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साहित्य साधिका हैं श्रीमती विजया डालमिया

भूमिका

साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों का सजीव विस्तार है। जब कोई व्यक्ति अपने अनुभवों, संवेदनाओं और संस्कारों को सरल भाषा में समाज के समक्ष रखता है, तो वह पाठकों से एक गहरा अंतर्संबंध स्थापित कर लेता है। ऐसी ही साहित्य साधिका हैं श्रीमती विजया डालमिया, जिन्होंने जीवन के विविध आयामों—परिवार, समाज और संवेदना—को अपनी लेखनी में सहज रूप से उतारा है। प्रस्तुत है उनका आत्मीय साक्षात्कार, जिसमें उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, साहित्यिक यात्रा, संपादन कार्य और रचनात्मक दृष्टि का सरल एवं प्रेरक परिचय मिलता है।

साक्षात्कार 

विजया डालमिया 

सम्पादिका– मेरी निहारिका

प्रश्न १. सबसे पहले अपने बारे में संक्षेप में बताइए।

उत्तर : "मेरा नाम विजया डालमिया है। मेरी उम्र 64 वर्ष है। मेरा जन्म नागपुर में हुआ और वर्तमान में मैं हैदराबाद में निवास करती हूँ। मेरे पति विनोद डालमिया उद्योगपति हैं। मेरे दो बेटे हैं—विक्की और गोविंदा। मेरी पुत्रवधू माधुरी है और एक पोता व एक पोती से मेरा छोटा-सा परिवार पूर्ण और सुखद है।"

प्रश्न २. साहित्य से आपका जुड़ाव कैसे हुआ?

उत्तर : "साहित्य और संस्कृति जीवन की धुरी हैं। मैंने इसे अपने जीवन में अपनाया और इसके सुंदर परिणाम पाए। यही कारण है कि मैं अपने परिचय में इसका उल्लेख विशेष रूप से करती हूँ। लेखन मेरे लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मसंतोष और समाज से जुड़ने का माध्यम है।"

प्रश्न ३. आपकी प्रकाशित पुस्तकों के बारे में बताइए।

उत्तर : "अब तक मेरा एक कहानी संग्रह दिल जो कह गया और एक काव्य संग्रह भीगे अल्फाज प्रकाशित हो चुके हैं। भीगे अल्फाज मेरी भावनाओं से जुड़े शब्दों का संकलन है। इसके अतिरिक्त लगभग आधा दर्जन साझा संकलनों में मेरी कहानियाँ, आलेख, गीत और कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।"

प्रश्न ४. आपके साहित्यिक कार्यों को किस प्रकार की सराहना मिली?

उत्तर : "मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता होती है कि पाठकों को मेरी रचनाएँ सहज और सरल लगती हैं। लोग कहते हैं कि मेरी कहानियों में वे स्वयं को पाते हैं। उन्हें लगता है कि जो कुछ लिखा गया है, वह केवल मेरी बात नहीं, बल्कि उनके अपने जीवन का अंश है। यही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।"

प्रश्न ५. आपको किन-किन सम्मानों से अलंकृत किया गया?

उत्तर : "मैं अंतर्राष्ट्रीय अग्रवाल संगठन की संस्थापक सदस्य हूँ। इस संस्था ने मेरे कार्यों को देखते हुए वर्ष 2022 में जयपुर में आयोजित अधिवेशन में मुझे सम्मानित किया। जयपुर की एक अन्य संस्था ने भी मेरे लेखन के प्रति समर्पण को देखते हुए मुझे सम्मानित किया, जो मेरे लिए दूसरा पुरस्कार था।

इंदौर की सीमा रामपुरिया की मैगजीन द राइजिंग स्टेप में मेरा कलरफुल इंटरव्यू प्रकाशित हुआ, जिसमें चुनिंदा लोगों की उपलब्धियों का उल्लेख था। इसके अतिरिक्त विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी समय-समय पर मुझे सम्मानित किया है।"

प्रश्न ६. वर्तमान में आप किन साहित्यिक दायित्वों का निर्वहन कर रही हैं?

उत्तर : "वर्तमान में मैं मेरी निहारिका पत्रिका की संपादक हूँ और पिछले पाँच वर्षों से इसका संपादन कर रही हूँ। मेरे नेतृत्व में प्रकाशित इस पत्रिका को पाठकों ने खूब सराहा है। संपादन का कार्य मेरे लिए जिम्मेदारी के साथ-साथ आनंद का विषय भी है।"

प्रश्न ७. आपकी लेखनी की विशेषता क्या है?

उत्तर : "मेरी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सरलता है। मैं मानती हूँ कि भाषा जितनी सहज होगी, वह उतनी ही तरलता से दिल में उतर जाएगी। शायद यही कारण है कि मेरी कहानियाँ लोगों को अपनी-सी लगती हैं और वे उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं।"

प्रश्न ८. आपकी साहित्यिक यात्रा के बारे में आगे की क्या योजना है?

उत्तर : "मेरी कलम की यात्रा निरंतर जारी है। अभी भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में मेरे लेख नियमित रूप से प्रकाशित हो रहे हैं और पाठकों का स्नेह मिलता रहता है। मेरा प्रयास रहेगा कि मेरी लेखनी समाज से जुड़ी रहे और पाठकों के मन को स्पर्श करती रहे।"

                           मेरी कलम से

प्रश्न ९. पाठकों के लिए आपका संदेश क्या है?

उत्तर : "मैं उन सभी पाठकों का आभार व्यक्त करती हूँ जिन्होंने मुझे इतना स्नेह दिया। मेरी कलम का योगदान तभी सार्थक होगा जब आप उसे पढ़ेंगे और मेरी कमियों से भी अवगत कराएँगे। आपका आशीर्वाद और सहयोग बना रहा तो यह साहित्य यात्रा निरंतर चलती रहेगी।"

आभार सहित…

श्रीमती विजया डालमिया

सूचना स्रोत

 

श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 


 









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