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सत्संगत आत्मकथ्य (डॉ. रोशन लाल छोकर के चिंतन से)

 सत्संगत 

आत्मकथ्य डॉ. रोशन लाल छोकर के चिंतन से

मैं जब अपने जीवन की यात्रा पर पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो स्पष्ट अनुभव करता हूँ कि मनुष्य का निर्माण केवल जन्म से नहीं, बल्कि उसकी संगति से होता है। मैं न तो जन्म से विशेष था और न ही पूर्ण — मुझे मेरे परिवेश, अनुभवों और विशेष रूप से सत्संग ने गढ़ा है।

मेरे जीवन का पहला विद्यालय मेरा घर था। बचपन में मैंने देखा कि बच्चे शब्दों से कम और वातावरण से अधिक सीखते हैं। घर में यदि संयम, शिष्टता और परिश्रम का वातावरण हो, तो बालमन उसी दिशा में सहज रूप से ढल जाता है। मैंने भी यही अनुभव किया कि उपदेशों से अधिक प्रभाव आचरण का होता है। जो देखा, वही सीखा; जो वातावरण मिला, वही मेरे व्यक्तित्व की आधारशिला बन गया।

विद्यालय और मित्र मंडली ने मेरे जीवन की दिशा को और स्पष्ट किया। मैंने देखा कि जिन साथियों के बीच लक्ष्य, परिश्रम और सकारात्मक सोच थी, वहाँ प्रेरणा स्वतः जन्म लेती थी। वहीं जब कभी नकारात्मकता, निरर्थक चर्चा या समय की अवहेलना का वातावरण दिखा, तो मन में यह दृढ़ निश्चय और प्रबल हुआ कि संगति का चयन ही जीवन की दिशा तय करता है। एक ही परिस्थिति में रहकर भी व्यक्ति केवल अपने साथ के कारण अलग पहचान बना लेता है — यह सत्य मैंने बार-बार अनुभव किया।

कार्यस्थल पर भी सत्संग का महत्व उतना ही गहरा प्रतीत हुआ। जब मैं सकारात्मक, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोगों के बीच रहा, तब मेरे भीतर जिम्मेदारी, अनुशासन और समाधान खोजने की प्रवृत्ति विकसित हुई। इसके विपरीत, जहाँ शिकायत, निराशा और नकारात्मक दृष्टिकोण का प्रभाव होता है, वहाँ ऊर्जा क्षीण होती जाती है। इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि वातावरण केवल बाहरी स्थिति नहीं, बल्कि आंतरिक मनःस्थिति का भी निर्माण करता है।

समय के साथ मैंने यह भी समझा कि आधुनिक युग में संगति का स्वरूप विस्तृत हो चुका है। आज केवल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि मोबाइल, पुस्तकें, लेख और डिजिटल सामग्री भी हमारी संगति का हिस्सा हैं। जब हम प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक सामग्री से जुड़ते हैं, तो विचारों में गहराई आती है; परन्तु जब मन नकारात्मकता और विवादों में उलझता है, तो उसका प्रभाव हमारे व्यवहार में भी दिखाई देने लगता है।

मेरे अनुभव का सार यही है कि सत्संग किसी दबाव या आदेश से परिवर्तन नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे हमारे भीतर संस्कारों की सुगंध भर देता है। हम बोलने की मर्यादा, निर्णय की परिपक्वता और कठिन समय में धैर्य रखने की शक्ति उसी से सीखते हैं।

मुझे सदैव यह अनुभूति रही है कि जैसे फूलों के समीप रहने से वस्त्र भी सुगंधित हो जाते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति से चरित्र में सुगंध आ जाती है। जीवन में लक्ष्य का चयन जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक है सही संगति का चयन।

इसी विश्वास के साथ मैं कह सकता हूँ कि मेरे व्यक्तित्व, चिंतन और सामाजिक दृष्टि का जो भी स्वरूप आज है, उसमें सत्संग का मौन किन्तु गहन योगदान है। सत्संग ने मुझे यह सिखाया कि मनुष्य अपने परिवेश से ऊपर उठ सकता है, यदि वह अपने साथ और अपने विचारों की दिशा को सजगता से चुन ले। यही मेरे जीवन की साधना है, और यही मेरा आत्मस्वीकृत सत्य — सत्संग ही चरित्र निर्माण की सबसे प्रभावी शक्ति है।

सूचना स्रोत

 
श्री रोशनलाल छोकर
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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