सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

उपलब्धियों का विवरण भर नहीं है यह साक्षात्कार

भूमिका

यह साक्षात्कार केवल एक शिक्षिका और साहित्यकार की व्यक्तिगत उपलब्धियों का विवरण नहीं, बल्कि उन अंतर्संबंधों की जीवंत अभिव्यक्ति है जो जीवन को संपूर्ण बनाते हैं—शिक्षा और संघर्ष का संबंध, साहित्य और संवेदना का संबंध, गुरु-संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण का संबंध, तथा परिवार और प्रेरणा का संबंध। ममता गंगवार जी की जीवनयात्रा यह दर्शाती है कि किस प्रकार निरंतर सीखने की जिजीविषा, विपरीत परिस्थितियों में अडिग संकल्प, शिक्षकीय समर्पण और साहित्यिक चेतना मिलकर एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं जो स्वयं भी प्रकाशमान रहता है और दूसरों को भी दिशा देता है। यह संवाद पाठकों को यह समझने का अवसर देता है कि जीवन की चुनौतियाँ बाधा नहीं, बल्कि संबंधों और मूल्यों की कसौटी होती हैं—और जब धैर्य, परिश्रम तथा सकारात्मक दृष्टि साथ हों, तो व्यक्ति अपने शब्दों और कर्मों से समाज में सार्थक परिवर्तन की भूमिका निभा सकता है।


बातचीत

प्रश्न १. सबसे पहले आप अपने शैक्षिक सफर के बारे में बताइए।

उत्तर : "मेरा शैक्षिक सफर मेरे लिए केवल डिग्रियाँ प्राप्त करने की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मविकास की साधना रहा है। मैंने एम.ए. (हिंदी साहित्य) और बी.एड. किया है। प्रारंभिक शिक्षा यू.पी. बोर्ड, इलाहाबाद से हुई और बी.एड. रीजनल कॉलेज ऑफ एजुकेशन, अजमेर से तथा हिंदी साहित्य में एम.ए. एमडीएस यूनिवर्सिटी, अजमेर से किया। हिंदी भाषा और साहित्य मेरे लिए विषय नहीं, बल्कि जीवन की आत्मा...  हैं।"

प्रश्न २. आपके जीवन की सबसे बड़ी शैक्षिक चुनौती क्या रही?

उत्तर : "मेरे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती 15 वर्ष बाद पुनः दसवीं कक्षा केवल गणित विषय से उत्तीर्ण करना रहा। इलाहाबाद बोर्ड से होने के कारण मेरे पास गणित विषय नहीं था, जिसके कारण राजस्थान में सरकारी नौकरी की जॉइनिंग रद्द हो गई। यह क्षण बहुत पीड़ादायक था, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। आज मैंने सात विषयों के साथ दसवीं उत्तीर्ण की है, जो मेरे लिए आत्मविश्वास और संकल्प का प्रतीक है।"

प्रश्न ३. आप निरंतर सीखते रहने पर इतना ज़ोर क्यों देती हैं?

उत्तर : "मेरा मानना है कि सीखना जीवन की निरंतर प्रक्रिया है। जब भी अवसर मिला, मैंने किसी न किसी कक्षा या कोर्स को जॉइन किया। दो बार कंप्यूटर कोर्स भी किया। मैं अपने समय को कभी व्यर्थ नहीं जाने देती, क्योंकि हर क्षण कुछ नया सिखा सकता है।"

प्रश्न ४. हिंदी साहित्य से आपका लगाव कैसे विकसित हुआ?

उत्तर : "मेरे साहित्यिक संस्कारों का बीजारोपण बचपन में ही हो गया था। मेरे पिताजी हिंदी, उर्दू और अरबी साहित्य के गहन ज्ञाता थे। उनके सान्निध्य ने मुझे शब्दों, भावों और भाषा की गहराइयों से परिचित कराया। आज जो भी साहित्यिक समझ मुझमें है, उसमें उनका अमूल्य योगदान है।"

प्रश्न ५. आपके लिए साहित्य का अर्थ क्या है?

उत्तर : "साहित्य मेरे लिए शब्दों का खेल नहीं, बल्कि भावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति है। कविता, कहानी और लेखन के माध्यम से मैं अपने भीतर की संवेदनाओं को समाज तक पहुँचाने का माध्यम पाती हूँ।"

प्रश्न ६. मंच पर कविता पाठ करना आपके लिए क्या मायने रखता है?

उत्तर : "मंच पर कविता पढ़ना मेरे लिए शौक ही नहीं, साधना भी है। बचपन में कवि सम्मेलनों को देखकर जो सपना देखा था—आज वही साकार हो चुका है। शब्दों के माध्यम से श्रोताओं के दिलों तक पहुँचना मेरे लिए आत्मिक संतोष देता है।"

प्रश्न ७. आपका शिक्षकीय जीवन कैसा रहा है?

उत्तर : "मैं सन 2008 से ऑल सेट्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल, अजमेर में हिंदी अध्यापिका के रूप में कार्यरत हूँ। इससे पूर्व 2001 से विभिन्न विद्यालयों में अध्यापन किया। इस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में मुझे 26 वर्षों का अनुभव प्राप्त है। इतने वर्षों का समय कब बीत गया—इसका एहसास ही नहीं हुआ।"

प्रश्न ८. एक शिक्षक के रूप में आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही?

उत्तर : "मेरे लिए सबसे बड़ा संतोष यह है कि मेरे पढ़ाए हुए विद्यार्थी आज डॉक्टर, इंजीनियर और उच्च पदों पर कार्यरत हैं। उनके उज्ज्वल भविष्य को देखकर गर्व और आनंद से मन भर उठता है।"

प्रश्न ९. अध्यापन के अतिरिक्त आपकी अन्य रुचियाँ क्या हैं?

उत्तर : "मुझे कविता और कहानी लेखन-पठन, न्यूज़ लेखन, तैराकी, कुकिंग, सिलाई-कढ़ाई और सामाजिक कार्य अत्यंत प्रिय हैं। तैराकी का अभ्यास बचपन से रहा है और मैंने हजारों बच्चों को इसमें निपुण बनाया है। लोगों से मिलना-जुलना मुझे ऊर्जा देता है।"

प्रश्न १०. यदि आप स्वयं अपना विश्लेषण करें तो आप क्या पाती हैं कि आपके व्यक्तित्व की सर्वप्रमुख विशेषता क्या है?

उत्तर : "मेरा सबसे जिद्दी—या कहूँ दृढ़—स्वभाव यह है कि जो करने का ठान लेती हूँ, उसे पूरा करके ही दम लेती हूँ। जीवन में अनेक चुनौतियाँ आईं, लेकिन धैर्य और परिश्रम के बल पर अधिकांश में सफलता प्राप्त की।"

प्रश्न ११. आप साहित्य के माध्यम से समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?

उत्तर : "मेरा उद्देश्य शब्दों के माध्यम से समाज को सकारात्मक दिशा देना है। साहित्य मनुष्य को संवेदनशील, जागरूक और मानवीय बनाता है—मैं उसी भाव को आगे बढ़ाना चाहती हूँ।"

प्रश्न १२. आपके जीवन में आपके जीवनसाथी की भूमिका क्या रही है?

उत्तर : "मेरे जीवनसाथी श्री राजीव सिंह गंगवार, जो 2025 में आईटीआई अजमेर से फोरमैन पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठित और कर्मठ व्यक्ति रहे हैं। उनकी मेहनत, अनुशासन और अलग पहचान मेरे लिए सदैव प्रेरणा रही है।"

प्रश्न १३. आज के युवा शिक्षकों और साहित्यकारों के लिए आपका संदेश?

उत्तर : "सपने वही सच होते हैं, जिन्हें समय के साथ धैर्य और परिश्रम का साथ मिले। सीखते रहिए, झुकिए नहीं और अपने शब्दों व कर्मों से समाज को बेहतर बनाने का प्रयास करते रहिए।"

सूचना स्रोत 

 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 









टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...