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'कितना प्यारा' कह देना है मन की स्वतःस्फूर्त स्वीकृति

'कितना प्यारा' भाव का उठना

मन की स्वतःस्फूर्त स्वीकृति

जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं जब मन अपने वश में नहीं रहता। न कोई पूर्वविचार, न कोई विश्लेषण—बस अनुभव का एक शुद्ध, कोमल और नैसर्गिक स्पर्श होता है और होंठों से अनायास निकल पड़ता है, 'कितना प्यारा है यह।' यह वाक्य किसी वस्तु की आलोचना या प्रशंसा का परिणाम नहीं होकर मन की उस स्थिति की अभिव्यक्ति होता है जहाँ तर्क पीछे छूट जाता है और भावना आगे आ जाती है।

कुदरत की यह अद्भुत व्यवस्था है कि वह मनुष्य के भीतर कुछ ऐसे सूक्ष्म तार बुन देती है, जिन्हें छूते ही हृदय में मधुर कंपन होने लगता है। कोई दृश्य, कोई स्वाद, कोई खुशबू, कोई स्वर या कोई भाव—जब अपनेपन के साथ हमारे भीतर उतरता है, तब मन उसे पहचानने में देर नहीं करता। उस पहचान का पहला और सबसे सरल शब्द होता है—प्यारा।

जब कोई नन्हा शिशु पहली बार मुस्कुराता है, जब दादी अपने पोते/पोती को निश्चिंत सोते हुए देखती है, जब बारिश के बाद मिट्टी की सौंधी गंध हवा में घुल जाती है, या जब वर्षों बाद कोई पुराना गीत कानों से होता हुआ सीधे स्मृतियों में उतर जाता है—तब हम सुंदरता को नहीं गिनते, बल्कि उसे जी लेते हैं। उस क्षण या पल जब मन सुरक्षित महसूस करता है, हल्का हो जाता है, और वही हल्कापन शब्द बनकर स्वतः बाहर आ जाता है।

असल में कितना प्यारा कहना किसी बाहरी वस्तु का मूल्यांकन नहीं, बल्कि अपने भीतर जागी कोमलता की स्वीकारोक्ति है। यह वह पल होता है जब मनुष्य अपनी सारी कठोरताएँ उतारकर सहज हो जाता है। न कोई भूमिका, न कोई अपेक्षा—बस एक क्षण और उसमें निहित अनुभूति।

किसी कृषक के लिए पहली बारिश का दिन प्यारा हो उठता है क्योंकि उसमें भविष्य की हरियाली की आशा छिपी होती है तो किसी माँ के लिए बच्चे की साधारण-सी हरकत भी प्यारी लगती है क्योंकि उसमें जीवन की निरंतरता झलकती है। किसी थके हुए मन के लिए चाय का पहला घूँट भी प्यारा हो सकता है, क्योंकि उसमें विश्राम का मौलिक आश्वासन होता है।

यही वह गूढ़ रहस्य है जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है, पर अनुभव करना सहज। जब मन पूरी तरह वर्तमान में होता है, जब वह तुलना, भय और अपेक्षाओं से मुक्त होता है, तब जीवन स्वयं बोल उठता है—और हम उसके प्रवाह में बहते हुए बस इतना ही कह पाते हैं, कितना प्यारा है यह।

शायद कुदरत ने यह भाव इसलिए दिया है ताकि जीवन की आपाधापी में हम रुक सकें, ठहर सकें, और यह याद रख सकें कि सुंदरता को पहचानने और उसे महसूस करने की क्षमता ही हमें भीतर से जीवित रखती है। जब भी यह वाक्य मन से निकले, समझ लेना चाहिए कि उस क्षण मनुष्य ने जीवन को तर्क से नहीं, हृदय से देखा है।

कल्पनाकार

 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




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