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वो पल जो भूले नहीं भुलाए जाते

भूमिका

जीवन के ऐसे पल केवल व्यक्तिगत स्मृतियाँ नहीं होते, बल्कि वे मानवीय भावों की साझा विरासत होते हैं। जब हम उन्हें संस्मरणों के रूप में सहेजते हैं, तो वस्तुतः हम समय के प्रवाह में बिखरते हुए संवेदनाओं, रिश्तों और अनुभूतियों को शब्दों के सहारे थाम लेते हैं। स्मृतियाँ लिखते समय व्यक्ति केवल अपने अतीत की ओर नहीं लौटता, बल्कि अपने भीतर छिपे प्रेम, करुणा, भय, आशा और अपनत्व जैसे भावों से गहरा संवाद भी करता है। यही संवाद पाठक तक पहुँचकर उसे अपने जीवन के समान क्षणों से जोड़ देता है। इस प्रकार संस्मरण केवल स्मृति-संरक्षण का माध्यम नहीं रह जाते, बल्कि वे मनुष्यों के बीच भावनात्मक सेतु का निर्माण करते हैं—जहाँ एक व्यक्ति की अनुभूति, अनेक हृदयों की अनुभूति बन जाती है।

वो पल जो भूले नहीं भुलाए जाते

मेरी दीदी

दीदी की शादी महज़ तेरह वर्ष की आयु में ही हो गई थी।

हुआ यूँ कि दोनों परिवारों के बीच गहरी और पुरानी मित्रता थी।

हमारे दादाजी और दीदी के दादा-ससुर—दोनों मित्रों ने जुबानी ही रिश्ता पक्का कर लिया था—

“आपका पोता और मेरी पोती—हम दोनों का संबंध तय मानिए।”

बस, घर आकर दादाजी ने बताया—

“मैं लता का रिश्ता पक्का करके आया हूँ।”

उनके सामने किसी की हिम्मत भी नहीं थी कि कुछ पूछ सके या ऐतराज़ जता सके।

वैसे भी घर-बार देखा-भाला था, लोग जाने-पहचाने थे—सब खुश हो गए।

अब बात-बात में दीदी को सलाहें मिलने लगीं—

“कल को ससुराल जाना है, तो काम सीख लो।

नहीं तो वहाँ रोज़ डाँट पड़ेगी।”

यह सुनते ही दादी का रोना शुरू हो जाता।

दीदी बड़ी खुश रहती।

दादी से कहती—

“तू अभी से क्यों रोती है?

एक ही गली में तो घर है, जब मन करेगा आ जाऊँगी।”

दादी समझाती—

“ऐसा नहीं होता बेटा।

बहू बनने के बाद जब वे भेजेंगे, तभी आ पाओगी।”

दीदी हँसकर कहती—

“अरे! वो तो सब जाने-पहचाने हैं।

मैं कह दूँगी—दादी की याद आ रही है।”

और दादी के गले में बाँहें डालकर उन्हें घुमा देती—

हँसा देती थी।

माँ ने एक दिन पूछा—

“तुझे डर नहीं लगता?”

तो दीदी बोली—

“डर काहे का?

अच्छे-अच्छे नए कपड़े मिलेंगे।

अब तो डबल-डबल मिलेंगे, है ना दादी?”

यह सुनकर दादी भी हँस देती थी—

आँखों में नमी लिए, होंठों पर मुस्कान सँजोए।

लेखन की उपयोगिता पर संकेत

यह रचना केवल एक पारिवारिक स्मृति नहीं है—

यह उस दौर का दस्तावेज़ है,

जहाँ रिश्ते वचनों से तय होते थे,

बचपन सपनों में ढल जाता था

और मासूम हँसी के पीछे जीवन की बड़ी ज़िम्मेदारियाँ छिपी रहती थीं।

ऐसी स्मृतियों को लिखना

✔ इतिहास को मानवीय बनाता है

✔ भावनाओं को पीढ़ियों तक जीवित रखता है

✔ और पाठक को यह एहसास कराता है कि

उसके अपने जीवन के छोटे-छोटे क्षण भी लिखे जाने योग्य हैं।

सृजक

 
                                     प्रमिला त्रिवेदी जी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 





।                                     

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