग्य बनाने के लिए खुद को समर्पित किया।
कृषिविज्ञान में शिक्षा का उद्देश्य केवल उच्चतम स्तर पर शोध करना नहीं, बल्कि उन ज्ञान को समुदाय और आम विद्यार्थियों तक पहुँचाना भी है। इसी उद्देश्य से मैंने इकतीस पुस्तकों का लेखन किया, जो हिंदी और अंग्रेजी में हैं। इन पुस्तकों का उद्देश्य न केवल वैज्ञानिक जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना था, बल्कि विद्यार्थियों और समुदाय के बीच कृषि विज्ञान के प्रति जागरूकता और समझ बढ़ाना था।
इन पुस्तकों के माध्यम से मैंने कोशिश की है कि जेनेटिक्स और प्लांट ब्रीडिंग जैसे जटिल और तकनीकी विषय सरल और सुलभ बन सकें, ताकि न केवल उच्च शिक्षा में बल्कि ग्रामीण और कृषक समुदाय में भी इन विषयों की समझ का विस्तार हो सके। ये पुस्तकें मेरे कार्य और योगदान का एक छोटा सा प्रमाण हैं, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मेरे निरंतर प्रयासों और समर्पण को दर्शाती हैं।"
प्रश्न २. आपके शोध एवं प्रकाशनों की विशेषता क्या रही है?
उत्तर: "अपने पीएचडी के समय से ही नवाचार युक्त शोध कार्य में मेरी विशेष रुचि रही है. पीएचडी के शोध कार्य के रूप में मैंने अरहर (Pigeon Pea) में पॉड फ्लाई (Pod Fly) प्रतिरोध का आनुवंशिक विश्लेषण पर कार्य किया। यह शोध कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी तरह का पहला था, और इतना नवीन था कि इसे हैदराबाद स्थित अंतर्राष्र्टीय शोध संस्थान ICRISAT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से मान्यता प्राप्त हुई।
इसके बाद, स्नातकोत्तर के छात्रों का मार्गदर्शन करते हुए कृषि विज्ञान, जेनेटिक्स, प्लांट ब्रीडिंग और बायोटेक्नोलॉजी जैसे जटिल विषयों में कई नवाचारपूर्ण शोध कार्य किए। और जैसा कि आपको बताया अब तक, मेरी इकतीस से अधिक पुस्तकें (हिंदी और अंग्रेज़ी में) प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें से अधिकांश ने वैज्ञानिक जानकारी को सरल और सुलभ बनाने की दिशा में योगदान दिया है। इसके साथ ही, मैंने अनेक संपादित पुस्तकों में अध्याय भी लिखे हैं और साठ से अधिक शोध पत्र अंतरराष्ट्रीय जनरलों में प्रकाशित किए हैं। इन प्रकाशनों और शोध कार्यों ने कृषि जागरूकता और नवाचार को जमीनी स्तर पर बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह इस बात से भी पता चलता है की इनकी साइटेशनस लगातार बढ़ रही हैं।"
प्रश्न ३. वर्तमान में प्राचार्य के रूप में आपकी प्रमुख जिम्मेदारियाँ क्या हैं?
उत्तर: "प्राचार्य के रूप में मेरी प्रमुख जिम्मेदारियों में शैक्षणिक गुणवत्ता सुनिश्चित करना, संस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ करना, शोध को प्रोत्साहन देना तथा विद्यार्थियों और शिक्षकों के समग्र विकास हेतु अनुकूल वातावरण तैयार करना शामिल है। मैं संस्थान में अनुशासन, नवाचार और सहयोगात्मक कार्यसंस्कृति को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान देता हूँ।"
प्रश्न ४. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के क्रियान्वयन में आपकी भूमिका क्या रही?
उत्तर: "राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय की स्थापना से समन्वय नियुक्त किया गया है। इसको विश्वविद्यालय स्तर पर लागू कराने की संपूर्ण जिम्मेदारी फरवरी 2022 से मुझको दी गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मैंने कॉलेज एवं विश्वविद्यालय स्तर पर शैक्षणिक कार्यक्रमों को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पुनर्संरचित किया। बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास, शोध उन्मुख पाठ्यक्रम एवं छात्र-केंद्रित शिक्षण प्रणाली को संस्थान में लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।"
प्रश्न ५. कृषि शिक्षा और शोध के क्षेत्र में आपके प्रयासों के बारे में बताइए।
उत्तर: "कृषि शिक्षा को राष्ट्रीय ढांचे से जोड़ने के लिए मैंने इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) के साथ उच्च स्तरीय संवाद स्थापित किए। इस पहल का उद्देश्य कृषि महाविद्यालयों को राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (NAHEP) से प्रभावी रूप से जोड़ना था, जिससे कृषि शिक्षा में गुणवत्ता, शोध और नवाचार को नई दिशा मिल सके।
इसके साथ ही, मैंने छात्रों के कौशल विकास के लिए विभिन्न कार्यशालाओं के आयोजन हेतु वित्तीय सहायता भी प्राप्त की। इन कार्यशालाओं का उद्देश्य छात्रों को कृषि विज्ञान और संबंधित क्षेत्रों में व्यावसायिक कौशल प्रदान करना था, ताकि वे न केवल शैक्षिक दृष्टिकोण से सशक्त हों, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी उद्योग में प्रतिस्पर्धी बन सकें। इन कार्यशालाओं के माध्यम से, छात्रों को कृषि से संबंधित नवीनतम तकनीकों और तरीकों से अवगत कराया गया, जिससे उनकी रोजगार क्षमता और सामाजिक योगदान में वृद्धि हुई।"
प्रश्न ६. संस्थागत विकास और गुणवत्ता आश्वासन के क्षेत्र में आपके योगदान क्या रहे हैं?
उत्तर: "संस्थागत विकास और गुणवत्ता आश्वासन के क्षेत्र में मेरे योगदान का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षा के मानकों को सुनिश्चित करना और संस्थान के प्रशासनिक ढांचे को सुदृढ़ करना था। मैंने गुणवत्ता आश्वासन, प्रत्यायन (Accreditation) और सुशासन के क्षेत्र में ठोस कदम उठाए, जिससे संस्थान की कार्यप्रणाली और शैक्षिक उत्कृष्टता में सुधार हुआ। विश्वविद्यालय मानकों और नियामक आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियों का निर्माण और क्रियान्वयन किया गया, जिससे संस्थान में एक मजबूत प्रशासनिक संरचना स्थापित हुई।
संस्थान के पाठ्यक्रम में समय-समय पर उन्नयन किया गया, जिससे यह न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप भी बन सके। पाठ्यक्रम के साथ-साथ संकाय विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया, और इसके लिए अनेक योजनाएँ लागू की गईं, जिनमें संकाय प्रशिक्षण, शोध प्रोत्साहन, और अकादमिक उत्कृष्टता हेतु विशेष कार्यशालाएँ शामिल थीं।
साथ ही, मैंने शोध संवर्धन के लिए एक मजबूत ढाँचा तैयार किया। अब शोध कार्य के लिए संस्थान में अत्याधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। अधिकांश विभागों में डिजिटल संसाधन प्रदान किए गए हैं, जिससे शोधकर्ताओं को अपने कार्य में सहूलियत हुई है। अनुसंधान कार्यों को गति देने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न संस्थाओं के साथ एमओयू (MOU) किए गए हैं। इन एमओयू के तहत संस्थान को विभिन्न प्रकार की संसाधन सहायता प्राप्त हुई है, और शोध के लिए विभिन्न साझेदारी और सहयोग स्थापित किए गए हैं।
इसके अलावा, संस्थान में प्रशासनिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए कई सुधार किए गए हैं। मैंने कॉलेज के प्रवेश और शुल्क भुगतान प्रणाली को पूरी तरह से ऑनलाइन किया, जिससे प्रक्रिया अधिक प्रभावी और पारदर्शी हो गई। इसके साथ ही, संस्थान में अनुशासन, नवाचार और उच्चतम कार्यप्रणाली को बढ़ावा दिया गया है।"
प्रश्न ७. एक प्रशासक के रूप में आपका नेतृत्व दृष्टिकोण क्या है?
उत्तर: "मेरा मानना है कि सशक्त नेतृत्व का आधार सहयोग, पारदर्शिता और दूरदर्शिता है। मैं टीम वर्क, संवाद और सहभागिता को प्राथमिकता देता हूँ। मेरा प्रयास रहता है कि शिक्षक, विद्यार्थी और प्रशासन एक साझा लक्ष्य—शैक्षणिक उत्कृष्टता—की दिशा में कार्य करें।"
प्रश्न ८. विद्यार्थियों और संकाय विकास के लिए आपने कौन-से विशेष प्रयास किए?
उत्तर: "मैंने संकाय विकास कार्यक्रमों, शोध प्रोत्साहन योजनाओं और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों को बढ़ावा दिया। विद्यार्थियों के लिए कौशल आधारित शिक्षा, करियर मार्गदर्शन और व्यक्तित्व विकास कार्यक्रमों का संचालन किया, जिससे वे केवल डिग्रीधारी नहीं बल्कि सक्षम नागरिक बन सकें।"
प्रश्न ९. समाज एवं समुदाय के साथ आपके जुड़ाव के बारे में बताइए।
उत्तर: "शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य समाज का उत्थान और उसकी समृद्धि है। इसलिए, मैंने हमेशा यह प्रयास किया है कि शिक्षा केवल शैक्षणिक संस्थानों तक ही सीमित न रहे, बल्कि इसे समाज के हर तबके तक पहुँचाया जाए। मैंने स्थानीय समुदाय, कृषकों और विभिन्न हितधारकों के साथ संवाद स्थापित कर यह सुनिश्चित किया कि शोध और ज्ञान का सामाजिक उपयोग हो, जिससे यह केवल अकादमिक जगत तक ही सीमित न रहे, बल्कि आम जनता और विशेष रूप से कृषक समुदाय तक भी पहुँचे। इस प्रयास से संस्थान और समाज के बीच एक सशक्त साझेदारी विकसित हुई, जो दोनों के लिए लाभकारी रही है।
इसके अलावा, मैं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (Shiksha Sanskriti Utthan Nyas) मेरठ प्रांत का पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में संरक्षक (Patron) रहा हूँ। इस संगठन के माध्यम से, मैंने पारंपरिक मूल्य-आधारित शिक्षा को समाज में पुनः स्थापित करने के लिए निरंतर कार्य किया है। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के अंतर्गत, हम बच्चों को न केवल शैक्षिक ज्ञान, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य भी सिखाते हैं, जैसे कि संस्कृति, नैतिकता, और समाज के प्रति जिम्मेदारी।
हमने विभिन्न कार्यशालाओं और जागरूकता अभियानों का आयोजन किया, जिनमें स्थानीय समुदायों और स्कूलों के शिक्षकों को पारंपरिक शिक्षा पद्धतियों और भारतीय संस्कृति के महत्व के बारे में बताया गया। इसके साथ ही, हमने गाँवों और छोटे कस्बों में जाकर बच्चों और उनके अभिभावकों को एक मूल्य-आधारित शिक्षा के महत्व से अवगत कराया।"
प्रश्न १०. भविष्य के लिए आपकी शैक्षिक दृष्टि क्या है?
उत्तर: "मेरा लक्ष्य एक समावेशी, नवाचारी और शोध-आधारित शिक्षा प्रणाली विकसित करना है, जिसमें अकादमिक उत्कृष्टता के साथ नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व का समावेश हो। मैं चाहता हूँ कि उच्च शिक्षा संस्थान ज्ञान, कौशल और मानवीय संवेदनाओं के केंद्र बनें तथा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएँ।"
प्रश्न ११. युवा शिक्षाविदों और शोधार्थियों के लिए आपका संदेश क्या है?
उत्तर: "युवा शिक्षाविदों को चाहिए कि वे केवल डिग्री तक सीमित न रहें, बल्कि शोध, नवाचार और समाजोपयोगी ज्ञान पर ध्यान दें। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और समाज सेवा भी है। यदि समर्पण, अनुशासन और सतत सीखने की भावना हो, तो सफलता अवश्य प्राप्त होती है।"
समापन टिप्पणी
प्राचार्य महोदय का व्यक्तित्व एक शिक्षाविद्, शोधकर्ता, प्रशासक और समाजसेवी के रूप में बहुआयामी है। उनका योगदान उच्च शिक्षा, कृषि विज्ञान, शोध एवं अकादमिक नेतृत्व के क्षेत्र में प्रेरणादायी एवं अनुकरणीय है।
सूचना स्रोत
श्री ओमकार सिंह जी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति








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